शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৩১০
युधिष्ठिर उवाच
माहात्म्यमात्मय़ोगं च विज्ञानं च शुकस्य ह |
৫ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
৫১
धृतराष्ट्र उवाच
माहात्म्यात्संशय़ो लोके न त्वस्ति विजय़ो मम ||
৪ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১২৫
भीष्म उवाच
माहात्म्याद्व्यथसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ||
১৩ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
২০০
भीष्म उवाच
माहात्म्यानि महावाहो शृणु तानि युधिष्ठिर ||
৬ খ
शल्य পর্ব
অধ্যায়
৪৫
वैशम्पाय़न उवाच
माहात्म्येन च संय़ुक्ताः कामरूपधरास्तथा |
৩১ ক
सौप्तिक পর্ব
অধ্যায়
৭
द्रौणिरु उवाच
माहात्म्येन च संय़ुक्ताः शतशोऽथ सहस्रशः ||
২৬ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
২৮৫
सूर्य उवाच
माहितं कर्ण कार्षीस्त्वमात्मनः सुहृदां तथा |
১ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
২
भीष्म उवाच
माहिष्मत्यामभूद्राजा धर्मात्मा सत्यविक्रमः ||
৬ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
১৩২
विदुरो उवाच
माहेन्द्रं च ग्रहं लेभे लोकानां चेश्वरोऽभवत् ||
২৪ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
৫৫
सञ्जय़ उवाच
माहेन्द्रमस्त्रं विधिवत्सुघोरं; प्रादुश्चकाराद्भुतमन्तरिक्षे ||
১১০ খ
आश्वमेधिक পর্ব
অধ্যায়
৪৩
व्रह्मो उवाच
माहेश्वरी महादेवी प्रोच्यते पार्वतीति या ||
১৪ খ
शल्य পর্ব
অধ্যায়
৫৭
वासुदेव उवाच
माय़या चाक्षिपत्तेजो वृत्रस्य वलसूदनः ||
৫ গ
स्त्री পর্ব
অধ্যায়
২৪
गान्धार्यु उवाच
माय़या निकृतिप्रज्ञो जितवान्यो युधिष्ठिरम् |
২৪ ক
शल्य পর্ব
অধ্যায়
৫৭
वासुदेव उवाच
माय़या निर्जिता देवैरसुरा इति नः श्रुतम् |
৫ ক
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
৮৬
सञ्जय़ उवाच
माय़या भक्षिते तस्मिन्नन्वय़े तस्य मातृके |
৬৯ ক
शल्य পর্ব
অধ্যায়
২৯
सञ्जय़ उवाच
माय़या सलिलं स्तभ्य यत्राभूत्ते सुतः स्थितः ||
৫৪ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
২৯
श्रीभगवानु उवाच
माय़यापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ||
১৫ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
১৬৮
सञ्जय़ उवाच
माय़यैव निहन्याद्यो न युक्तं पार्थ तत्र किम् ||
২৫ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
৮৬
सञ्जय़ उवाच
माय़ा हि सहजा तेषां वय़ो रूपं च कामजम् |
৬০ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৩২৬
भीष्म उवाच
माय़ा ह्येषा मय़ा सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद |
৪৩ ক
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
৭৮
सञ्जय़ उवाच
माय़ां च राक्षसीं कृत्वा शरवर्षैरवाकिरत् ||
৩৭ গ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
৬৭
सञ्जय़ उवाच
माय़ां न सेवे भद्रं ते न वृथाधर्ममाचरे |
৫ ক
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
১৫৪
सञ्जय़ उवाच
माय़ाः सृष्टास्तत्र घटोत्कचेन; नामुञ्चन्वै याचमानं न भीतम् ||
৩৯ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
৫৫
सञ्जय़ उवाच
माय़ाकृतात्मानमिव भीष्मं तत्र स्म मेनिरे |
২৩ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
৩৭
विदुर उवाच
माय़ाचारो माय़या वर्तितव्यः; साध्वाचारः साधुना प्रत्युदेय़ः ||
৭ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
১১০
भीष्म उवाच
माय़ाचारो माय़या वर्तितव्यः; साध्वाचारः साधुना प्रत्युदेय़ः ||
২৬ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
২৩৭
दुर्योधन उवाच
माय़ाधिकास्त्वय़ुध्यन्त यदा शूरा विय़द्गताः |
৩ ক
आदि পর্ব
অধ্যায়
৯৫
वैशम्पाय़न उवाच
माय़ाधिकोऽवधीद्वीरं गन्धर्वः कुरुसत्तमम् ||
৯ খ
आदि পর্ব
অধ্যায়
১৮১
वैशम्पाय़न उवाच
माय़ान्वितैर्वा रक्षोभिः सुघोरैर्दृढवैरिभिः ||
৩৮ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
২৫৮
मार्कण्डेय़ उवाच
माय़ामास्थाय़ तरसा हत्वा गृध्रं जटाय़ुषम् ||
২ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
৪১
भगवानु उवाच
माय़ामास्थाय़ यद्ग्रस्तं मय़ा पुरुषसत्तम |
৪ খ
आदि পর্ব
অধ্যায়
১৮৭
वैशम्पाय़न उवाच
माय़ामास्थाय़ वा सिद्धांश्चरतः सर्वतोदिशम् ||
৩ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
১৫২
सञ्जय़ उवाच
माय़ावलमुपाश्रित्य कर्शय़त्यरिकर्शनः ||
১২ খ
आदि পর্ব
অধ্যায়
২০১
नारद उवाच
माय़ाविदावस्त्रविदौ वलिनौ कामरूपिणौ |
১৯ ক
शल्य পর্ব
অধ্যায়
৩০
श्रीवासुदेव उवाच
माय़ाविन इमां माय़ां माय़या जहि भारत |
৬ ক
शल्य পর্ব
অধ্যায়
৫৭
वासुदेव उवाच
माय़ाविनं च राजानं माय़यैव निकृन्ततु ||
৭ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
১০৪
भीष्म उवाच
माय़ाविभेदानुपसर्जनानि; पापं तथैव स्पशसम्प्रय़ोगात् |
৪০ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
১৬৪
भीष्म उवाच
माय़ावी दृढवैरश्च समरे विचरिष्यति ||
৩৪ খ
शल्य পর্ব
অধ্যায়
৩০
श्रीवासुदेव उवाच
माय़ावी माय़या वध्यः सत्यमेतद्युधिष्ठिर ||
৬ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
২৫৯
मार्कण्डेय़ उवाच
माय़ावी रणशौण्डश्च रौद्रश्च रजनीचरः ||
১১ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
৯৭
सञ्जय़ उवाच
माय़ावी राक्षसश्रेष्ठो दिव्यास्त्रज्ञश्च फाल्गुनिः ||
১০ গ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
৯
वैशम्पाय़न उवाच
माय़ावी राक्षसो घोरो यस्मान्मम महद्भय़म् ||
৬৮ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
৮৬
सञ्जय़ उवाच
माय़ावी विप्रिय़ं घोरमकार्षीन्मे वलक्षय़म् ||
৪৬ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
২৭৪
मार्कण्डेय़ उवाच
माय़ावी व्यदधान्माय़ां रावणो राक्षसेश्वरः ||
৫ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
৪০
भीष्म उवाच
माय़ावी हि सुरेन्द्रोऽसावहो प्राप्तोऽस्मि संशय़म् ||
৪৮ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
৪০
भीष्म उवाच
माय़ावी हि सुरेन्द्रोऽसौ दुर्धर्षश्चापि वीर्यवान् ||
৪২ খ
आदि পর্ব
অধ্যায়
২৬
सूत उवाच
माय़ावीर्यधरं साक्षादग्निमिद्धमिवोद्यतम् |
৮ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
৯৮
नारद उवाच
माय़ावीर्योपसम्पन्ना निवसन्त्यात्मरक्षिणः ||
৬ খ
शल्य পর্ব
অধ্যায়
৪৪
वैशम्पाय़न उवाच
माय़ाशतधरं कामं कामवीर्यवलान्वितम् |
২৩ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
১৩
सञ्जय़ उवाच
माय़ाशतसृजौ दृप्तौ माय़ाभिरितरेतरम् |
৪২ ক