शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
वय़मग्निं तथा शीतं वर्षं च पवनेरितम् |
३७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
वय़मत्राग्निना युक्ता गमिष्यामः परां गतिम् ||
२३ ख
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
वय़मपि निगृह्णीमो द्विधा कृत्वा वरूथिनीम् ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२२
शार्ङ्गका ऊचुः
वय़मप्यग्निमाविश्य लोकान्प्राप्स्यामहे शुभान् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
वय़मप्यत्र जानीमो नात्र दोषोऽस्ति कश्चन ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
वय़मप्यत्र युध्येम तथा चेमे नरर्षभाः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
वय़मप्यनुय़ास्यामो यत्र यूय़ं गमिष्यथ ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
८८
अष्टक उवाच
वय़मप्यनुय़ास्यामो यदा कालो भविष्यति ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
वय़मप्युपय़ास्यामो न त्विदानीं कथञ्चन |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
वय़माश्रित्य गोविन्दं यतामः कार्यसिद्धय़े ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
वय़माश्रय़णीय़ाः स्म नाश्रितारः परस्य च |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
वय़मासादने तस्य दर्पमद्य निहन्म हि ||
११ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
वय़मास्म यथा सम्यग्भवतो विदितं तथा ||
२१ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
वय़मेकस्य शृणुमो महावुद्धिमतो रणे |
८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
वय़मेतत्प्रपश्यामो नृपते दिव्यचक्षुषा ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
वय़मेतदमृष्यन्तः सर्व एव पुरोत्तमात् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
वय़मेनं हनिष्यामो निकृष्याय़ोधनाद्वहिः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
वय़मेव तदाद्राक्ष्म पञ्च मानुषय़ोनय़ः |
४२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
वय़मेव त्रय़ः शिष्टास्तस्मिन्महति वैशसे ||
६३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
वय़मेव त्रय़ो राजन्गच्छन्तं परमां गतिम् |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
वय़मेव हृषीकेशं निगृह्णीम वलादिव |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
वय़मेवात्र कालज्ञा न कालः परिहास्यते ||
८८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
वय़मेवात्र गर्ह्या हि ये वय़ं मन्दचेतसः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
वय़मेवास्य लोकस्य विनाशे कारणं स्मृताः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१२७
सोमक उवाच
वय़श्च समतीतं मे सभार्यस्य द्विजोत्तम |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
वय़सा च प्रकृष्टेन वाग्व्याय़ामेन चैव हि ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
वय़सा शास्त्रतो धैर्यात्कुलेनाभिजनेन च |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
वय़स्यत्वात्तु ते व्रह्मन्नपराधमिमं क्षमे |
४० क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
वय़स्यनुचरेदेवमेष शास्त्रकृतो विधिः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३
युधिष्ठिर उवाच
वय़स्या ज्ञातय़श्चैव भ्रातरश्च पितामह ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
वय़स्या भ्रातरश्चैव किमन्यद्भागधेय़तः ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
वय़स्याः शल्यपुत्रस्य सुवर्णविकृतध्वजाः ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
वय़स्याभ्यागताश्चान्ये दासीदासं च सङ्गतम् |
७६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ांसि पशवश्चैव भूतानि च महीपते |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
वय़ांस्यसृक्पान्यथ रक्षसां गणाः; पिशाचसङ्घाश्च सुदारुणा रणे ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
शुक्र उवाच
वय़ो दास्यति ते पुत्रो यः स राजा भविष्यति |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
वय़ोतीतो जरामृत्यू जित्वा व्रह्म सनातनम् |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ोदर्पादमर्षाच्च न ते श्रेय़ो ग्रहीष्यति ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
वय़ोरूपविलासिन्यो लभते नात्र संशय़ः ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
वय़ोवृद्धावपि तु तौ क्षत्रधर्मपराय़णौ |
९ क