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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
भीष्म उवाच
अनाहता दुन्दुभय़श्च नेदिरे; तथा प्रसन्नाश्च दिशश्चकाशिरे ||
८९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
अनाहता दुन्दुभय़ो विनेदुर्भृशनिस्वनाः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
अनाहताः पाण्डवानां नदन्ति पटहाः किल ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
अनाहिताग्निः शतगुरय़ज्वा च सहस्रगुः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
अनाहिताग्निरिति स प्रोच्यते धर्मदर्शिभिः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
शिविरु उवाच
अनाहिताग्निर्म्रिय़तां यज्ञे विघ्नं करोतु च |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो वहु भाषते |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
अनाहूतोपसृप्तानामनाहूतोपजल्पिनाम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
अनाय़क इवाचक्षुर्मुह्यत्यूह्येषु कर्मसु ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८२
वासुदेव उवाच
अनाय़सं मुने शस्त्रं मृदु विद्यामहं कथम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ८२
नारद उवाच
अनाय़सेन शस्त्रेण मृदुना हृदय़च्छिदा |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय ७३
शर्मिष्ठो उवाच
अनाय़ुधा साय़ुधाय़ा रिक्ता क्षुभ्यसि भिक्षुकि |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
अनाय़ुधेन वीरेण निहतः किं ततोऽधिकम् ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
अनाय़ुधो यः सुभुजो भुजाभ्यां; नराश्वनागान्युधि भस्म कुर्यात् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
अनाय़ुषः पुनः पुत्राश्चत्वारोऽसुरपुङ्गवाः |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
अनाय़ुषस्तु पुत्राणां चतुर्णां प्रवरोऽसुरः |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
अनाय़ुष्या भवेदीर्ष्या तस्मादीर्ष्यां विवर्जय़ेत् ||
१३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
अनाय़ुष्यो दिवास्वप्नस्तथाभ्युदितशाय़िता |
१३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
अनिकेतः परिपतन्वृक्षमूलाश्रय़ो मुनिः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३४
श्रीभगवानु उवाच
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रिय़ो नरः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय ८७
यय़ातिरु उवाच
अनिकेतो गृहस्थेषु कामवृत्तेषु संय़तः |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
अनिकेतोऽथ राजा स वभूव वनगोचरः |
१६ क
स्त्री पर्व
अध्याय १४
भीमसेन उवाच
अनिगृह्य पुरा पुत्रानस्मास्वनपकारिषु ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
अनिच्छतस्तव विभो जन्ममृत्युरनेकतः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय २५
अर्जुन उवाच
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय़ वलादिव निय़ोजितः ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
अनिच्छन्नपि सङ्क्रुद्धः प्रहसन्निदमव्रवीत् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
अनिच्छमानः कर्मेदं कृत्वा च परितप्यसे ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
अनिज्ययाविवाहैश्च वेदस्योत्सादनेन च |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
अनित्यं किल मर्त्यस्य चित्तं पार्थ चलाचलम् |
१९ क
स्त्री पर्व
अध्याय २
विदुर उवाच
अनित्यं जीवितं रूपं यौवनं द्रव्यसञ्चय़ः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
अनित्यं द्वन्द्वसंय़ुक्तं सत्त्वमाहुर्गुणात्मकम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
अनित्यं नित्यमव्यक्तमेवमेतद्धि शुश्रुम ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
ऋषय़ ऊचुः
अनित्यं नित्यमित्येके नास्त्यस्तीत्यपि चापरे |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसञ्चय़ः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसञ्चय़ः |
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
अनित्यं सर्वमेवेदमहं च मम चास्ति यत् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
पृथिव्यु उवाच
अनित्यं हि स्थितो यस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
अनित्यचित्तः पुरुषस्तस्मिन्को जातु विश्वसेत् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
अनित्यता च मर्त्यानामतः शोचामि पुत्रक ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय ८४
यय़ातिरु उवाच
अनित्यतां सुखदुःखस्य वुद्ध्वा; कस्मात्सन्तापमष्टकाहं भजेय़म् |
११ क
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अनित्यतां हि मर्त्यानां विजानासि न संशय़ः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६६
भीष्म उवाच
अनित्यत्वेन च स्नेहं क्षुधं योगेन पण्डितः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ७८
नकुल उवाच
अनित्यमतय़ो लोके नराः पुरुषसत्तम ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
अनित्यमध्रुवं सर्वं व्यवसाय़ो हि दुष्करः |
१०० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
अनित्यमिति जानन्तो न भवन्ति भवन्ति च |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८२
पराशर उवाच
अनित्यमिह मर्त्यानां जीवितं हि चलाचलम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
अनित्यमुपलक्ष्येदं कालपर्याय़मात्मनः |
५ क
विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
अनित्या किल मर्त्यानामर्थसिद्धिर्जय़ाजय़ौ |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
अनित्याः खलु मर्त्यानां गतय़ो भरतर्षभ |
१३ क