आश्वमेधिक পর্ব
অধ্যায়
১৪
वैशम्पाय़न उवाच
लभते व्यसनं प्राप्य सुहृदः साधुसंमतान् ||
১১ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
৮১
पुलस्त्य उवाच
लभते सर्वकामान्हि स्वर्गलोकं च गच्छति ||
৬২ গ
आश्रमवासिक পর্ব
অধ্যায়
২৩
कुन्त्यु उवाच
लभते सुकृताँल्लोकान्यस्माद्वंशः प्रणश्यति ||
১৬ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৩০৬
भीष्म उवाच
लभतेऽव्यक्तसंस्थानं ज्ञात्वाव्यक्तं महीपते ||
১০২ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
৪
वैशम्पाय़न उवाच
लभन्तां पाण्डवा राज्यं शमं गच्छन्तु कौरवाः ||
৯ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
১০২
कण्व उवाच
लभन्तां भवतः कामात्काममेतं यथेप्सितम् ||
২৪ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৭
वैशम्पाय़न उवाच
लभन्ते मातरो गर्भांस्तान्मासान्दश विभ्रति ||
১৪ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
২৭
श्रीभगवानु उवाच
लभन्ते व्रह्मनिर्वाणमृषय़ः क्षीणकल्मषाः |
২৫ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৩৩৩
नरनाराय़णावू ऊचतुः
लभन्ते सततं पूजां वृषाकपिवचो यथा ||
২৩ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১৩৩
महेश्वर उवाच
लभन्ते स्वर्गतिं नित्यमिह लोके सुखं तथा ||
৪৭ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
৩
वैशम्पाय़न उवाच
लभेत जातिस्मरतां सदा नरः; स्मृतिं च मेधां च स विन्दते पराम् ||
৩২ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
৮১
पुलस्त्य उवाच
लभेत्कन्याशतं दिव्यं व्रह्मलोकं च गच्छति ||
১৬৫ গ
सभा পর্ব
অধ্যায়
৫৭
विदुर उवाच
लभ्यः खलु प्रातिपीय़ नरोऽनुप्रिय़वागिह |
১৭ ক
आदि পর্ব
অধ্যায়
৪১
पितर ऊचुः
लम्वतामिह नस्तात न ज्ञानं प्रतिभाति वै |
১৪ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১৭
उपमन्युरु उवाच
लम्वनो लम्वितोष्ठश्च महामाय़ः पय़ोनिधिः |
৮৫ ক
आदि পর্ব
অধ্যায়
১৩
सूत उवाच
लम्वमानान्महागर्ते पादैरूर्ध्वैरधोमुखान् ||
১১ খ
शल्य পর্ব
অধ্যায়
৪৫
वैशम्पाय़न उवाच
लम्वसी केतकी चैव चित्रसेना तथा वला |
১৪ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
২৭
सिद्ध उवाच
लम्वेतावाक्षिरा यस्तु युगानामय़ुतं पुमान् |
৪০ ক
शल्य পর্ব
অধ্যায়
৪৫
वैशम्पाय़न उवाच
लम्वोदर्यो लम्वकर्णास्तथा लम्वपय़ोधराः ||
৩৩ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
১০৮
लोमश उवाच
ललाटदेशे पतितां मालां मुक्तामय़ीमिव ||
৯ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৩৩৮
वैशम्पाय़न उवाच
ललाटप्रभवः पुत्रः शिव आगाद्यदृच्छय़ा |
১১ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
৭৬
भीष्म उवाच
ललाटप्रभवेनाक्ष्णा रोहिणीः प्रदहन्निव ||
২০ গ
कर्ण পর্ব
অধ্যায়
৬০
सञ्जय़ उवाच
ललाटमप्यस्य विभेद पत्रिणा; शिरश्च काय़ात्प्रजहार सारथेः ||
৩২ খ
कर्ण পর্ব
অধ্যায়
১১
सञ्जय़ उवाच
ललाटस्थं ततो वाणं धारय़ामास पाण्डवः |
৬ ক
सभा পর্ব
অধ্যায়
৩৯
वैशम्पाय़न उवाच
ललाटस्थां त्रिकूटस्थां गङ्गां त्रिपथगामिव ||
১১ খ
कर्ण পর্ব
অধ্যায়
১১
सञ्जय़ उवाच
ललाटस्थैस्ततो वाणैर्व्राह्मणः स व्यरोचत |
৮ ক
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
১০৬
सञ्जय़ उवाच
ललाटस्थैस्तु तैर्वाणैः शुशुभे पाण्डवोत्तमः |
৩৩ ক
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
১১৪
सञ्जय़ उवाच
ललाटस्थैस्तु तैर्वाणैः सूतपुत्रो व्यरोचत |
৮ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১৭
उपमन्युरु उवाच
ललाटाक्षो विश्वदेहो हरिणो व्रह्मवर्चसः |
১৪৮ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
২৭৪
भीष्म उवाच
ललाटात्प्रसृतो घोरः स्वेदविन्दुर्वभूव ह ||
৩৬ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
১০৬
सञ्जय़ उवाच
ललाटे भरतश्रेष्ठ शरैः संनतपर्वभिः ||
৩২ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
১০২
सञ्जय़ उवाच
ललाटेऽताडय़च्चैनं नाराचेन स्मय़न्निव |
৭৮ ক
विराट পর্ব
অধ্যায়
৫৬
वैशम्पाय़न उवाच
ललाटेऽभ्यहनत्तूर्णं स विद्धः प्रापतद्रथात् ||
২৪ খ
कर्ण পর্ব
অধ্যায়
১১
सञ्जय़ उवाच
ललाटेऽभ्यहनद्राजन्नाराचेन स्मय़न्निव ||
৫ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
২২
सञ्जय़ उवाच
ललामैर्हरिभिर्युक्तैः सर्वशव्दक्षमैर्युधि |
৭ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১১২
वृहस्पतिरु उवाच
लवणं चोरय़ित्वा तु चीरीवाकः प्रजाय़ते |
৯৫ ক
कर्ण পর্ব
অধ্যায়
২১
सञ्जय़ उवाच
लवणजलसमुद्धतस्वनं; वलममरासुरसैन्यसंनिभम् ||
৮ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
৩৪
विदुर उवाच
लवणोत्तरं दरिद्राणां भोजनं भरतर्षभ ||
৪৭ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
৭৭
भगवानु उवाच
लवशः क्षणशश्चापि न च तुष्टः सुय़ोधनः ||
২০ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
৮২
पुलस्त्य उवाच
लवेडिकां ततो गच्छेत्पुण्यां पुण्योपसेविताम् |
১৪৩ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
২৮২
सावित्र्यु उवाच
लव्धं पितुः पुत्रशतं पुत्राणामात्मनः शतम् ||
৪০ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১৮
वैशम्पाय़न उवाच
लव्धं पुत्रशतं शर्वात्पुरा पाण्डुनृपात्मज ||
৬ খ
आश्रमवासिक পর্ব
অধ্যায়
১২
धृतराष्ट्र उवाच
लव्धं प्रशमय़ेद्राजा निक्षिपेद्धनिनो नरान् |
১৭ ক
आदि পর্ব
অধ্যায়
১১৪
वैशम्पाय़न उवाच
लव्धः प्रसादो देवेन्द्रात्तमाह्वय़ शुचिस्मिते ||
২৬ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
১৫৮
वैशम्पाय़न उवाच
लव्धः शैलो वय़ं मुक्ता मणिमांस्ते सखा हतः |
২০ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
২৮২
मार्कण्डेय़ उवाच
लव्धचक्षुः प्रसन्नात्मा दृष्ट्या सर्वं ददर्श ह ||
১ খ
सौप्तिक পর্ব
অধ্যায়
১০
वैशम्पाय़न उवाच
लव्धचेतास्तु कौन्तेय़ः शोकविह्वलय़ा गिरा |
৯ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
১৭১
भीष्म उवाच
लव्धनाशो यथा मृत्युर्लव्धं भवति वा न वा ||
২৬ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৪৫
वैशम्पाय़न उवाच
लव्धप्रशमनं कृत्वा स राजा राजसत्तम |
১০ ক
शल्य পর্ব
অধ্যায়
১০
सञ्जय़ उवाच
लव्धलक्षाः परे राजन्रक्षिताश्च महात्मना |
৮ ক