chevron_left  अनुशिष्टोऽस्मिarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय १०६
सुपर्ण उवाच
अनुशिष्टोऽस्मि देवेन गालवाज्ञातय़ोनिना |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
अनुशिष्ट्वानुगत्वा च कृत्वा चैनान्प्रदक्षिणम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
अनुशिष्यात्प्रजा राजा धर्मार्थी तद्धिते रतः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
अनुषक्तं यदा देहे किं स्वस्थ इव तिष्ठसि ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
अनुषक्ता द्वय़ेनैते भावाः स्थावरजङ्गमाः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
कपिल उवाच
अनुष्ठिताश्चान्तवन्त इति त्वमनुपश्यसि ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
अनुष्ठिते यथाशास्त्रं नय़ेतां परमां गतिम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ११५
वैशम्पाय़न उवाच
अनुसंवत्सरं जाता अपि ते कुरुसत्तमाः ||
२१ ग
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
अनुसंसाध्य कौन्तेय़ानाशीर्भिरभिनन्द्य च |
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
अनुसस्रुर्यथोद्देशं पश्यन्तो विविधान्नगान् ||
२९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
अनुसारभय़ाद्भीताः प्राङ्मुखाः प्राद्रवन्पुनः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १०१
वैशम्पाय़न उवाच
अनुसार्यमाणा वहुभी रक्षिभिर्भरतर्षभ ||
४ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
अनुसृत्य च मां युद्धे परुषाण्युक्तवान्वहु |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
अनुसृत्य तु यत्नात्स तय़ा वै व्रह्महत्यया |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
अनुसृत्य तु ये धर्मं कवय़ः समुपस्थिताः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
अनुसृत्य तु शास्त्राणि कवय़ः समवस्थिताः |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अनुसृत्य हनिष्यन्ति श्रेय़ो नः समरे स्थितम् ||
५८ ख
सभा पर्व
अध्याय ५४
युधिष्ठिर उवाच
अनुसेवां चरन्तीमाः कुशला नृत्यसामसु |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २४३
वैशम्पाय़न उवाच
अनुस्मरंश्च सङ्क्लेशान्न शान्तिमुपय़ाति सः ||
२० ग
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
अनुस्मरंस्तस्य कर्माणि विष्णो; र्गावल्गणे नाधिगच्छामि शान्तिम् ||
२९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
अनुस्मरन्तो जननीं ततस्ते कुरुनन्दनाः |
५ क
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
अनुस्मरन्पितृवधं ततो विष्णुमुपाद्रवत् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
अनुस्मरन्वपुस्तस्य श्रिय़ं चाप्रतिमां भुवि |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
अनुह्रादस्तु तेजस्वी योऽभूत्ख्यातो जघन्यजः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
अनुह्रादस्तृतीय़ोऽभूत्तस्माच्च शिविवाष्कलौ ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
अनुय़ातश्च पितरमधिको वा पराक्रमे |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
अनुय़ात्रं यथा सज्जं सर्वं भवति सर्वतः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६९
भीष्म उवाच
अनुय़ात्रिकमर्थस्य मात्रालाभेष्वनादृतः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
दुर्योधन उवाच
अनुय़ास्याम कर्ण त्वां वय़ं सर्वे च पार्थिवाः ||
६० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
अनुय़ास्यामहे त्वाजौ सौरभेय़ा इवर्षभम् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
अनुय़ास्यामि वीभत्सुं करिष्ये वचनं तव ||
४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
अनुय़ास्याव सहितौ धन्विनौ परतापिनौ |
१२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
अनुय़ास्यावहे त्वां तु प्रभाते सहितावुभौ |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
अनुय़ाय़ तु कौन्तेय़ः पुत्राणां ते महद्वलम् |
१०२ क
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
अनुय़ाय़ महावाहुः फल्गुनो वाक्यमव्रवीत् ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
अनुय़ुक्तः स मेधावी लोकधर्मविधानवित् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
अनुय़ुञ्जीत कृत्यानि सर्वाण्येव महीपतिः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
अनुय़ोक्ता च यो विप्रो अनुय़ुक्तश्च भारत |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
अनूनमासीदसुरस्य कामै; र्वैरोचनेः श्रीरपि चाक्षय़ासीत् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
अनूना चानवद्या च प्रिय़मुख्या गुणावरा |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
अनूपगाः किराताश्च ग्रीवाय़ां भरतर्षभ ||
४६ ख
सभा पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
अनूपराजो दुर्धर्षः क्षेमजिच्च सुदक्षिणः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
अनूपां सुभगां भासीमिति प्रावा व्यजाय़त ||
४४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
अनूपाधिपतिः शूरो भीमस्य दय़ितः सखा |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
अनूपाधिपतिश्चैव नीलः स्ववलमास्थितः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भरद्वाज उवाच
अनूष्मणामचेष्टानां घनानां चैव तत्त्वतः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
अनृग्यजुरसामा तु प्राजापत्य उपद्रवः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
अनृजुस्त्वनुरक्तोऽपि सम्पन्नश्चेतरैर्गुणैः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
व्रह्मदत्त उवाच
अनृणस्तेन भवति वस पूजनि मा गमः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
अनृतं किञ्चिदुक्तं ते न कामान्नार्थकारणात् ||
७४ ख