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अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
अनृतं च न भाषेत मातापित्रोः कृतेऽपि वा ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
अनृतं च भवेत्सत्यं सत्यं चैवानृतं भवेत् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
अनृतं च समुत्कर्षे राजगामि च पैशुनम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
सनत्सुजात उवाच
अनृतं चाभ्यसूय़ा च कामार्थौ च तथा स्पृहा ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
अनृतं जीवितस्यार्थे वदन्न स्पृश्यतेऽनृतैः ||
९९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
अनृतं ज्ञाज्ञता सत्यं श्रद्धाश्रद्धे तथैव च |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अनृतं तत्करिष्यन्ति मामका निशिताः शराः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८३
भृगुरु उवाच
अनृतं तमसो रूपं तमसा नीय़ते ह्यधः |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
अनृतं तु भवेद्वाच्यं न च हिंस्यात्कथञ्चन ||
२० ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अनृतं न स्मराम्यस्य स्वैरेष्वपि महात्मनः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय २०६
अर्जुन उवाच
अनृतं नोक्तपूर्वं च मय़ा किञ्चन कर्हिचित् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १९४
मधुकैटभावू ऊचतुः
अनृतं नोक्तपूर्वं नौ स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२०
नारद उवाच
अनृतं नोक्तपूर्वं मे तेन सत्येन खं व्रज ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
उत्तङ्क उवाच
अनृतं नोक्तपूर्वं मे स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय २०९
व्राह्मण उवाच
अनृतं नोक्तपूर्वं मे हसतापि कदाचन ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
अनृतं नोत्सहे कर्तुं धार्तराष्ट्रस्य धीमतः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
अनृतं नोत्सहे वक्तुं न ह्येतन्मय़ि विद्यते ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
नाभाग उवाच
अनृतं भाषतु सदा सद्भिश्चैव विरुध्यतु |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
गण्डो उवाच
अनृतं भाषतु सदा साधुभिश्च विरुध्यतु |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
अनृतं माव्रवीच्छ्वश्रूः सर्वज्ञा सर्वदर्शिनी |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
अनृतं ये न भाषन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
अनृतं वदसीह त्वमृणं ते धारय़ाम्यहम् ||
८५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३९
युधिष्ठिर उवाच
अनृतं सत्यमित्याहुः सत्यं चापि तथानृतम् |
८ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
विदुर उवाच
अनृतस्य फलं कृत्स्नं सम्प्राप्नोतीति निश्चय़ः ||
५७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
अनृताः स्त्रिय़ इत्येवं वेदेष्वपि हि पठ्यते |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
अनृताः स्त्रिय़ इत्येवं सूत्रकारो व्यवस्यति |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १८८
कुन्त्यु उवाच
अनृतान्मे भय़ं तीव्रं मुच्येय़मनृतात्कथम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १८८
व्यास उवाच
अनृतान्मोक्ष्यसे भद्रे धर्मश्चैष सनातनः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
अनृते चेत्प्रसङ्गस्ते श्रद्दधासि न चेत्स्वय़म् |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
विदुर उवाच
अनृते या फलावाप्तिस्तस्याः सोऽर्धं समश्नुते ||
५६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
अनृतेनाभिभूतोऽभूच्छक्रः परमदुर्मनाः |
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
अनृतेनोपचर्ता च प्रतिरोद्धा गुरोस्तथा ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
अनृतेनोपचर्ता च प्रतिरोद्धा गुरोस्तथा |
२० क
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
अनृतेनोपचीर्णो हि हिंस्यादेनमसंशय़म् ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
अनृतोक्तं प्रजा हन्यात्ततः पापमवाप्नुय़ात् |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
यय़ातिरु उवाच
अनृतौ जटी व्रतिन्यां वै भार्याय़ां सम्प्रजाय़तु |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
जमदग्निरु उवाच
अनृतौ मैथुनं यातु विसस्तैन्यं करोति यः ||
६३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
अनृत्विगनुपाध्याय़ः स चेदग्रासनं व्रजेत् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७८
राजो उवाच
अनृत्विजं हुतं नास्ति मामकान्तरमाविशः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
अनृशंसं शुचिं दान्तं सर्वभूतहिते रतम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९७
भीष्म उवाच
अनृशंसः शुचिर्दान्तः सत्यवागार्जवे स्थितः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७१
भीष्म उवाच
अनृशंसश्चरेदर्थं चरेत्काममनुद्धतः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
अनृशंसाः शीलवृत्तोपपन्ना; स्तेषां सर्वेषां कुशलं तात पृच्छेः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २३१
वैशम्पाय़न उवाच
अनृशंसास्तु कौन्तेय़ास्तस्याध्यक्षान्व्रवीमि वः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५२
धृतराष्ट्र उवाच
अनृशंसो वदान्यश्च ह्रीमान्सत्यपराक्रमः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२१
यय़ातिरु उवाच
अनेकक्रतुदानौघैरर्जितं मे महत्फलम् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२१
पितामह उवाच
अनेकक्रतुदानौघैर्यत्त्वय़ोपार्जितं फलम् ||
१३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २४
गान्धार्यु उवाच
अनेकक्रतुय़ज्वानं निहतं नाद्य पश्यसि ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
अनेकगुणपर्यन्तं विमानवरमास्थितः |
९५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३८
श्रीभगवानु उवाच
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः |
१६ क