आदि पर्व
अध्याय
८३
इन्द्र उवाच
सतां सकाशे पतितासि राजं; श्च्युतः प्रतिष्ठां यत्र लव्धासि भूय़ः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
सतां सकृत्सङ्गतमीप्सितं परं; ततः परं मित्रमिति प्रचक्षते |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
सतां सङ्ग्रहणं शौर्यं दाक्ष्यं सत्यं प्रजाहितम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
सतां सदा शाश्वती धर्मवृत्तिः; सन्तो न सीदन्ति न च व्यथन्ति |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
सतां सद्भिर्नाफलः सङ्गमोऽस्ति; सद्भ्यो भय़ं नानुवर्तन्ति सन्तः ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
निषादा ऊचुः
सतां सप्तपदं मित्रं प्रसादं नः कुरु प्रभो ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
सतां सप्तपदं मित्रमाहुः सन्तः कुलोचिताः |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
सतां समागमः सद्भिर्नाफलः पार्थ विद्यते |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
सतां साप्तपदं सख्यं सवासो मेऽसि पण्डितः |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
सतामपि कुले जाताः कर्मणा वत दुर्गतिम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
सतामर्थे सम्यगुत्पादितो यः; स वै कॢप्तः सम्यगिष्टः प्रजाभ्यः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन ||
५२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
सती पुरा हृता काचिदारट्टा किल दस्युभिः |
५८ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
सतृणं ग्रसते पांसुं पश्य कालस्य पर्ययम् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
सतोमरपताकैश्च वारणाः परवारणैः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
सतोमरमहामात्रैर्निपतद्भिर्गतासुभिः |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
सतोमरावस्य भुजौ छिन्नौ भीमेन गर्जतः |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८०
पराशर उवाच
सतोय़ेऽन्यत्तु यत्तोय़ं तस्मिन्नेव प्रसिच्यते |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कर्ता कुरुवृद्धानां पितृभक्तो दृढव्रतः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नाराय़णो नरः ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कारेण नरव्याघ्रं सहदेवं युधां पतिम् ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
सत्कारैरुत्तमैर्मित्रं पूजय़ेत विचक्षणः ||
२१ ग
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कारय़न्तु तान्वीरान्कुन्तिराजसुतां च ताम् ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
सत्कुर्वन्ति महाभागा गुरून्सुविगुणानपि ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
सत्कृतं युक्तमनसं हितैषिणमतन्द्रितम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कृतं विविधैर्यानैर्वस्त्रैरुच्चावचैस्तथा |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कृतं शय़नं दिव्यमभ्यगच्छन्महाद्युतिः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
सत्कृतं स्वजनेनेह परोऽपि वहु मन्यते |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
सत्कृतः कृतकार्यश्च भवान्यास्यत्यविघ्नतः ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कृतः शिशुपालेन यय़ौ सवलवाहनः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
सत्कृतः संविभक्तो वा न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४०
भीष्म उवाच
सत्कृतश्च महेन्द्रेण प्रत्यासन्नगतोऽभवत् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
सत्कृतश्चान्नपानाभ्यामाच्छन्नो लव्धसत्क्रिय़ः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कृतस्त्वत्कृते पार्थः सर्वैरस्माभिरच्युत |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कृतस्य हि ते शोको विपरीते कथं भवेत् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
सत्कृतस्यार्थमानाभ्यां स्यात्तु पूर्वापकारिणः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
सत्कृता चैकपत्नी च जात्या योनिरिहेष्यते |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
सत्कृताश्च कृतार्थाश्च मित्राणां न भवन्ति ये |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
सत्कृताश्च निवर्तन्ते तदतीव प्रवर्धते |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
सत्कृताश्च प्रय़त्नेन आचार्यर्त्विक्पुरोहिताः |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कृताश्च यथोद्दिष्टाञ्जग्मुरावसथान्नृपाः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
सत्कृतासत्कृता वापि पतिं दृष्ट्वा तथागतम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
७२
वृहदश्व उवाच
सत्कृतासत्कृता वापि पतिं दृष्ट्वा तथागतम् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
१३४
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कृतास्ते तु पौरैश्च पौरान्सत्कृत्य चानघाः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कृतास्ते महाभागा युधिष्ठिरमथाव्रुवन् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कृतो धृतराष्ट्रेण भीष्मेण विदुरेण च ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
सत्कृतोऽसक्तृतो वापि योऽन्यां कृपणचक्षुषा |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कृतोऽसत्कृतो वापि न क्रुध्येत जनार्दनः |
८ क