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शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
उभावपि परिश्रान्तौ युध्यमानावरिन्दमौ ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
उभावपि भवन्तौ मे महत्कर्म करिष्यतः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय २०१
नारद उवाच
उभावप्यमरौ स्यावः प्रसन्नो यदि नौ प्रभुः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
उभावानृतिकावेतौ न मृषा कर्तुमर्हसि ||
७२ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
उभावुभय़तस्तीक्ष्णैः शरवर्षैरवर्षताम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
उभावुभय़तस्तीक्ष्णैर्विशिखैरभ्यवर्षताम् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
शल्य उवाच
उभावेकरथेनाहं हन्यां माधवपाण्डवौ ||
७४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६८
भीष्म उवाच
उभावेतावतिरथौ मतौ मम परन्तप ||
२५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
उभावेतौ क्षरावुक्तावुभावेतौ च नक्षरौ |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३
सात्यकिरु उवाच
उभावेतौ दृढौ पक्षौ दृश्येते पुरुषान्प्रति ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १२४
इन्द्र उवाच
उभावेतौ न सोमार्हौ नासत्याविति मे मतिः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
उभावेतौ नित्यमभिप्रपन्नौ; सम्प्रापतुर्महतीं श्रीप्रतिष्ठाम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५३
भीष्म उवाच
उभावेतौ समफलौ समदोषौ च भारत |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
उभे एते समे स्यातामार्जवं वा विशिष्यते ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
उभे एते समे स्यातामार्जवं वा विशिष्यते ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
उभे चित्रे वनराजिप्रकाशे; तथैवोभे नागरथाश्वपूर्णे ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
उभे चैते परित्याज्ये तेजश्चैव तपस्तथा ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
उभे चैते मते ज्ञाने नृपते शिष्टसंमते |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
उभे चैते मते तत्त्वे मम तात युधिष्ठिर ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २४
नारद उवाच
उभे चैवाय़ने द्वन्द्वं तय़ोर्मध्ये हुताशनः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
उभे तु यस्य सुकृते भवेतां; किं स्वित्तय़ोस्तत्र जय़ोत्तरं स्यात् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
उभे दृष्ट्वा दुःखसुखे राज्यं प्राप्य यदृच्छय़ा |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
उभे द्विरात्रं सन्ध्ये वै नाभ्यगात्स ममालय़म् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
उभे पूर्वापरे सन्ध्ये नित्यं पश्यामि भारत |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
उभे प्रज्ञे वेदितव्ये ऋज्वी वक्रा च भारत |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
उभे मूत्रपुरीषे तु दिवा कुर्यादुदङ्मुखः |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
उभे मूत्रपुरीषे तु नाप्सु कुर्यात्कदाचन ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २१
व्राह्मण उवाच
उभे वाङ्मनसी गत्वा भूतात्मानमपृच्छताम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
उभे वालः कर्मणी न प्रजान; न्स जाय़ते म्रिय़ते चापि देही ||
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २४
नारद उवाच
उभे शुभाशुभे द्वन्द्वं तय़ोर्मध्ये हुताशनः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
उभे सत्यानृते त्यक्त्वा एवं भवति निर्गुणः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
उभे सत्यानृते त्यक्त्वा येन त्यजसि तं त्यज ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
उभे सत्यानृते त्यक्त्वा येन त्यजसि तं त्यज ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६८
भीष्म उवाच
उभे सत्यानृते त्यक्त्वा शोकानन्दौ प्रिय़ाप्रिय़े |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
उभे सत्यानृते त्यक्त्वा शोकानन्दौ भय़ाभय़े |
४३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २४
नारद उवाच
उभे सत्यानृते द्वन्द्वं तय़ोर्मध्ये हुताशनः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
उभे सत्यानृते वुद्ध्या वुद्धिं परमनिश्चय़ात् ||
४१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४७
व्रह्मो उवाच
उभे सत्यानृते हित्वा मुच्यते नात्र संशय़ः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
उभे सत्ये क्षत्रिय़ाद्यप्रवृत्ते; मोहो मृत्युः संमतो यः कवीनाम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
उभे सन्ध्ये जपन्किञ्चित्सद्यो मुच्येत किल्विषात् |
२०० क
भीष्म पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
उभे सन्ध्ये दिशः खं च निय़मं च जनार्दनः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
उभे सन्ध्ये प्रकाशेते दिशां दाहसमन्विते |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
उभे सह विवर्धेते उभे सह विनश्यतः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
उभे सेने तदा राजन्युद्धाय़ मुदिते भृशम् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
उभे सेने तुल्यमिवोपय़ाते; उभे व्यूहे हृष्टरूपे नरेन्द्र |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
उभे सेने महाराज युद्धाय़ैव समीय़तुः ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
उभे सेने महासत्त्वे प्रहृष्टनरकुञ्जरे |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
उभे सेने वृहती भीमरूपे; तथैवोभे भारत दुर्विषह्ये |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
उभौ कृतास्त्रौ वलिनौ रथचर्याविशारदौ |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
उभौ क्रोधविषं दीप्तं वमन्तावुरगाविव ||
२८ ख