कर्ण পর্ব
অধ্যায়
৬
सञ्जय़ उवाच
लव्धलक्षैः परैर्हृष्टैर्व्याय़च्छद्भिश्चिरं तदा |
৫ ক
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
৬০
सञ्जय़ उवाच
लव्धलक्ष्यः प्रहारी च वय़ं च श्रान्तवाहनाः |
৬৮ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
৪৫
सञ्जय़ उवाच
लव्धलक्ष्यतय़ा कर्ष्णेः सर्वे भीष्ममुखा रथाः |
১৫ ক
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
১৪৮
सञ्जय़ उवाच
लव्धलक्ष्यस्तु राधेय़ः पाञ्चालानां महारथान् |
৯ ক
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
৮৭
सञ्जय़ उवाच
लव्धलक्ष्या रणे राजन्नैरावणसमा युधि ||
৩৪ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
১৫৬
वासुदेव उवाच
लव्धलक्ष्या हि कौरव्या विधमन्ति चमूं तव |
৩৩ ক
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
১১৯
सञ्जय़ उवाच
लव्धलक्ष्याश्च सङ्ग्रामे वहवश्चित्रय़ोधिनः |
২১ ক
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
৩২
सञ्जय़ उवाच
लव्धलक्ष्यैः परैर्दीना भृशावहसिता रणे ||
৩ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
২৯
सञ्जय़ उवाच
लव्धलक्ष्यौ तु गान्धारावहतां पाण्डवं पुनः |
১০ ক
आदि পর্ব
অধ্যায়
৫৫
वैशम्पाय़न उवाच
लव्धवांस्तत्र वीभत्सुर्भार्यां राजीवलोचनाम् |
৩৩ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১৮
वैशम्पाय़न उवाच
लव्धवानस्मि तान्कामानहं वै पाण्डुनन्दन |
৩ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
১০৭
सुपर्ण उवाच
लव्धवान्युध्यमानौ द्वौ वृहन्तौ गजकच्छपौ ||
১৬ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
২১৯
नमुचिरु उवाच
लव्धव्यान्येव लभते गन्तव्यान्येव गच्छति |
২২ ক
सभा পর্ব
অধ্যায়
৪৪
शकुनिरु उवाच
लव्धश्च नाभिभूतोऽर्थः पित्र्योंऽशः पृथिवीपते |
৪ ক
आदि পর্ব
অধ্যায়
১২
सूत उवाच
लव्धसञ्ज्ञो रुरुश्चाय़ात्तच्चाचख्यौ पितुस्तदा |
৫ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৫৯
भीष्म उवाच
लव्धस्य च प्रशमनं सतां चैव हि पूजनम् |
৬৫ ক
सभा পর্ব
অধ্যায়
৪৪
शकुनिरु उवाच
लव्धान्यस्त्राणि दिव्यानि तर्पय़ित्वा हुताशनम् ||
৫ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
২১
वासुदेव उवाच
लव्धालोकश्च राजेन्द्र पुनः शत्रुमय़ोधय़म् ||
৩৮ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
১৩
वैशम्पाय़न उवाच
लव्धाहमपि तत्रैव वसता सव्यसाचिना |
১০২ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
১১৬
युधिष्ठिर उवाच
लव्धुं लव्ध्वा चापि सदा रक्षितुं भरतर्षभ ||
১৩ গ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
১৬৪
सञ्जय़ उवाच
लव्धो द्रोणविनाशाय़ समिद्धाद्धव्यवाहनात् ||
১১২ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
২৯৪
वैशम्पाय़न उवाच
लव्ध्वा कृष्णां सैन्धवं द्रावय़ित्वा; विप्रैः सार्धं काम्यकादाश्रमात्ते |
৪২ ক
आदि পর্ব
অধ্যায়
১১
डुण्डुभ उवाच
लव्ध्वा च स पुनः सञ्ज्ञां मामुवाच तपोधनः |
৩ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
১২৩
लोमश उवाच
लव्ध्वा तु च्यवनो भार्यां वय़ोरूपं च वाञ्छितम् |
২০ ক
शल्य পর্ব
অধ্যায়
১
वैशम्पाय़न उवाच
लव्ध्वा तु स नृपः सञ्ज्ञां वेपमानः सुदुःखितः |
৪২ ক
विराट পর্ব
অধ্যায়
৬১
वैशम्पाय़न उवाच
लव्ध्वा तु सञ्ज्ञां च कुरुप्रवीरः; पार्थं समीक्ष्याथ महेन्द्रकल्पम् |
১৯ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
২৭
वैशम्पाय़न उवाच
लव्ध्वा महीं व्राह्मणसम्प्रय़ोगा; त्तेष्वाचरन्दुष्टमतो व्यनश्यत् ||
১৩ খ
आदि পর্ব
অধ্যায়
২১৬
वैशम्पाय़न उवाच
लव्ध्वा रथं धनुश्चैव तथाक्षय़्यौ महेषुधी |
২০ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
২৯৩
वैशम्पाय़न उवाच
लव्ध्वा लोकेऽभवत्ख्यातः परमेष्वासतां गतः ||
১৭ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
৪
वैशम्पाय़न उवाच
लव्ध्वा वरं तु कौन्तेय़ो जलादुत्तीर्य धर्मवित् |
৪ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
১০২
कण्व उवाच
लव्ध्वा वरं तु सुमुखः सुमुखः सम्वभूव ह |
২৮ ক
आदि পর্ব
অধ্যায়
২০১
नारद उवाच
लव्ध्वा वराणि सर्वाणि दैत्येन्द्रावपि तावुभौ |
২৬ ক
कर्ण পর্ব
অধ্যায়
২৪
दुर्योधन उवाच
लव्ध्वा वहुविधान्रामः प्रणम्य शिरसा शिवम् ||
১৫৫ খ
आदि পর্ব
অধ্যায়
৪৬
मन्त्रिण ऊचुः
लव्ध्वा वित्तं निववृते तक्षकाद्यावदीप्सितम् ||
২১ খ
आदि পর্ব
অধ্যায়
৩৯
सूत उवाच
लव्ध्वा वित्तं मुनिवरस्तक्षकाद्यावदीप्सितम् ||
১৯ গ
आश्रमवासिक পর্ব
অধ্যায়
৭
धृतराष्ट्र उवाच
लव्ध्वा सञ्जीवितोऽस्मीति मन्ये कुरुकुलोद्वह ||
৫ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
২
वलदेव उवाच
लव्ध्वा हि राज्यं पुरुषप्रवीराः; सम्यक्प्रवृत्तेषु परेषु चैव |
৩ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
১১৫
अकृतव्रण उवाच
लव्ध्वा हय़सहस्रं तु तांश्च दृष्ट्वा दिवौकसः ||
১৭ গ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
১৩
सहदेव उवाच
लव्ध्वापि पृथिवीं कृत्स्नां सहस्थावरजङ्गमाम् |
৯ ক
आश्वमेधिक পর্ব
অধ্যায়
১৩
वासुदेव उवाच
लव्ध्वापि पृथिवीं सर्वां सहस्थावरजङ्गमाम् |
৬ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
২৭
सञ्जय़ उवाच
लव्ध्वापीमां पृथिवीं सागरान्तां; जरामृत्यू नैव हि त्वं प्रजह्याः |
২৬ ক
शल्य পর্ব
অধ্যায়
৬
शल्य उवाच
लाघवं चास्त्रवीर्यं च भुजय़ोश्च वलं युधि ||
১৪ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
৪৯
सञ्जय़ उवाच
लाघवं चास्त्रय़ोगं च वलं वाह्वोश्च भारत ||
৩২ খ
आदि পর্ব
অধ্যায়
৯৬
वैशम्पाय़न उवाच
लाघवं तस्य ते दृष्ट्वा संय़ुगे सर्वपार्थिवाः |
৩৪ ক
आदि পর্ব
অধ্যায়
১২৩
वैशम्पाय़न उवाच
लाघवं दर्शय़न्नस्त्रे मुमोच युगपद्यथा ||
১৯ খ
कर्ण পর্ব
অধ্যায়
৩৯
सञ्जय़ उवाच
लाघवं द्रोणपुत्रस्य दृष्ट्वा तत्र महारथाः |
৮ ক
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
৪২
सञ्जय़ उवाच
लाघवं द्रोणशिष्याणामपश्यं भरतर्षभ |
২১ ক
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
৮০
सञ्जय़ उवाच
लाघवं परमास्थाय़ गौतमं समुपाद्रवत् ||
২৭ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
৯৩
सञ्जय़ उवाच
लाघवं युय़ुधानस्य दृष्ट्वा द्रोणो महारथः |
১৩ ক
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
৭৩
सञ्जय़ उवाच
लाघवं वासवस्येव सम्प्रेक्ष्य द्विजसत्तमः ||
৩৮ খ