शान्ति পর্ব
অধ্যায়
১০৮
युधिष्ठिर उवाच
लघुनादेशरूपेण ग्रन्थय़ोगेन भारत ||
৫ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
৯০
वैशम्पाय़न उवाच
लघुर्भव महाराज लघुः स्वैरं गमिष्यसि ||
১৮ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
৮৯
धृतराष्ट्र उवाच
लघुवृत्ताय़तप्राणं सारगात्रमनामय़म् ||
৩ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
৭২
धृतराष्ट्र उवाच
लघुवृत्ताय़तप्राय़ं सारगात्रमनामय़म् ||
৩ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
৬৩
वृहदश्व उवाच
लघुश्च ते भविष्यामि शीघ्रमादाय़ गच्छ माम् ||
৭ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
১৬৩
सञ्जय़ उवाच
लघुसन्धानय़ोगाभ्यां रथय़ोश्च रणेन च |
২২ ক
कर्ण পর্ব
অধ্যায়
১৮
सञ्जय़ उवाच
लघ्वस्त्रश्चित्रय़ोधी च जितकाशी च संय़ुगे ||
১৯ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
৮৫
सञ्जय़ उवाच
लघ्वस्त्रश्चित्रय़ोधी च तथा लघुपराक्रमः |
৫৫ ক
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
৮৫
सञ्जय़ उवाच
लघ्वस्त्रश्चित्रय़ोधी च प्रविष्टस्तात भारतीम् ||
৮০ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
১৬৭
भीष्म उवाच
लघ्वस्त्रश्चित्रय़ोधी च मनस्वी दृढविक्रमः |
৩ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
২৩৭
व्यास उवाच
लघ्वाशी निय़ताहारः सकृदन्ननिषेविता ||
৬ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
১৮০
भृगुरु उवाच
लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यत्यात्मानमात्मनि ||
২৮ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
২০৩
व्याध उवाच
लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यन्नात्मानमात्मनि ||
৩৭ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
৪২
वैशम्पाय़न उवाच
लघ्वी वसुमती चापि कर्तव्या विष्णुना सह ||
২২ গ
वन পর্ব
অধ্যায়
২৭৩
मार्कण्डेय़ उवाच
लङ्कां प्रवेशय़ामासुर्वाजिनस्तं रथं तदा |
২৫ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
২৫৯
मार्कण्डेय़ उवाच
लङ्काय़ाश्च्यावय़ामास युधि जित्वा धनेश्वरम् ||
৩২ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
২৪
भीष्म उवाच
लङ्घितं चावलीढं च कलिपूर्वं च यत्कृतम् |
৪ ক
सौप्तिक পর্ব
অধ্যায়
৭
द्रौणिरु उवाच
लङ्घय़न्तः प्लवन्तश्च वल्गन्तश्च महावलाः ||
৩২ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
২৬৮
मार्कण्डेय़ उवाच
लङ्घय़ित्वा पुरीं लङ्कां स्ववलस्य समीपतः ||
২১ খ
स्त्री পর্ব
অধ্যায়
২০
गान्धार्यु उवाच
लज्जमाना पुरेवैनं माध्वीकमदमूर्छिता ||
৭ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৫৫
वासुदेव उवाच
लज्जय़ा परय़ोपेतो धर्मात्मा स युधिष्ठिरः |
১১ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
২৪১
वैशम्पाय़न उवाच
लज्जय़ा व्रीडितो राजञ्जगाम स्वं निवेशनम् ||
১২ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
২৩৬
वैशम्पाय़न उवाच
लज्जय़ाधोमुखः सीदन्नुपासर्पत्सुदुःखितः ||
৫ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
৯১
सञ्जय़ उवाच
लज्जय़ावनते चापि प्रहृष्टैश्चैव तावकैः |
২ ক
कर्ण পর্ব
অধ্যায়
২৭
सञ्जय़ उवाच
लट्वेवाह्वय़से पाते कर्ण पार्थं धनञ्जय़म् ||
৪০ খ
आदि পর্ব
অধ্যায়
৬৪
वैशम्पाय़न उवाच
लतागृहपरिक्षिप्तान्मनसः प्रीतिवर्धनान् |
১১ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
১৩৬
भीष्म उवाच
लताजालपरिच्छन्नो नानाद्विजगणाय़ुतः ||
১৯ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
৩৭
विदुर उवाच
लताधर्मा त्वं सपुत्रः शालाः पाण्डुसुता मताः |
৫৯ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
২৯
वासुदेव उवाच
लताधर्मा धार्तराष्ट्राः शालाः सञ्जय़ पाण्डवाः |
৪৯ ক
विराट পর্ব
অধ্যায়
২৪
वैशम्पाय़न उवाच
लताप्रतानवहुले नानागुल्मसमावृते ||
১০ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
১৫৫
वैशम्पाय़न उवाच
लताभिश्चैव वह्वीभिः पुष्पिताः पादपोत्तमाः |
৭১ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
২৫
वैशम्पाय़न उवाच
लतावतानावनतः स पाण्डवै; र्महाद्रुमः पञ्चभिरुग्रधन्विभिः |
২৬ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
১৪৬
वैशम्पाय़न उवाच
लतावल्लीश्च वेगेन विकर्षन्पाण्डुनन्दनः |
৪০ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
১৫৫
वैशम्पाय़न उवाच
लताश्च विविधाकाराः पत्रपुष्पफलोच्चय़ाः ||
৬৮ খ
आदि পর্ব
অধ্যায়
২২৪
वैशम्पाय़न उवाच
लपिता प्रत्युवाचेदं सासूय़मिव भारत ||
৭ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১৪
वासुदेव उवाच
लप्स्यसे तनय़ं कृष्ण आत्मतुल्यमसंशय़म् ||
৪৮ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
১৭৮
भीष्म उवाच
लप्स्यसे निर्जिताँल्लोकाञ्शस्त्रपूतो महारणे ||
৩২ খ
आदि পর্ব
অধ্যায়
৭৩
शर्मिष्ठो उवाच
लप्स्यसे प्रतिय़ोद्धारं न हि त्वां गणय़ाम्यहम् ||
১১ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
১২৬
वैशम्पाय़न उवाच
लप्स्यसे वीरशय़नं काममेतदवाप्स्यसि |
২ ক
शल्य পর্ব
অধ্যায়
৫৯
युधिष्ठिर उवाच
लभतां पाण्डवः कामं धर्मेऽधर्मेऽपि वा कृते ||
৩৪ খ
आश्रमवासिक পর্ব
অধ্যায়
১৬
व्राह्मण उवाच
लभतां वीरलोकान्स ससहाय़ो नराधिपः |
১১ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১৪
उपमन्युरु उवाच
लभतां सर्वकामेभ्यः फलं त्वत्तो द्विजोत्तमः ||
১৭৩ খ
आदि পর্ব
অধ্যায়
১১৭
वैशम्पाय़न उवाच
लभतां सर्वधर्मज्ञः पाण्डुः कुरुकुलोद्वहः ||
৩১ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
৫৭
वैशम्पाय़न उवाच
लभते च चिरं स्थानं वलिपुष्पप्रदो नरः ||
২৬ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
২৯
श्रीभगवानु उवाच
लभते च ततः कामान्मय़ैव विहितान्हि तान् ||
২২ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
৯৯
भीष्म उवाच
लभते नाम लोके च पितृभिश्च महीय़ते |
২৫ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
৩
सात्यकिरु उवाच
लभते परिषन्मध्ये व्याहर्तुमकुतोभय़ः ||
৫ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
১৬০
वैशम्पाय़न उवाच
लभते पुरुषः कीर्तिं प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ||
৮৭ খ
सभा পর্ব
অধ্যায়
৫
नारद उवाच
लभते मानमधिकं भूय़ो वा भक्तवेतनम् ||
৪২ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
৩৯
विदुर उवाच
लभते वुद्ध्यवज्ञानमवमानं च भारत ||
২ খ