chevron_left  अनुक्रोशात्प्रदातव्यंarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
अनुक्रोशात्प्रदातव्यं दीनेष्वेवं नरेष्वपि ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय ३८
सूत उवाच
अनुक्रोशात्मतां तस्य शमीकस्यावधार्य तु |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६६
भीष्म उवाच
अनुक्रोशादधर्मं च जय़ेद्धर्ममुपेक्षय़ा |
९ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
अनुक्रोशेन चानेन सर्वभूतेषु भारत ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
अनुक्रोशैस्तथा शूद्रा दानशेषैः पृथग्जनाः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
अनुक्रोशो हि साधूनां सुमहद्धर्मलक्षणम् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय २२२
शार्ङ्गका ऊचुः
अनुगच्छ स्वभर्तारं पुत्रानाप्स्यसि शोभनान् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
अनुगच्छंश्च तेजस्वी निवृत्तोऽथ किरीटभृत् |
२ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
अनुगच्छति देवेशं व्रह्मण्यः कृत्तिकासुतः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
अनुगम्य गतीनां च सर्वासामेव निश्चय़म् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
अनुगम्य च राजानं यथेष्टं गम्यतामिति |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
अनुगम्य श्मशानान्तं निवर्तन्तीह वान्धवाः |
७३ क
सभा पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अनुगम्यमानः शुशुभे शिष्यैरिव गुरुः प्रिय़ैः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
अनुगम्यमाना व्यासेन नारदेनासितेन च |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय २११
वैशम्पाय़न उवाच
अनुगम्यमानो गन्धर्वैरचरत्तत्र भारत ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
अनुगाश्चास्य वित्रस्ताः प्राद्रवन्सर्वतोदिशम् ||
७ ग
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
अनुगाय़माना ललना रहः पर्यचरत्तदा ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अनुगीता ततः पर्व ज्ञेय़मध्यात्मवाचकम् ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय २९५
वैशम्पाय़न उवाच
अनुगुप्तफलाहाराः सर्व एव मिताशनाः |
४ क
वन पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
अनुगृहीतोऽस्मीति ||
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
अनुगृह्णन्ति चान्योन्यं यदा रक्षति भूमिपः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
अनुगृह्णन्ति भूतानि स्वेन वृत्तेन पार्थिव |
२ क
सभा पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
अनुगृह्णन्प्रजाः सर्वाः सर्वधर्मविदां वरः |
७ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
अनुगृह्णन्प्रजाः सर्वाः स्वधर्मनिरताः सदा ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
अनुगृह्णाति दातारं तथा सर्वरसैर्मही ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय १४४
वैशम्पाय़न उवाच
अनुगृह्य सुहृद्वर्गं धनेन च सुखेन च |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
अनुगोप्ता सुगोप्ता च नप्ता चेश्वर एव च |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३००
याज्ञवल्क्य उवाच
अनुग्रसत्यनन्तं हि महात्मा विश्वमीश्वरः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
अनुग्रहं च मित्राणाममित्राणां च निग्रहम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
अनुग्रहं तु नागानां यं चक्रुः शृणु तं प्रभो |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
अनुग्रहः पशूणां हि संस्कारो विधिचोदितः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय १३१
राजो उवाच
अनुग्रहमिमं मन्ये श्येन यन्माभिय़ाचसे |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत्प्रशस्यते ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५६
भीष्म उवाच
अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
अनुग्रहानेवमेष करोति भगवान्विभुः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
अनुग्रहार्थं जगतः सर्वकामदुघां वराम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
अनुग्रहार्थं लोकानां विष्णुर्लोकनमस्कृतः |
८३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अनुग्रहार्थमस्माकं तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम् ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
निषादा ऊचुः
अनुग्रहार्थमस्माकमिय़ं गौः प्रतिगृह्यताम् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
अनुग्रहेण भूतानां पुण्यमेषां प्रवर्धते ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १४८
वैशम्पाय़न उवाच
अनुग्रहो मे सुमहांस्तृप्तिश्च तव दर्शनात् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
अनुग्राह्या वय़ं नूनं भवतामिति मे मतिः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
अनुग्राह्याः पाण्डुसुता नूनं तव पितामह |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
अनुचिन्त्यात्मनः पुत्रमविषह्यमरातिभिः ||
७६ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
अनुचिन्तय़तश्चापि तामेवाय़तलोचनाम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
अनुच्छेदाय़ लोकानामनुच्छेदाय़ कर्मणाम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४५
व्यास उवाच
अनुच्छ्वासान्यमूर्तीनि यानि वज्रोपमान्यपि ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
अनुच्यमानाश्च पुनस्ते मन्यन्ते महाजनात् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
अनुजं हि पितुर्दाय़ो जङ्घाश्रमफलोऽध्वगः |
११ क