शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
तान्युपादाय़ विस्रव्धो भक्षय़ामास स द्विजः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१११
लोमश उवाच
तान्यृश्यशृङ्गस्य महारसानि; भृशं सुरूपाणि रुचिं ददुर्हि ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
तान्येकस्थानि सर्वाणि ततस्त्वं प्रतिपत्स्यसे ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
तान्येतानि यथोक्तानि सौक्ष्म्यादीनि जनाधिप |
८६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
तान्येव कालेन समाहितानि; सिध्यन्ति चेध्यन्ति च भूतिकाले ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
तान्येव काष्ठानि यथा विमथ्य; धूमं च पश्येज्ज्वलनं च योगात् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
तान्येव प्रतिपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः ||
४७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
तान्येवाग्रे प्रलीय़न्ते पश्चाद्भूतकृता गुणाः |
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२५
व्यास उवाच
तान्येवाग्रे प्रलीय़न्ते भूमित्वमुपय़ान्ति च ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
तान्येवादाय़ गच्छध्वं स्ववेश्मानीति भारत ||
१९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
तान्येवाभ्युदिते सूर्ये समसज्जन्त भारत ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
तान्योधानव्रवीत्क्रुद्धो हतैनं वै सहस्रशः ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
तान्रथान्साधु सम्पन्नान्संय़ुक्ताञ्जवनैर्हय़ैः |
४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
तान्राजा स्वरय़ोगेन स्पर्शेन च महामनाः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२७४
मार्कण्डेय़ उवाच
तान्रामो जघ्निवान्सर्वान्दिव्येनास्त्रेण राक्षसान् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
तान्वद्ध्वा धर्मपाशैश्च स्वैश्च पाशैर्जलेश्वरः |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
तान्वध्यमानान्दृष्ट्वा तु भीमो भीमपराक्रमः |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
तान्वशे स्थापय़ित्वा स रत्नान्यादाय़ सर्वशः ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
तान्वा निहत्य सङ्ग्रामे प्रीतिं दास्यामि वै तव ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
तान्वा हतान्सुतान्वापि श्रुत्वा तदनुचिन्तय़ ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
तान्वा हनिष्यामि समेत्य सङ्ख्ये; भीष्माय़ वैष्यामि हतो द्विषद्भिः ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
तान्वा हनिष्यामि समेत्य सङ्ख्ये; यास्यामि वा द्रोणमुखाय़ मन्ये ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
तान्वाणैः पञ्चविंशत्या साश्वान्राजन्नरर्षभान् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
दुर्योधन उवाच
तान्वारय़ महावाहो केकय़ांश्च नरोत्तम |
७८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तान्वासवानन्तरजो निशम्य; नरेन्द्रमुख्यान्द्रवतः समन्तात् |
८० क
आदि पर्व
अध्याय
१९४
कर्ण उवाच
तान्विक्रमेण जित्वेमामखिलां भुङ्क्ष्व मेदिनीम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१४०
लोमश उवाच
तान्विगाहस्व पार्थाद्य तपसा च दमेन च |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
तान्विजेतुं मम भ्राता प्रय़ास्यति धनुर्धरः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
तान्विदित्वा भृशं त्रस्तानय़ुद्धमनसः परान् ||
४९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
शल्य उवाच
तान्विदित्वात्मनो दोषान्निर्मन्युर्भव मा क्रुधः ||
८४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
तान्विद्यावणिजो विद्धि राक्षसानिव भारत ||
१५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
तान्विधाता प्रसन्नात्मा लोकांश्चरति शाश्वतान् ||
६२ ग
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
तान्विनिर्जित्य तु रणे सर्वशस्त्रविशारदः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
गालव उवाच
तान्विसृज्य च मां प्राह पिता सास्राविलेक्षणः ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
तान्वीर्ययुक्तान्सुविशुद्धसत्त्वां; स्तेजस्विनः सत्यधृतिप्रधानान् |
२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तान्वुद्ध्वा रणमत्तोऽसौ द्रोणपुत्रो व्यपोथय़त् ||
९८ ख
वन पर्व
अध्याय
२४४
वैशम्पाय़न उवाच
तान्वेपमानान्वित्रस्तान्वीजमात्रावशेषितान् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
८५
यय़ातिरु उवाच
तान्वै तुदन्ति प्रपततः प्रपातं; भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
तान्वै विमनसो दृष्ट्वा माद्रीपुत्रः प्रतापवान् |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
तान्वै सरथहस्त्यश्वान्प्राहिणोद्यमसादनम् |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
तान्वै सर्वान्हनिष्यामि यद्यपि स्युरमानुषाः ||
१९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
तान्व्रूय़ाद्दशपाय़ासौ स तु विंशतिपाय़ वै ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
तान्वय़ं प्रतिगर्जन्तः प्रत्युद्यातास्त्वमर्षिताः |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
तान्वय़ं प्रतिनृत्यामः पुनर्गौरिति गौरिति ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
तान्स गाण्डीवनिर्मुक्तान्वज्राशनिसमप्रभान् |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
तान्स सप्तशतान्नागान्सारोहाय़ुधकेतनान् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
तान्स सम्पूजय़ामास कौन्तेय़ो विधिवद्द्विजान् |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तान्संमिमर्दिषुर्नागान्पार्ष्ण्यङ्गुष्ठाङ्कुशैर्भृशम् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
तान्समभ्ययुरव्यग्रास्तदद्भुतमिवाभवत् ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
तान्समापततः सर्वान्भारद्वाजो महारथः |
९ क