अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১০
पुरोहित उवाच
एकं वै वरमिच्छामि यदि तुष्टोऽसि पार्थिव |
৪২ ক
आदि পর্ব
অধ্যায়
২১৬
वैशम्पाय़न उवाच
एकं शतसहस्रेण संमितं राष्ट्रवर्धनम् |
৬ ক
विराट পর্ব
অধ্যায়
৩৮
वैशम्पाय़न उवाच
एकं शतसहस्रेण संमितं राष्ट्रवर्धनम् ||
৬ খ
आश्वमेधिक পর্ব
অধ্যায়
২৬
व्राह्मण उवाच
एकं शास्तारमासाद्य शव्देनैकेन संस्कृताः |
১১ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৩০৪
याज्ञवल्क्य उवाच
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स तत्त्ववित् ||
৪ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
২৭
श्रीभगवानु उवाच
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ||
৫ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
২৯৩
वसिष्ठ उवाच
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स वुद्धिमान् ||
৩০ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
৯৮
सञ्जय़ उवाच
एकं सात्यकिमासाद्य कथं भीतोऽसि संय़ुगे ||
৪ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৬০
भीष्म उवाच
एकं साम यजुरेकमृगेका; विप्रश्चैकोऽनिश्चय़स्तेषु दृष्टः ||
৪৫ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
৯৭
सञ्जय़ उवाच
एकं सुवहवो युद्धे ततक्षुः साय़कैर्दृढम् ||
৩০ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৩৪
वैशम्पाय़न उवाच
एकं हत्वा यदि कुले शिष्टानां स्यादनामय़म् |
১৯ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
২৯৪
इन्द्र उवाच
एकं हनिष्यसि रिपुं गर्जन्तं वलिनं रणे |
২৭ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
৩৩
विदुर उवाच
एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मुक्तो धनुष्मता |
৪২ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
১৯০
मार्कण्डेय़ उवाच
एकं हि मे साय़कं चित्ररूपं; दिग्धं विषेणाहर सङ्गृहीतम् |
৭২ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
১২৭
सोमक उवाच
एकः कथञ्चिदुत्पन्नः पुत्रो जन्तुरय़ं मम |
১৪ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
৯০
वैशम्पाय़न उवाच
एकः कर्णः पराञ्जेतुं समर्थ इति निश्चितम् |
৭ ক
कर्ण পর্ব
অধ্যায়
২২
धृतराष्ट्र उवाच
एकः किरातरूपेण स्थितं शर्वमय़ोधय़त् ||
৩ খ
विराट পর্ব
অধ্যায়
৪৪
कृप उवाच
एकः कुरूनभ्यरक्षदेकश्चाग्निमतर्पय़त् ||
৫ খ
विराट পর্ব
অধ্যায়
৩৬
वैशम्पाय़न उवाच
एकः कोऽस्मानुपाय़ाय़ादन्यो लोके धनञ्जय़ात् ||
৩২ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
২৯
वासुदेव उवाच
एकः क्षत्ता धर्म्यमर्थं व्रुवाणो; धर्मं वुद्ध्वा प्रत्युवाचाल्पवुद्धिम् ||
৩৪ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
৩৩
विदुर उवाच
एकः क्षमावतां दोषो द्वितीय़ो नोपलभ्यते |
৪৭ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
২
वैशम्पाय़न उवाच
एकः खड्गधनुष्पाणिः परिचक्राम सूतजः ||
১৯ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
১৬০
वैशम्पाय़न उवाच
एकः खड्गधरो वीरः समर्थः प्रतिवाधितुम् ||
৪ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
১১৬
सञ्जय़ उवाच
एकः पञ्चाशतं शत्रून्सात्यकिः सत्यविक्रमः ||
৪ খ
आश्वमेधिक পর্ব
অধ্যায়
৩৩
व्राह्मण उवाच
एकः पन्था व्राह्मणानां येन गच्छन्ति तद्विदः |
৫ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
২৬৬
भीष्म उवाच
एकः पन्था हि मोक्षस्य तन्मे विस्तरतः शृणु ||
৪ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
৩৩
विदुर उवाच
एकः पापानि कुरुते फलं भुङ्क्ते महाजनः |
৪১ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
১২৬
भीष्म उवाच
एकः पुत्रो महारण्ये नष्ट इत्यसकृत्तदा ||
১৬ খ
विराट পর্ব
অধ্যায়
৩৬
वैशम्पाय़न उवाच
एकः पुत्रो विराटस्य शून्ये संनिहितः पुरे |
৩৩ ক
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
১১৫
धृतराष्ट्र उवाच
एकः प्रविष्टः सङ्क्रुद्धो नलिनीमिव कुञ्जरः ||
৭ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১১২
वृहस्पतिरु उवाच
एकः प्रसूतो राजेन्द्र जन्तुरेको विनश्यति |
১১ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
২২০
भीष्म उवाच
एकः प्राप्नोति विजय़मेकश्चैव पराभवम् ||
২৪ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
২৮৬
पराशर उवाच
एकः शत्रुर्न द्वितीय़ोऽस्ति शत्रु; रज्ञानतुल्यः पुरुषस्य राजन् |
২৮ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
২১৯
नमुचिरु उवाच
एकः शास्ता न द्वितीय़ोऽस्ति शास्ता; गर्भे शय़ानं पुरुषं शास्ति शास्ता |
৮ ক
सभा পর্ব
অধ্যায়
৫৭
दुर्योधन उवाच
एकः शास्ता न द्वितीय़ोऽस्ति शास्ता; गर्भे शय़ानं पुरुषं शास्ति शास्ता |
৮ ক
आश्वमेधिक পর্ব
অধ্যায়
২৬
व्राह्मण उवाच
एकः शास्ता न द्वितीय़ोऽस्ति शास्ता; यथा निय़ुक्तोऽस्मि तथा चरामि |
১ ক
आश्वमेधिक পর্ব
অধ্যায়
২৬
व्राह्मण उवाच
एकः श्रोता नास्ति ततो द्वितीय़ो; यो हृच्छय़स्तमहमनुव्रवीमि |
৪ ক
कर्ण পর্ব
অধ্যায়
৪২
सञ्जय़ उवाच
एकः स वारय़ामास प्रेक्षणीय़ः समन्ततः ||
৩২ গ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
৪৪
सञ्जय़ उवाच
एकः स शतधा राजन्दृश्यते स्म सहस्रधा |
২৩ ক
विराट পর্ব
অধ্যায়
৫৬
वैशम्पाय़न उवाच
एकः सङ्कालय़िष्यामि वज्रपाणिरिवासुरान् ||
১৩ খ
कर्ण পর্ব
অধ্যায়
৪০
सञ्जय़ उवाच
एकः सङ्ख्ये महेष्वासो योधय़न्वह्वशोभत ||
৬৯ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
৪১
सञ्जय़ उवाच
एकः सन्धारय़ामास पाण्डवानामनीकिनीम् ||
১৮ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
৩৩
विदुर उवाच
एकः सम्पन्नमश्नाति वस्ते वासश्च शोभनम् |
৪০ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
৯৬
धुन्धुमार उवाच
एकः सम्पन्नमश्नातु यस्ते हरति पुष्करम् ||
২১ খ
आदि পর্ব
অধ্যায়
১২৩
वैशम्पाय़न उवाच
एकः सर्वकुमाराणां वभूवातिरथोऽर्जुनः ||
৪৩ গ
आदि পর্ব
অধ্যায়
২৭
सूत उवाच
एकः सर्वपतत्रीणामिन्द्रत्वं कारय़िष्यति |
২৯ ক
शल्य পর্ব
অধ্যায়
৩১
सञ्जय़ उवाच
एकः सर्वानहं क्रुद्धो न तान्योद्धुमिहोत्सहे ||
১৪ খ
विराट পর্ব
অধ্যায়
৪৪
कृप उवाच
एकः सांय़मिनीं जित्वा कुरूणामकरोद्यशः ||
৭ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
৮৯
धृतराष्ट्र उवाच
एकः साधारणः पन्था रक्ष्यस्य सह रक्षिभिः ||
২৬ খ
विराट পর্ব
অধ্যায়
৪৪
कृप उवाच
एकः सुभद्रामारोप्य द्वैरथे कृष्णमाह्वय़त् |
৬ খ