chevron_left  भगवंश्चिरस्यarrow_drop_down
आदि পর্ব
অধ্যায় ৩
सूत उवाच
भगवंश्चिरस्य पात्रमासाद्यते |
১২৩ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ৩
सूत उवाच
भगवंस्तथा भविष्यतीति ||
১৬ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায় ১৭৩
सञ्जय़ उवाच
भगवंस्तन्ममाचक्ष्व को वै स पुरुषोत्तमः |
৮ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ৬৫
देवा ऊचुः
भगवंस्त्वं प्रभुर्भूमेः सर्वस्य त्रिदिवस्य च |
১৮ ক
शल्य পর্ব
অধ্যায় ৩৭
ऋषिरु उवाच
भगवंस्त्वत्प्रसादाद्वै तपो मे न क्षरेदिति ||
৪৭ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ১১৩
उष्ट्र उवाच
भगवंस्त्वत्प्रसादान्मे दीर्घा ग्रीवा भवेदिय़म् |
৬ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ২৭২
शक्र उवाच
भगवंस्त्वत्प्रसादेन दितिजं सुदुरासदम् |
৩৯ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায় ১৭৬
अम्वो उवाच
भगवञ्शरणं त्वाद्य प्रपन्नास्मि महाव्रत |
২৭ ক
आदि পর্ব
অধ্যায় ৩৫
सूत उवाच
भगवञ्शापभीतोऽय़ं वासुकिस्तप्यते भृशम् ||
৫ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ২৯১
भीष्म उवाच
भगवञ्श्रोतुमिच्छामि परं व्रह्म सनातनम् |
১১ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ৩৯
जनमेजय़ उवाच
भगवञ्श्रोतुमिच्छामि पार्थस्याक्लिष्टकर्मणः |
১ ক
आदि পর্ব
অধ্যায় ৮৯
जनमेजय़ उवाच
भगवञ्श्रोतुमिच्छामि पूरोर्वंशकरान्नृपान् |
১ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ৩১
वैशम्पाय़न उवाच
भगवञ्श्रोतुमिच्छामि सुवर्णष्ठीविसम्भवम् ||
১ খ
आश्रमवासिक পর্ব
অধ্যায় ৩৮
कुन्त्यु उवाच
भगवञ्श्वशुरो मेऽसि दैवतस्यापि दैवतम् |
১ ক
आदि পর্ব
অধ্যায় ৩
सूत उवाच
भगवते निवेद्य पूर्वमपरं चरामि |
৪০ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ৩
सूत उवाच
भगवतैव प्रेषितो गच्छ केदारखण्डं वधानेति ||
২৫ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ৩০৮
भीष्म उवाच
भगवत्याः क्व चर्येय़ं कृता क्व च गमिष्यसि |
২০ ক
आदि পর্ব
অধ্যায় ১৬৯
वसिष्ठ उवाच
भगवत्याः प्रसादेन गच्छेत्क्षत्रं सचक्षुषम् |
২৪ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ১২০
भीष्म उवाच
भगवद्वचनात्कीटो व्राह्मण्यं प्राप्य दुर्लभम् |
১২ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ২৪
युधिष्ठिर उवाच
भगवन्कर्मणा केन सुद्युम्नो वसुधाधिपः |
১ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ৭৯
जनमेजय़ उवाच
भगवन्काम्यकात्पार्थे गते मे प्रपितामहे |
১ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায় ১০৩
गरुड उवाच
भगवन्किमवज्ञानात्क्षुधां प्रति भय़े मम |
৩ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ২৯৭
भीष्म उवाच
भगवन्किमिदं श्रेय़ः प्रेत्य वापीह वा भवेत् |
৩ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ৬৫
देवा ऊचुः
भगवन्कृतकामाः स्मो यक्ष्यामस्त्वाप्तदक्षिणैः |
২১ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ১৮৫
मार्कण्डेय़ उवाच
भगवन्कृता हि मे रक्षा त्वय़ा सर्वा विशेषतः |
২৫ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ১২৭
उमो उवाच
भगवन्केन ते वक्त्रं चन्द्रवत्प्रिय़दर्शनम् |
৪৬ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ৬১
भीष्म उवाच
भगवन्केन दानेन स्वर्गतः सुखमेधते |
৫০ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ২৭৪
भीष्म उवाच
भगवन्क्व नु यान्त्येते देवाः शक्रपुरोगमाः |
২২ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ৫৩
भीष्म उवाच
भगवन्क्व रथो यातु व्रवीतु भृगुनन्दनः |
৩৩ ক
आदि পর্ব
অধ্যায় ২৬
सूत उवाच
भगवन्क्व विमुञ्चामि तरुशाखामिमामहम् |
১৬ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ১৮৫
मार्कण्डेय़ उवाच
भगवन्क्षुद्रमत्स्योऽस्मि वलवद्भ्यो भय़ं मम |
৭ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ২৭৪
भीष्म उवाच
भगवन्तं तथेत्याह व्रह्माणममितौजसम् ||
৪৭ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ১২৭
भीष्म उवाच
भगवन्तं प्रपन्ना सा साञ्जलिप्रग्रहा स्थिता ||
৩৬ খ
आश्वमेधिक পর্ব
অধ্যায় ৩৫
वासुदेव उवाच
भगवन्तं प्रपन्नोऽहं निःश्रेय़सपराय़णः |
৪ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ১৬৪
अर्जुन उवाच
भगवन्तं महादेवं समेतोऽस्मीति भारत ||
৩ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায় ৮১
वैशम्पाय़न उवाच
भगवन्तः क्व संसिद्धाः का वीथी भवतामिह ||
৬৩ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ২১০
गुरुरु उवाच
भगवन्तमजं दिव्यं विष्णुमव्यक्तसञ्ज्ञितम् |
৩০ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ২৮৬
कर्ण उवाच
भगवन्तमहं भक्तो यथा मां वेत्थ गोपते |
১ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ৪১
अर्जुन उवाच
भगवन्ददासि चेन्मह्यं कामं प्रीत्या वृषध्वज |
৭ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ২৪৫
युधिष्ठिर उवाच
भगवन्दानधर्माणां तपसो वा महामुने |
২৬ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায় ১১৭
नारद उवाच
भगवन्दीय़तां मह्यं सहस्रमिति गालव ||
৫ খ
वन পর্ব
অধ্যায় ১৯৬
वैशम्पाय़न उवाच
भगवन्दुष्करं ह्येतत्प्रतिभाति मम प्रभो |
৭ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ১৪
उपमन्युरु उवाच
भगवन्देवदेवेश लोकनाथ जगत्पते |
১৭৩ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ১৩০
उमो उवाच
भगवन्देवदेवेश सर्वभूतनमस्कृत |
২০ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ১৫৩
वैशम्पाय़न उवाच
भगवन्देवदेवेश सुरासुरनमस्कृत |
৩৭ ক
सभा পর্ব
অধ্যায় ১১
नारद उवाच
भगवन्द्रष्टुमिच्छामि पितामहसभामहम् |
৫ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ৭৮
वैशम्पाय़न उवाच
भगवन्नक्षहृदय़ं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः ||
১৬ খ
वन পর্ব
অধ্যায় ৬১
दमय़न्त्यु उवाच
भगवन्नचलश्रेष्ठ दिव्यदर्शन विश्रुत |
৩৯ ক
आदि পর্ব
অধ্যায় ৩
सूत उवाच
भगवन्नज्ञानादेतदन्नं सकेशमुपहृतं शीतं च |
১২৯ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ৫৯
भीष्म उवाच
भगवन्नरलोकस्थं नष्टं व्रह्म सनातनम् |
২৪ ক