आदि पर्व
अध्याय
१५८
अर्जुन उवाच
अनिवार्यमसम्वाधं तव वाचा कथं वय़म् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
धृतराष्ट्र उवाच
अनिवार्यामसह्यां च देवैरपि सवासवैः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
अनिवृत्तस्य कालस्य क्षय़ं प्राप्तो न मुच्यते ||
९४ ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
अनिवृत्ते तु निर्वासे यदि वीभत्सुरागतः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
अनिशं चिन्तय़ानोऽपि य एनमुदिय़ाद्रथी ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
अनिशं चिन्तय़ानोऽपि यः प्रतीय़ाद्रथेन तम् ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१०
नारद उवाच
अनिशं दिव्यवादित्रैर्नृत्तैर्गीतैश्च सा सभा |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
अनिशं यत्र पुरुषा गणका लेखकास्तथा |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
अनिशं श्रूय़ते पार्थ त्वद्वन्धूनामनाथवत् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
अनिशं श्रूय़ते शव्दः क्षुत्कृशानां नृणामिव ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
अनिशं श्रूय़ते स्मात्र मुदितानां महात्मनाम् ||
४९ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
अनिशं सन्दधानस्य शरानुत्सृजतस्तदा |
६० क
वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
अनिशं सृज्यमानं तैरपतन्मद्रथोपरि ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
अनिशाय़ां निशाय़ां च सहाय़ाः क्षुत्पिपासय़ोः |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
अनिश्चय़ज्ञा धर्माणामदृष्टान्ते परे रताः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
अनिश्चय़ज्ञो हि नरः कार्याकार्यविनिश्चय़े |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
अनिश्चय़ो हि युद्धेषु द्वय़ोर्विवदमानय़ोः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
अनिष्कषाय़े काषाय़मीहार्थमिति विद्धि तत् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अनिष्टं चैव मे श्लिष्टं हृदय़ान्नापसर्पति |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
अनिष्टं लक्षणं कृष्ण येन दुःखान्युपाश्नुते ||
४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
अनिष्टं सर्वभूतानां मरणं नाम भारत |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
अनिष्टं स्वप्नमालक्ष्य गां नरः सम्प्रकीर्तय़ेत् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
अनिष्टतः सम्भवन्ति तथाय़ज्ञः प्रताय़ते ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
अनिष्टदर्शनं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नमवस्थितम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
अनिष्टदर्शनान्घोरानुत्पातान्परिचिन्तय़न् ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
अनिष्टनन्ती दुःखार्ता मनसा विममर्श ह ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
अनिष्टवद्धितं पश्येत्तथा क्षिप्रं विरज्यते ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
अनिष्टसम्प्रय़ोगाच्च विप्रय़ोगात्प्रिय़स्य च |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्याध उवाच
अनिष्टसम्प्रय़ोगाच्च विप्रय़ोगात्प्रिय़स्य च |
१६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२
विदुर उवाच
अनिष्टसम्प्रय़ोगाच्च विप्रय़ोगात्प्रिय़स्य च |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
अनिष्टस्य हि निर्वृत्तिरनिवृत्तिः प्रिय़स्य च |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
अनिष्टस्याभिनिर्वृत्तिमिष्टसंवृत्तिमेव च |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
अनिष्टा सर्वभूतानां कीर्तितानेन मेऽद्य वै ||
२३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
३
धृतराष्ट्र उवाच
अनिष्टानां च संसर्गादिष्टानां च विवर्जनात् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
अनिष्टानां सहस्राणि तथेष्टानां शतानि च |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
अनिष्टानि च भाग्यानि जानीत सह मूर्तिभिः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्याध उवाच
अनिष्टेनान्वितं पश्यंस्तथा क्षिप्रं विरज्यते |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
अनिष्टोपनिपातो वा तृतीय़ं नोपपद्यते ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
अनिष्ट्वा च महाय़ज्ञैरकृत्वा च पितृस्वधाम् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
अनिष्ट्वा संविभज्याथ पितृदेवातिथीन्गुरून् ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
अनिष्पन्दाः सुगन्धाश्च निराहारा जितेन्द्रिय़ाः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
अनिसृष्टानि गुरुणा फलानि पुरुषर्षभ |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
अनिसृष्टोऽसि निष्क्रान्तो गृहात्ताभ्यामनिन्दित |
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७१
और्व उवाच
अनिस्तीर्णो हि मां रोषो दहेदग्निरिवारणिम् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
अनिहत्य रणे पार्थं नाहमेष्यामि भारत ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
अनिय़तफलभक्ष्यभोज्यपेय़ं; विधिपरिणामविभक्तदेशकालम् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
अनिय़तशय़नासनः प्रकृत्या; दमनिय़मव्रतसत्यशौचय़ुक्तः |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
अनिय़त्तौ निय़न्तारावभीतौ स्म परन्तपौ ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
अनिय़म्याशुचिं लुव्धं पुत्रं कामवशानुगम् |
२७ क