chevron_left  अव्राह्मणंarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय ७१
शुक्र उवाच
अव्राह्मणं कर्तुमिच्छन्ति रौद्रा; स्ते मां यथा प्रस्तुतं दानवैर्हि |
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
अव्राह्मणं तु मन्यन्ते शूद्रापुत्रमनैपुणात् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय २८
युधिष्ठिर उवाच
अव्राह्मणाः सन्ति तु ये न वैद्याः; सर्वोच्छेदं साधु मन्येत तेभ्यः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
अव्राह्मणानां वित्तस्य स्वामी राजेति वैदिकम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ७८
भीष्म उवाच
अव्राह्मणानां वित्तस्य स्वामी राजेति वैदिकम् |
२ क
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
अव्राह्मणाश्च पुरुषा राजञ्शिष्टं धनं मम |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३
नारद उवाच
अव्राह्मणे न हि व्रह्म ध्रुवं तिष्ठेत्कदाचन ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
अव्राह्मणो मन्यमानस्तृणेष्वासीत पृष्ठतः |
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय २०
द्रौपद्यु उवाच
अव्रुवं कामसंमूढमात्मानं रक्ष कीचक ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
अव्रुवं कारणं किं तद्यत्त्वं योद्धुमिहेच्छसि ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
अव्रुवं च तदा कृष्ण देवराजमिदं वचः ||
९३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
अव्रुवं च तदा देवं हर्षगद्गदय़ा गिरा |
१७८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
अव्रुवं तमहं व्रह्मंस्त्वत्प्रसादान्महामुने |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
अव्रुवं पाण्डवान्गत्वा तन्निवोधत पार्थिवाः ||
१७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रुवं पुरुषव्याघ्र यतो धर्मस्ततो जय़ः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रुवं पुरुषव्याघ्र सखाय़ं विद्धि मामिति ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय १६८
अर्जुन उवाच
अव्रुवं मातलिं भीतं पश्य मे भुजय़ोर्वलम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
अव्रुवं मातलिं हृष्टो याह्येतत्पुरमञ्जसा ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
व्यास उवाच
अव्रुवं यदहं तात आत्मसाक्षिकमञ्जसा ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
भीष्म उवाच
अव्रुवंश्च पिशाचास्तं नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २३०
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रुवंश्च महाराज यदूचुः कौरवं प्रति ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रुवंश्च महाराज सर्वाः सास्राविलेक्षणाः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय २३
सूत उवाच
अव्रुवंश्च महावीर्यं सुपर्णं पतगोत्तमम् ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
अव्रुवंश्चासकृद्वीरा भीमसेनमिदं वचः ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रुवंस्तत्र राजानो निर्वेदादात्मनिश्चय़ात् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
अव्रुवन्कर्ण युध्यस्व वहु कत्थसि सूतज |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
अव्रुवन्कस्यचिन्निन्दामात्मपूजामवर्णय़न् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
अव्रुवन्कस्यचिन्निन्दामात्मपूजामवर्णय़न् |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
भीष्म उवाच
अव्रुवन्गच्छ पन्थानमास्थाय़ेमं द्विजोत्तम ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रुवन्तो मुखं राज्ञः समुदैक्षन्त भारत ||
१६ ख
मौसल पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रुवन्त्यो महात्मानं परिवार्योपतस्थिरे ||
१४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
अव्रुवन्दीनकण्ठेन क्षिप्रमाद्रवतेति वै ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२
शल्य उवाच
अव्रुवन्देवराजानं नहुषं घोरदर्शनम् ||
१ ख
मौसल पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रुवन्नुपसङ्गम्य दैवदण्डनिपीडिताः ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रुवन्नृषय़ो राजन्नाय़ं यज्ञो महाफलः |
११ ख
वन पर्व
अध्याय ५१
वृहदश्व उवाच
अव्रुवन्नैषधं राजन्नवतीर्य नभस्तलात् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
अव्रुवन्परुषं किञ्चिदसतो नार्थय़ंस्तथा ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
अव्रुवन्वाति सुरभिर्गन्धः सुमनसां शुचिः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
अव्रुवन्व्राह्मणाः सिद्धा भूतान्यन्तर्हितानि च |
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
च्यवन उवाच
अव्रुवन्सहिताः शक्रं प्रणमास्मै द्विजातय़े |
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
अव्रुवन्सैनिकास्तत्र दृष्ट्वा द्रोणस्य विक्रमम् |
४० क
वन पर्व
अध्याय १३७
लोमश उवाच
अव्रूतां तौ तदा रैभ्यं किं कार्यं करवामहे ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
धृतराष्ट्र उवाच
अशक्त इति मन्वानैः पुत्रैर्मम निराकृतः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
अशक्तं क्षत्रिय़ं मत्वा शस्त्रं गृह्णात्यथापरः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ७९
यदुरु उवाच
अशक्तः कार्यकरणे परिभूतः स यौवनैः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
अशक्तः क्षत्रधर्मेण वैश्यधर्मेण वर्तय़ेत् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
अशक्तः पूर्वमासीस्त्वं कथञ्चिच्छक्ततां गतः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११२
नारद उवाच
अशक्तः प्रतिकर्तुं तद्भवन्तं शरणं गतः ||
१६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
अशक्तः प्रतिसंहारे परमास्त्रस्य संय़ुगे |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
दुर्योधन उवाच
अशक्तः समरे जेतुं किं पुनस्तात पाण्डवाः ||
३८ ख