chevron_left  सगणस्तत्कृतेarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय २१५
वैशम्पाय़न उवाच
सगणस्तत्कृते दावं परिरक्षति वज्रभृत् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १३१
वैशम्पाय़न उवाच
सगणाः सानुय़ात्राश्च विहरध्वं यथामराः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १३१
वैशम्पाय़न उवाच
सगणास्तात वत्स्यामो धृतराष्ट्रस्य शासनात् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
सगणो गणकारश्च भूतभावनसारथिः |
९२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
माण्डव्य उवाच
सगणो दैवतश्रेष्ठस्तत्रैवान्तरधीय़त ||
३७ ग
आदि पर्व
अध्याय ५४
सूत उवाच
सगणोऽव्युद्ययौ तूर्णं प्रीत्या भरतसत्तमः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
सगदाद्भीमसेनाच्च पार्थाच्चैव सगाण्डिवात् |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
सगदाद्वा धनपतेः सवज्राद्वापि वासवात् ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
सगदानुद्यतान्वाहून्सखड्गांश्च विशां पते |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
सगदो भारतो भाति प्रतपन्भास्करो यथा ||
३८ ग
वन पर्व
अध्याय २३८
वैशम्पाय़न उवाच
सगद्गदमिदं वाक्यं भ्रातरं ज्येष्ठमात्मनः ||
२७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
सगरं च महात्मानं मृतं शुश्रुम सृञ्जय़ |
१२२ क
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
सगरं चाभ्ययाचन्त सर्वे प्राञ्जलय़ः स्थिताः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
सगरस्य प्रदेशेषु मणिहेमचितेषु च |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
सगरस्यात्मजान्क्रुद्धस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
२५ ग
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
सगरान्तिकमागच्छत्तच्च तस्मै न्यवेदय़त् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
सगुडाय़ोमुखप्रासान्सर्ष्टितोमरपट्टिशान् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
सगुणं निर्गुणं चैव यथाशास्त्रनिदर्शनम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
वसिष्ठ उवाच
सगुणस्तेजसो नित्यं तमस्याकाशमेव च ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
सगुणो निर्गुणो विश्वो ज्ञानदृश्यो ह्यसौ स्मृतः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
सगुरुगुरुसुताः सभीष्मकाः; किमु न जितः स तदा त्वय़ार्जुनः ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
सगोत्रमाविशन्त्यास्ते तृतीय़ो गोत्रसङ्करः ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
सगोत्रां वासगोत्रां वा न वेद त्वां न वेत्थ माम् |
६१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
द्रोण उवाच
सग्राहनक्रमकरं गङ्गावेगमिवोष्णगे ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
सघण्टां प्राहिणोद्घोरां क्रुद्धो गाण्डीवधन्वने ||
६४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
सघण्टाफलकाः सर्वे वासीवृक्षादनान्विताः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
सघण्टाश्चन्दनादिग्धाः स्वर्णवज्रविभूषिताः |
६ क
वन पर्व
अध्याय ७३
केशिन्यु उवाच
सङ्कटेऽप्यस्य सुमहद्विवरं जाय़तेऽधिकम् ||
९ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
सङ्कम्पय़न्गां चरणैर्महात्मा; वेगेन कृष्णः प्रससार भीष्मम् |
८७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
सङ्करं कांस्यभाण्डैश्च वलिं चापि कुपात्रकैः ||
११३ ख
वन पर्व
अध्याय १७७
युधिष्ठिर उवाच
सङ्करस्तत्र नागेन्द्र वलवान्प्रसमीक्षितः ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १७७
युधिष्ठिर उवाच
सङ्करात्सर्ववर्णानां दुष्परीक्ष्येति मे मतिः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
सङ्कराश्चाप्यवर्तन्त न च शौचमवर्तत ||
६४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
सङ्करो न भवेदत्र यथा वै तद्विधीय़ताम् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
सङ्करो नरकाय़ैव कुलघ्नानां कुलस्य च |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
सङ्करो नरकाय़ैव सा काष्ठा पापकर्मणाम् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
सङ्कर्षणं महावीर्यं त्वां च भीमापराजितम् |
२० क
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
सङ्कर्षणद्वितीय़ेन ज्ञातिकार्यं मय़ा कृतम् |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
सङ्कर्षणस्य भद्रं ते यत्तदैनमुपावसम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
सङ्कर्षणाच्च प्रद्युम्नो मनोभूतः स उच्यते |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्कर्षणानुजः श्रीमान्महावुद्धिर्जनार्दनः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १७७
धृष्टद्युम्न उवाच
सङ्कर्षणो वासुदेवो रौक्मिणेय़श्च वीर्यवान् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
सङ्कल्पजो मित्रवर्गो ज्ञातय़ः कारणात्मकाः |
३६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २७
व्राह्मण उवाच
सङ्कल्पदंशमशकं शोकहर्षहिमातपम् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
सङ्कल्पनिय़मोपेतः फलाहारो जितेन्द्रिय़ः |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय ४०
अर्जुन उवाच
सङ्कल्पपक्षविक्षेपं वाहुप्राकारतोरणम् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
सङ्कल्पमकरोन्मोघं गाण्डीवेन धनञ्जय़ः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
सङ्कल्पमकरोन्मोघं गाण्डीवेन धनञ्जय़ः ||
३ ख