शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৩২৭
वैशम्पाय़न उवाच
लोकतन्त्रस्य कृत्स्नस्य कथं कार्यः परिग्रहः |
৩৭ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৩২২
भीष्म उवाच
लोकतन्त्रस्य कृत्स्नस्य यस्माद्धर्मः प्रवर्तते ||
৩৬ খ
कर्ण পর্ব
অধ্যায়
১২
सञ्जय़ उवाच
लोकत्रासकरावास्तां विमार्गस्थौ ग्रहाविव ||
৪৯ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
৮৬
सञ्जय़ उवाच
लोकत्रय़ं योधय़ेय़ं सदेवासुरमानुषम् |
৬ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১৩৩
महेश्वर उवाच
लोकद्वेष्योऽधमः पुंसां स्वय़ं कर्मकृतैः फलैः |
৩৬ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
১৭০
भीष्म उवाच
लोकधर्मं समाज्ञाय़ ध्रुवाणामध्रुवैः सह ||
২১ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৩২৮
अर्जुन उवाच
लोकधाम जगन्नाथ लोकानामभय़प्रद ||
৫ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৫২
वैशम्पाय़न उवाच
लोकनाथ महावाहो शिव नाराय़णाच्युत |
২ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১৩৫
भीष्म उवाच
लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ||
৭ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
১৬৮
व्राह्मण उवाच
लोकपर्याय़वृत्तान्तं प्राज्ञो जानाति नेतरः ||
২১ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
৩৮
विदुर उवाच
लोकपर्याय़वृत्तान्तं प्राज्ञो जानाति नेतरः ||
৩০ খ
आदि পর্ব
অধ্যায়
২
सूत उवाच
लोकपालसभाख्यानं नारदाद्देवदर्शनात् |
৯৮ ক
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
১২৯
वैशम्पाय़न उवाच
लोकपाला भुजेष्वासन्नग्निरास्यादजाय़त ||
৫ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
৫২
वृहदश्व उवाच
लोकपालाः सहेन्द्रास्त्वां समाय़ान्ति दिदृक्षवः ||
৫ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
১৩
वैशम्पाय़न उवाच
लोकपालाश्च लोकाश्च नक्षत्राणि दिशो दश |
৫০ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৩১০
भीष्म उवाच
लोकपालाश्च लोकेशं साध्याश्च वसुभिः सह ||
১৭ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
৮৩
पुलस्त्य उवाच
लोकपालाश्च साध्याश्च नैरृताः पितरस्तथा |
৬৬ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
১৬৪
अर्जुन उवाच
लोकपालेषु यातेषु मामुवाचाथ मातलिः |
৩২ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
১৫৮
वैशम्पाय़न उवाच
लोकपालैर्महाभागैर्दिवं देववरैरिव ||
৮ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৬৪
भीष्म उवाच
लोकपालोत्तराश्चैव क्षात्रे धर्मे व्यवस्थिताः ||
১ খ
आश्रमवासिक পর্ব
অধ্যায়
১৪
धृतराष्ट्र उवाच
लोकपालोपमा ह्येते सर्वे धर्मार्थदर्शिनः ||
১১ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
২৫৯
मार्कण्डेय़ उवाच
लोकपालोपमान्पुत्रानेकैकस्या यथेप्सितान् ||
৬ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
২২২
वैशम्पाय़न उवाच
लोकपालोपमान्वीरान्यूनः परमसंमतान् |
৪ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
১৯৪
सञ्जय़ उवाच
लोकपालोपमैर्गुप्तं धृष्टद्युम्नपुरोगमैः ||
৩ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
৮৯
धृतराष्ट्र उवाच
लोकपालोपमैस्तात पालितं नरसत्तमैः ||
৯ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
৭২
धृतराष्ट्र उवाच
लोकपालोपमैस्तात पालितं लोकविश्रुतैः ||
১২ খ
आदि পর্ব
অধ্যায়
২২৪
वैशम्पाय़न उवाच
लोकपालोऽनृतां वाचं न तु वक्ता कथञ्चन |
১০ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১৭
उपमन्युरु उवाच
लोकपालोऽन्तर्हितात्मा प्रसादो हय़गर्दभिः |
৩৫ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১৩৯
वाय़ुरु उवाच
लोकपालोऽसि लोकानां न लोकस्य विलोपकः |
১৮ ক
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১৩৩
महेश्वर उवाच
लोकपूज्यो नमस्कर्ता प्रश्रितो मधुरं वदन् ||
২৪ খ
कर्ण পর্ব
অধ্যায়
৬
सञ्जय़ उवाच
लोकप्रवीरा येऽस्माकं देवकल्पा महारथाः |
১৩ ক
आदि পর্ব
অধ্যায়
২১৫
वैशम्पाय़न उवाच
लोकप्रवीरौ तिष्ठन्तौ खाण्डवस्य समीपतः ||
১ খ
वन পর্ব
অধ্যায়
১৩
वैशम्पाय़न उवाच
लोकभावन लोकेश यथा त्वां नारदोऽव्रवीत् ||
৪৬ খ
भीष्म পর্ব
অধ্যায়
৬৪
भीष्म उवाच
लोकभावनभावज्ञ इति त्वां नारदोऽव्रवीत् |
২ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
২৪১
व्यास उवाच
लोकमातुरमसूय़ते जन; स्तत्तदेव च निरीक्ष्य शोचते |
১৩ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
১৮৬
मार्कण्डेय़ उवाच
लोकमाविशते पूर्वमादित्यैरुपशोषितम् ||
৬০ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১১০
भीष्म उवाच
लोकमौशनसं दिव्यं शक्रलोकं च गच्छति |
৮৮ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
৫৭
भीष्म उवाच
लोकरञ्जनमेवात्र राज्ञां धर्मः सनातनः |
১১ ক
सभा পর্ব
অধ্যায়
৩২
वैशम्पाय़न उवाच
लोकराजविमानैश्च व्राह्मणावसथैः सह ||
১২ খ
अनुशासन পর্ব
অধ্যায়
১৩৫
भीष्म उवाच
लोकवन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ||
৯১ খ
सभा পর্ব
অধ্যায়
৪১
शिशुपाल उवाच
लोकविद्विष्टकर्मा हि नान्योऽस्ति भवता समः ||
২৩ খ
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
১১৫
भीष्म उवाच
लोकविद्वेषमापन्नो निष्फलं प्रतिपद्यते ||
৪ খ
द्रोण পর্ব
অধ্যায়
৬৮
सञ्जय़ उवाच
लोकविस्मापनमभूत्समुद्रस्येव शोषणम् ||
২৫ খ
उद्योग পর্ব
অধ্যায়
১৬৭
भीष्म उवाच
लोकवीरौ महेष्वासौ त्यक्तात्मानौ च भारत |
১৪ ক
सभा পর্ব
অধ্যায়
৫০
दुर्योधन उवाच
लोकवृत्ताद्राजवृत्तमन्यदाह वृहस्पतिः |
১৪ ক
शान्ति পর্ব
অধ্যায়
২৩৪
शुक उवाच
लोकवृत्तान्ततत्त्वज्ञः पूतोऽहं गुरुशासनात् |
৪ ক
वन পর্ব
অধ্যায়
২০৬
व्राह्मण उवाच
लोकवृत्तान्तवृत्तज्ञा नित्यं धर्मपराय़णाः ||
১৪ খ
आदि পর্ব
অধ্যায়
১৫০
युधिष्ठिर उवाच
लोकवृत्तिविरुद्धं वै पुत्रत्यागात्कृतं त्वय़ा ||
৬ খ
सभा পর্ব
অধ্যায়
৩৫
भीष्म उवाच
लोकवृद्धतमे कृष्णे योऽर्हणां नानुमन्यते ||
৬ খ
आदि পর্ব
অধ্যায়
১৮৭
द्रुपद उवाच
लोकवेदविरुद्धं त्वं नाधर्मं धार्मिकः शुचिः |
২৭ ক