आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५५
गौतम उवाच
अनुज्ञां गृह्य मत्तस्त्वं गृहान्गच्छस्व मा चिरम् ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
अनुज्ञां तु महाराज भवान्मे दातुमर्हति ||
३५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
अनुज्ञां प्राप्य देवेशाज्जगाम स महातपाः |
१५६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
८
व्यास उवाच
अनुज्ञां लभतां राजा मा वृथेह मरिष्यति ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
अनुज्ञातं तु पार्थेन मय़ा कार्यं न संशय़ः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
अनुज्ञातं तु मां राज्ञा विजने कश्चिदव्रवीत् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
अनुज्ञातं महावीर्यं रमेणास्त्रेषु दुर्जय़म् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातः कचो गन्तुमिय़ेष त्रिदशालय़म् ||
५८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातः पाण्डवेन प्रय़यौ सञ्जय़स्तदा |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
अनुज्ञातः स कृष्णेन नमस्कृत्य जनार्दनम् |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातः स गच्छेति भ्रात्रा ज्येष्ठेन भारत |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
भीष्म उवाच
अनुज्ञातः स तेनाथ निषसाद सहानुगः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
अनुज्ञातः सञ्जय़ स्वस्ति गच्छ; न नोऽकार्षीरप्रिय़ं जातु किञ्चित् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
अनुज्ञातः स्वस्ति गच्छ मैवं भूय़ः समाचरेः |
३४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातः स्वय़ं तेन व्यासेनापि महर्षिणा |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
अनुज्ञातश्च गुरुणा चचारानुत्तमं तपः ||
३४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
अनुज्ञातश्च तेनाथ प्रविवेश स्वमाश्रमम् ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
अनुज्ञातश्च राज्ञा स प्रावेशय़त तं जनम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
अनुज्ञातश्च रामेण मत्समोऽसीति भारत ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१११
नारद उवाच
अनुज्ञातश्च शाण्डिल्या यथागतमुपागमत् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
अनुज्ञातस्ततो राज्ञा परिष्वक्तश्च फल्गुनः |
४६ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातस्तु कृष्णेन पाण्डवो भ्रातृभिः सह |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२२८
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातस्तु गान्धारिः कर्णेन सहितस्तदा |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
४४
शकुनिरु उवाच
अनुज्ञातस्तु ते पित्रा विजेष्ये तं न संशय़ः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२२
भीष्म उवाच
अनुज्ञातस्तु भवता किञ्चिद्व्रूय़ामहं विभो ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३७
लोमश उवाच
अनुज्ञातस्तु रैभ्येण तय़ा नार्या सहाचरत् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
अनुज्ञातस्तेन वैवस्वतेन; प्रत्यागमं भगवत्पादमूलम् ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
अनुज्ञातस्त्वहं तेन तत्रैव समुपाविशम् |
५३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
अनुज्ञातस्त्वहं तेन न्यस्तवर्मा निराय़ुधः |
३९ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातस्त्वय़ा कृष्ण प्राप्नुय़ां क्रतुमुत्तमम् ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातस्त्वय़ा चाहं द्वारकां गन्तुमुत्सहे |
५२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातस्त्वय़ा पुत्र भुञ्जीय़ामिति कामय़े ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
कर्ण उवाच
अनुज्ञातस्त्वय़ा वीर युध्येय़मिति मे मतिः ||
२७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
अनुज्ञातस्त्वय़ा वीर संश्रय़ेय़ं वनान्यहम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
अनुज्ञातस्त्वय़ा व्रूय़ां वचनं त्वत्पुरो हितम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
अनुज्ञातस्तय़ा चापि स्वगृहं पुनराव्रजत् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
अनुज्ञाता च तेनैव तवैव गृहमागता ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
भीष्म उवाच
अनुज्ञाता च मुनिना सा स्त्री तेन महात्मना |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञाता च राज्ञा सा तत्रैवान्तरधीय़त ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
अनुज्ञाता तु भीष्मेण शाल्वं सौभपतिं ततः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञाता त्वय़ा देवमाह्वय़ेय़महं नृप |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
अनुज्ञाता यय़ौ सा तु कन्या शाल्वपतेः पुरम् |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातांस्तान्विदित्वा धृतराष्ट्रेण धीमता |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
६६
जनमेजय़ उवाच
अनुज्ञातांस्तान्विदित्वा सरत्नधनसञ्चय़ान् |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
६५
धृतराष्ट्र उवाच
अनुज्ञाताः सहधनाः स्वराज्यमनुशासत ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
अनुज्ञातास्ततः सर्वे सुहृदो धर्मसूनुना |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२३५
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातास्तु गन्धर्वाः पाण्डुपुत्रेण धीमता |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातास्तु गन्धर्वाश्चित्रसेनेन भारत |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८८
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातास्तु ते सर्वे कृष्णेनामिततेजसा |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
अनुज्ञातास्त्वय़ा राजन्गमिष्यामो विकल्मषाः ||
४४ ख