chevron_left  भक्षान्नपानीय़रसप्रदाता;arrow_drop_down
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ৫৭
वैशम्पाय़न उवाच
भक्षान्नपानीय़रसप्रदाता; सर्वानवाप्नोति रसान्प्रकामम् |
৩৭ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ৪৫
वैशम्पाय़न उवाच
भक्षान्नपानैर्विविधैर्वासोभिः शय़नासनैः |
৯ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ৬৩
नारद उवाच
भक्षान्फाणितसंय़ुक्तान्दत्त्वा सौभाग्यमृच्छति ||
১৩ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ১৩৭
पूजन्यु उवाच
भक्षार्थं क्रीडनार्थं वा नरा वाञ्छन्ति पक्षिणः |
৫৬ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ১৩৬
भीष्म उवाच
भक्षार्थं लेलिहद्वक्त्रं भूमावूर्ध्वमुखं स्थितम् ||
৩১ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ৭৩
व्रह्मो उवाच
भक्षार्थं विक्रय़ार्थं वा येऽपहारं हि कुर्वते |
২ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ২৪
व्यास उवाच
भक्षितानि मय़ा राजंस्तत्र मां शाधि माचिरम् ||
১৫ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায় ১০২
कण्व उवाच
भक्षितो वैनतेय़ेन दुःखार्तास्तेन वै वय़म् ||
১৪ গ
वन পর্ব
অধ্যায় ১৯৯
मार्कण्डेय़ उवाच
भक्ष्यं नैव भवेन्मांसं कस्यचिद्द्विजसत्तम ||
১০ খ
शल्य পর্ব
অধ্যায় ৩৬
वैशम्पाय़न उवाच
भक्ष्यं पेय़ं च विविधं व्राह्मणान्प्रत्यपादय़त् ||
৫৬ গ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ১৫৮
भीष्म उवाच
भक्ष्यं भोज्यमथो लेह्यं यच्चान्यत्साधु भोजनम् |
১১ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ১৩৬
भीष्म उवाच
भक्ष्यं मृगय़माणस्य कः प्राज्ञो विषय़ं व्रजेत् ||
১৬৭ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ১৩৬
भीष्म उवाच
भक्ष्यं मृगय़से नूनं सुखोपाय़मसंशय़म् ||
১৬১ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ১২৪
भीष्म उवाच
भक्ष्यं वाप्यथ वा लेह्यं तत्सर्वं वर्जय़ाम्यहम् ||
১৪ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ২০১
नारद उवाच
भक्ष्यतां भुज्यतां नित्यं रम्यतां गीय़तामिति |
৩০ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ২
वैशम्पाय़न उवाच
भक्ष्यते सलिले मत्स्यैस्तथा सर्वेण वित्तवान् ||
৩৯ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ১১৭
भीष्म उवाच
भक्ष्यन्ते तेऽपि तैर्भूतैरिति मे नास्ति संशय़ः ||
৩৩ খ
शल्य পর্ব
অধ্যায় ৩৪
वैशम्पाय़न उवाच
भक्ष्यपेय़स्य कुर्वन्ति राशींस्तत्र समन्ततः ||
২২ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ৫৪
भीष्म उवाच
भक्ष्यभोज्यमनन्तं च तत्र तत्रोपकल्पितम् ||
৯ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ৬২
भीष्म उवाच
भक्ष्यभोज्यमय़ाः शैला वासांस्याभरणानि च ||
৪৯ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ৭০
भीष्म उवाच
भक्ष्यभोज्यमय़ाञ्शैलान्वासांसि शय़नानि च |
২৪ ক
सभा পর্ব
অধ্যায় ৩২
वैशम्पाय़न उवाच
भक्ष्यभोज्याधिकारेषु दुःशासनमय़ोजय़त् |
৪ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ১৩৩
महेश्वर उवाच
भक्ष्यभोज्यान्नपानानां वाससां च प्रदाय़कः ||
২ খ
वन পর্ব
অধ্যায় ২৪২
वैशम्पाय़न उवाच
भक्ष्यभोज्यान्नपानेन माल्यैश्चापि सुगन्धिभिः |
২২ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায় ১৪৯
वैशम्पाय़न उवाच
भक्ष्यभोज्योपपन्नानि शतशोऽथ सहस्रशः ||
৭৬ খ
वन পর্ব
অধ্যায় ৩৩
द्रौपद्यु उवाच
भक्ष्यमाणो ह्यनावापः क्षीय़ते हिमवानपि ||
৯ খ
सभा পর্ব
অধ্যায় ১৯
वैशम्पाय़न उवाच
भक्ष्यमाल्यापणानां च ददृशुः श्रिय़मुत्तमाम् |
২২ ক
आश्वमेधिक পর্ব
অধ্যায় ৯১
वैशम्पाय़न उवाच
भक्ष्यषाण्डवरागाणां क्रिय़तां भुज्यतामिति |
৩৮ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ২১২
मार्कण्डेय़ उवाच
भक्ष्या वै विविधैर्भावैर्भविष्यथ शरीरिणाम् |
১০ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ১৩১
श्येन उवाच
भक्ष्याद्विलोपितस्याद्य मम प्राणा विशां पते |
৮ ক
भीष्म পর্ব
অধ্যায় ১১৬
सञ्जय़ उवाच
भक्ष्यानुच्चावचांस्तत्र वारिकुम्भांश्च शीतलान् ||
১১ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ৫৯
भीष्म उवाच
भक्ष्याभक्ष्यं च राजेन्द्र दोषादोषं च नात्यजन् ||
২০ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ৩৬
व्यास उवाच
भक्ष्याभक्ष्येषु सर्वेषु वाच्यावाच्ये तथैव च |
৪০ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ১৩৬
भीष्म उवाच
भक्ष्यार्थमेव वद्धस्त्वं स मुक्तः प्रसृतः क्षुधा |
১৬২ ক
आदि পর্ব
অধ্যায় ২১৪
वैशम्पाय़न उवाच
भक्ष्यैर्भोज्यैश्च पेय़ैश्च रसवद्भिर्महाधनैः |
১৯ ক
सभा পর্ব
অধ্যায় ১১
नारद उवाच
भक्ष्यैर्भोज्यैश्च विविधैर्यथाकामपुरस्कृतैः |
৫৯ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায় ৩৪
विदुर उवाच
भक्ष्योत्तमप्रतिच्छन्नं मत्स्यो वडिशमाय़सम् |
১৩ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ২৪
व्यास उवाच
भक्षय़न्तं तु तं दृष्ट्वा शङ्खो भ्रातरमव्रवीत् |
৭ ক
द्रोण পর্ব
অধ্যায় ৭২
सञ्जय़ उवाच
भक्षय़न्तः स्म मांसानि पिवन्तश्चापि शोणितम् |
১৪ ক
वन পর্ব
অধ্যায় ১৮৫
मार्कण्डेय़ उवाच
भक्षय़न्ति यथा वृत्तिर्विहिता नः सनातनी ||
৮ খ
स्त्री পর্ব
অধ্যায় ২২
गान्धार्यु उवाच
भक्षय़न्ति शिवा गृध्रा जनार्दन जय़द्रथम् ||
৯ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ৬৩
वैशम्पाय़न उवाच
भक्षय़न्ति स्म मांसानि प्रकुट्य विधिवत्तदा ||
২৩ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ৩৯
सूत उवाच
भक्षय़न्तु भवन्तो वै स्वादूनीमानि सर्वशः |
২৮ ক
आदि পর্ব
অধ্যায় ১৭২
गन्धर्व उवाच
भक्षय़न्दृश्यते वह्निः सदा पर्वणि पर्वणि ||
১৭ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায় ১১৬
भीष्म उवाच
भक्षय़न्निरय़ं याति नरो नास्त्यत्र संशय़ः ||
৪২ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ৩
सूत उवाच
भक्षय़स्वोत्तङ्क |
১০৪ খ
आदि পর্ব
অধ্যায় ২৬
सूत उवाच
भक्षय़ामास गरुडस्तावुभौ गजकच्छपौ ||
২৬ খ
आश्वमेधिक পর্ব
অধ্যায় ৯৩
नकुल उवाच
भक्षय़ामास राजेन्द्र न च तुष्टिं जगाम सः ||
১৬ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায় ৩০০
याज्ञवल्क्य उवाच
भक्षय़ामास वलवान्वाय़ुरष्टात्मको वली |
১০ ক
आदि পর্ব
অধ্যায় ১৬৬
गन्धर्व उवाच
भक्षय़ामास सङ्क्रुद्धः सिंहः क्षुद्रमृगानिव ||
৩৮ খ