chevron_left  भवताarrow_drop_down
आश्रमवासिक পর্ব
অধ্যায় ৬
युधिष्ठिर उवाच
भवता विप्रहीणा हि क्व नु तिष्ठामहे वय़म् ||
৬ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ৮
वैशम्पाय़न उवाच
भवता विप्रहीणानि प्राप्तं त्वामेव किल्विषम् ||
১০ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায় ৩১
युधिष्ठिर उवाच
भवता शन्तनोर्वंशो निमग्नः पुनरुद्धृतः ||
৯ খ
वन পর্ব
অধ্যায় ৯০
युधिष्ठिर उवाच
भवता सङ्गमो यस्य भ्राता यस्य धनञ्जय़ः |
১৫ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায় ২১
वैशम्पाय़न उवाच
भवता सत्यमुक्तं च सर्वमेतन्न संशय़ः |
৪ ক
भीष्म পর্ব
অধ্যায় ১০৩
युधिष्ठिर उवाच
भवता सहिताः सर्वे पृच्छामो मधुसूदन ||
৪৫ গ
उद्योग পর্ব
অধ্যায় ১৫৩
वैशम्पाय़न उवाच
भवता हि वय़ं गुप्ताः शक्रेणेव दिवौकसः |
১৪ ক
आश्वमेधिक পর্ব
অধ্যায় ৫৫
उत्तङ्क उवाच
भवता ह्यभ्यनुज्ञाताः शिष्याः प्रत्यवरा मय़ा |
১৭ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ১৪
वासुदेव उवाच
भवतां कीर्तय़िष्यामि व्रतेशाय़ यथातथम् ||
৮ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায় ৯৪
राम उवाच
भवतां च कुरुश्रेष्ठ कुलं वहुमतं भुवि |
৪৫ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায় ৭৫
भगवानु उवाच
भवतां च कृतः कामस्तेषां च श्रेय़ उत्तमम् ||
১৬ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ২৭
सूत उवाच
भवतां च न मिथ्याय़ं सङ्कल्पो मे चिकीर्षितः ||
১৯ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ১২৭
वैशम्पाय़न उवाच
भवतां च यथा जन्म तदप्यागमितं नृपैः ||
১৪ গ
आदि পর্ব
অধ্যায় ১৭১
और्व उवाच
भवतां च विजानामि सर्वलोकहितेप्सुताम् |
১৬ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ১০১
विष्णुरु उवाच
भवतां चापि वक्ष्यामि शृणुध्वं विगतज्वराः ||
৬ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ৪৬
सूत उवाच
भवतां चैव सर्वेषां यास्याम्यपचितिं पितुः ||
৪১ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ১৭১
और्व उवाच
भवतां तु वचो नाहमलं समतिवर्तितुम् ||
১৩ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ১৩
जरत्कारुरु उवाच
भवतां तु हितार्थाय़ करिष्ये दारसङ्ग्रहम् ||
২৩ খ
विराट পর্ব
অধ্যায় ৪১
द्रोण उवाच
भवतां रोमकूपाणि प्रहृष्टान्युपलक्षय़े ||
২২ গ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ২
भीष्म उवाच
भवतां वाथ वा मह्यं तत्त्वेनैतद्विमृश्यताम् ||
২৫ খ
कर्ण পর্ব
অধ্যায় ২
सञ्जय़ उवाच
भवतां वाहुवीर्यं हि समाश्रित्य मय़ा युधि |
৭ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ১২৫
भीष्म उवाच
भवतां विदितं सर्वं सर्वज्ञा हि तपोधनाः |
৩০ ক
विराट পর্ব
অধ্যায় ৪৬
भीष्म उवाच
भवतां हि कृतास्त्रत्वं यथादित्ये प्रभा तथा |
৭ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ৮৪
अग्निरु उवाच
भवतां हि निय़ोज्योऽहं मा वोऽत्रास्तु विचारणा ||
৪৭ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায় ১২৬
वैशम्पाय़न उवाच
भवतामानुकूल्येन यदि रोचेत भारताः ||
৩৫ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ১২৫
भीष्म उवाच
भवतामाश्रमं प्राप्तो हताशो नष्टलक्षणः ||
২৭ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ২২
स्त्र्यु उवाच
भवताहमनुज्ञातः प्रस्थितो गन्धमादनम् |
১৫ ক
आदि পর্ব
অধ্যায় ৩
सूत उवाच
भवताहमन्नस्याशुचिभावमागमय़्य प्रत्यनुनीतः |
১৩৪ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ১৮৪
भृगुरु उवाच
भवति चात्र श्लोकः अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते |
১২ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ১৮৪
भृगुरु उवाच
भवति चात्र श्लोकः गुरुं यस्तु समाराध्य द्विजो वेदमवाप्नुय़ात् |
৯ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ৬
भीष्म उवाच
भवति मनुजलोकाद्देवलोको विशिष्टो; वहुतरसुसमृद्ध्या मानुषाणां गृहाणि |
৪৬ ক
आदि পর্ব
অধ্যায় ৩
सूत उवाच
भवति सुनिर्वृता भव |
১২০ খ
सभा পর্ব
অধ্যায় ১২
वैशम्पाय़न उवाच
भवतीति समाज्ञाय़ यत्नतः कार्यमुद्वहन् ||
২৪ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ২৬৭
असित उवाच
भवतीन्द्रिय़संन्यासादथ स्वपिति वै नरः ||
২৩ খ
कर्ण পর্ব
অধ্যায় ২৬
सञ्जय़ उवाच
भवतु भवतु किं विकत्थसे; ननु मम तस्य च युद्धमुद्यतम् |
৭১ ক
आदि পর্ব
অধ্যায় ২৯
सूत उवाच
भवतेऽपि वरं दद्मि वृणीतां भगवानपि ||
১৫ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ৭৯
भीष्म उवाच
भवतेऽहं ददानीदं भवानेतत्प्रय़च्छतु |
১০ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ৮৩
मुनिरु उवाच
भवतैव कृता राजन्भवता परिपालिताः |
৪৯ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ৮৩
राजो उवाच
भवतैव हि तज्ज्ञेय़ं यदिदानीमनन्तरम् ||
৫৬ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায় ৯৩
वैशम्पाय़न उवाच
भवतैव हि रक्ष्यास्ते व्यसनेषु विशेषतः |
৩৯ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ৪৯
वैशम्पाय़न उवाच
भवतो द्यूतदोषेण सर्वे वय़मुपप्लुताः |
১২ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ১২২
मैत्रेय़ उवाच
भवतो भावितात्मत्वाद्दाय़ोऽय़ं सुमहान्मम |
৫ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ৫১
भीष्म उवाच
भवतो यदहं व्रूय़ां तत्कार्यमविशङ्कय़ा ||
১৭ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ৫০
वैशम्पाय़न उवाच
भवतो यो गुणैस्तुल्यः पृथिव्यां पुरुषः क्वचित् ||
২৮ খ
विराट পর্ব
অধ্যায় ২৯
वैशम्पाय़न उवाच
भवतो वलवृद्धिश्च भविष्यति न संशय़ः ||
১৩ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ১
वैशम्पाय़न उवाच
भवतो वाहुवीर्येण प्रसादान्माधवस्य च |
১০ ক
शल्य পর্ব
অধ্যায় ৬৪
सञ्जय़ उवाच
भवतो व्यसनं दृष्ट्वा शक्रविस्पर्धिनो भृशम् ||
১৯ খ
आश्वमेधिक পর্ব
অধ্যায় ৩৫
अर्जुन उवाच
भवतो हि प्रसादेन सूक्ष्मे मे रमते मतिः ||
১ খ
आश्वमेधिक পর্ব
অধ্যায় ২৮
अध्वर्युरु उवाच
भवतो हि मतं श्रुत्वा प्रतिभाति मतिर्मम ||
২৫ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ৩
सूत उवाच
भवतो हिरण्मय़ा भविष्यन्ति |
৭৫ ঘ