chevron_left  भरद्वाजस्यarrow_drop_down
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ১৩৮
भीष्म उवाच
भरद्वाजस्य संवादं राज्ञः शत्रुन्तपस्य च ||
৩ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায় ১৭
सञ्जय़ उवाच
भरद्वाजात्मजश्चैव प्रातरुत्थाय़ संय़तौ ||
৫ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ১৫৮
अर्जुन उवाच
भरद्वाजादग्निवेश्यो अग्निवेश्याद्गुरुर्मम |
২৭ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ১০০
लोमश उवाच
भरद्वाजाश्रमे चैव निय़ता व्रह्मचारिणः |
৫ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ১৫৪
व्राह्मण उवाच
भरद्वाजो महाप्राज्ञः सततं संशितव्रतः ||
১ খ
वन পর্ব
অধ্যায় ৮৩
नारद उवाच
भरद्वाजो वसिष्ठश्च मुनिरुद्दालकस्तथा ||
১০৩ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ৩৪
भीष्म उवाच
भरद्वाजो वैतहव्यानैलांश्च भरतर्षभ ||
১৬ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ২৮১
पराशर उवाच
भरद्वाजो हरिश्मश्रुः कुण्डधारः श्रुतश्रवाः ||
১৬ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ১২১
वैशम्पाय़न उवाच
भरद्वाजोऽपि भगवानारुरोह दिवं तदा |
১১ ক
आदि পর্ব
অধ্যায় ৬৯
वैशम्पाय़न उवाच
भरस्व पुत्रं दुःषन्त मावमंस्थाः शकुन्तलाम् ||
২৯ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ৯০
वैशम्पाय़न उवाच
भरस्व पुत्रं दुःषन्त मावमंस्थाः शकुन्तलाम् ||
৩১ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ৪৩
सूत उवाच
भरिष्यामि च ते भार्यां प्रतीच्छेमां द्विजोत्तम |
২ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ৭৪
वृहदश्व उवाच
भरिष्यामीति सत्यं च प्रतिश्रुत्य क्व तद्गतम् ||
১৩ খ
सभा পর্ব
অধ্যায় ২৮
वैशम्पाय़न उवाच
भरुकच्छं गतो धीमान्दूतान्माद्रवतीसुतः |
৫০ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ৯৫
भरद्वाज उवाच
भरे भार्यामनव्याजो भरद्वाजोऽस्मि शोभने ||
৩১ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ৯৫
भरद्वाज उवाच
भरे सुतान्भरे शिष्यान्भरे देवान्भरे द्विजान् |
৩১ ক
आदि পর্ব
অধ্যায় ৪২
सूत उवाच
भरेय़ं चैव यां नाहं तां मे कन्यां प्रय़च्छत ||
১৫ খ
सभा পর্ব
অধ্যায় ২৭
वैशम्पाय़न उवाच
भर्गाणामधिपं चैव निषादाधिपतिं तथा |
১০ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ২৫৮
भीष्म उवाच
भर्तव्यत्वेन भार्यां च को नु मां तारय़िष्यति ||
৪৯ খ
वन পর্ব
অধ্যায় ৬৭
वृहदश्व उवाच
भर्तव्या रक्षणीय़ा च पत्नी हि पतिना सदा |
১৩ ক
आदि পর্ব
অধ্যায় ৬৯
वैशम्पाय़न उवाच
भर्तव्योऽय़ं त्वय़ा यस्मादस्माकं वचनादपि |
৩৩ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ১৩
वैशम्पाय़न उवाच
भर्ता च भार्यया रक्ष्यः कथं जाय़ान्ममोदरे ||
৬২ খ
वन পর্ব
অধ্যায় ২৬৪
मार्कण्डेय़ उवाच
भर्ता ते कुशली रामो लक्ष्मणानुगतो वली ||
৫৬ খ
वन পর্ব
অধ্যায় ৫৮
वृहदश्व उवाच
भर्ता तेऽहं निवोधेदं वचनं हितमात्मनः ||
১৯ খ
वन পর্ব
অধ্যায় ৬৫
सुदेव उवाच
भर्ता नाम परं नार्या भूषणं भूषणैर्विना |
১৮ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ১৯৭
मार्कण्डेय़ उवाच
भर्ता प्रविष्टः सहसा तस्या भरतसत्तम ||
৯ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ১১৩
वैशम्पाय़न उवाच
भर्ता भार्यां राजपुत्रि धर्म्यं वाधर्म्यमेव वा |
২৭ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ১৮
वैशम्पाय़न उवाच
भर्ता भूत्वा च लोकस्य सोऽद्यान्यैर्भृतिमिच्छसि ||
১১ খ
शल्य পর্ব
অধ্যায় ৪৭
वैशम्पाय़न उवाच
भर्ता मे देवराजः स्यादिति निश्चित्य भामिनी ||
৩ খ
वन পর্ব
অধ্যায় ২৮১
सत्यवानु उवाच
भर्तारं चाप्यनुगतां मातरं परिदुर्वलाम् ||
৯২ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ৯৩
वैशम्पाय़न उवाच
भर्तारं जाह्नवी देवी शन्तनुं पुरुषर्षभम् ||
৪ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ৪৩
सूत उवाच
भर्तारं तं यथान्याय़मुपतस्थे महामुनिम् ||
১১ খ
आश्वमेधिक পর্ব
অধ্যায় ৭৮
वैशम्पाय़न उवाच
भर्तारं निहतं दृष्ट्वा पुत्रं च पतितं भुवि |
৩৮ ক
स्त्री পর্ব
অধ্যায় ২৫
गान्धार्यु उवाच
भर्तारं परिवार्यैताः पृथक्प्ररुदिताः स्त्रिय़ः ||
১০ খ
आश्वमेधिक পর্ব
অধ্যায় ৬০
वैशम्पाय़न उवाच
भर्तारं प्रति सुश्रोणि गर्भस्थं रक्ष मे शिशुम् ||
৩৯ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ১৭৩
गन्धर्व उवाच
भर्तारं भक्षय़ामास व्याघ्रो मृगमिवेप्सितम् ||
১৪ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ১৬০
गन्धर्व उवाच
भर्तारं सविता मेने रूपशीलकुलश्रुतैः ||
১০ খ
विराट পর্ব
অধ্যায় ১৫
वैशम्पाय़न उवाच
भर्तारमनुरुध्यन्त्यः क्लिश्यन्ते वीरपत्नय़ः |
৩২ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ৬২
वृहदश्व उवाच
भर्तारमपि तं वीरं छाय़ेवानपगा सदा ||
২৭ খ
आश्वमेधिक পর্ব
অধ্যায় ৭৯
वैशम्पाय़न उवाच
भर्तारमभिगम्येदमित्युवाच यशस्विनी ||
৮ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ৬৮
वैशम्पाय़न उवाच
भर्तारमभिसम्प्रेक्ष्य क्रुद्धा वचनमव्रवीत् ||
২৩ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ১৪
वैशम्पाय़न उवाच
भर्तारमभिसम्प्रेक्ष्य ततो वचनमव्रवीत् ||
৫ খ
वन পর্ব
অধ্যায় ২২২
वैशम्पाय़न उवाच
भर्तारो वशगा मह्यं गुरुशुश्रूषणेन च ||
৩৭ খ
सभा পর্ব
অধ্যায় ৫
नारद उवाच
भर्तुः कुप्यन्ति दौर्गत्यात्सोऽनर्थः सुमहान्स्मृतः ||
৩৯ খ
वन পর্ব
অধ্যায় ২৮৩
मार्कण्डेय़ उवाच
भर्तुः कुलं च सावित्र्या सर्वं कृच्छ्रात्समुद्धृतम् ||
১৪ খ
आश्वमेधिक পর্ব
অধ্যায় ৯৩
नकुल उवाच
भर्तुः प्रसादात्स्त्रीणां वै रतिः पुत्रफलं तथा ||
২৫ খ
वन পর্ব
অধ্যায় ৬৫
सुदेव उवाच
भर्तुः समागमात्साध्वी रोहिणी शशिनो यथा ||
২১ খ
आश्रमवासिक পর্ব
অধ্যায় ২৬
वैशम्पाय़न उवाच
भर्तुः सलोकतां कुन्ती गमिष्यति वधूस्तव ||
১৮ খ
वन পর্ব
অধ্যায় ৬২
वृहदश्व उवाच
भर्तुरन्वेषणार्थं तु पश्येय़ं व्राह्मणानहम् ||
৩৯ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ১৪৫
व्राह्मण उवाच
भर्तुरर्थाय़ निक्षिप्तां न्यासं धात्रा महात्मना |
৩৫ ক