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आदि पर्व
अध्याय ९९
वैशम्पाय़न उवाच
तमपास्य शुभं गन्धमिमं प्रादात्स मे मुनिः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
तमपि प्रहसन्द्रोणः शरैर्निन्ये यमक्षय़म् |
३९ क
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
तमपि सरथवाजिसारथिं; शिनिवृषभो विविधैः शरैस्त्वरन् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १०१
वैशम्पाय़न उवाच
तमपृच्छंस्ततो राजंस्तथावृत्तं तपोधनम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय १२८
लोमश उवाच
तमपृच्छत्किमर्थं त्वं नरके पच्यसे द्विज ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
तमपृच्छत्ततो रक्षः पावकं ज्वलितं तदा ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
तमपृच्छत्ततो राजा कुशिकः प्रणतस्तदा |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
तमपृच्छत्तदाभ्येत्य पितुस्तच्छोककारणम् ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
तमपृच्छन्महाकाय़ं प्रह्रादः को भवानिति |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
तमप्यतिवलं जातं वागभ्यवददच्युतम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
तमप्यथ महात्मानं सर्वे तु पुरुषर्षभाः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३००
याज्ञवल्क्य उवाच
तमप्यनुपमात्मानं विश्वं शम्भुः प्रजापतिः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८४
धृतराष्ट्र उवाच
तमप्यस्मै प्रदास्यामि तमप्यर्हति केशवः ||
११ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
तमप्याक्रम्य पादेन कण्ठे चोरसि चौजसा |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
भीष्म उवाच
तमप्याजौ विनिर्जित्य प्रतिजग्मुर्यथागतम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
कर्ण उवाच
तमप्याशु पराजित्य ततो हन्तास्मि पाण्डवम् ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
तमप्रतिमकर्माणं रूपेणासदृशं भुवि |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
तमप्रतिमसत्त्वौजोवलवीर्यपराक्रमम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
तमप्रतिवलं दृष्ट्वा विषण्णवदनास्तु ताः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३००
याज्ञवल्क्य उवाच
तमप्रतिवलं भीममाकाशं ग्रसतेऽऽत्मना |
११ क
मौसल पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
तमप्रतीतमनसं निःश्वसन्तं पुनः पुनः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३००
याज्ञवल्क्य उवाच
तमप्रमेय़ोऽतिवलं ज्वलमानं विभावसुम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
तमप्सरोगणाकीर्णं गीतस्वननिनादितम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४९
भीष्म उवाच
तमभिक्रम्य नागेन्द्रो मतिमान्स नरेश्वर |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४३
अतिथिरु उवाच
तमभिक्रम्य विधिना प्रष्टुमर्हसि काङ्क्षितम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय ९६
लोमश उवाच
तमभिक्रम्य सर्वेऽद्य वय़ं याचामहे वसु ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
तमभिक्रुद्धमाय़ान्तं तव पुत्रमरिन्दमः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
तमभिद्रुतमालोक्य द्रोणेनामित्रघातिना |
४४ क
विराट पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
तमभिद्रुत्य कौन्तेय़ः क्रोधसंरक्तलोचनः |
२० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
तमभिद्रुत्य जग्राह क्षितौ चैनमपातय़त् |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
तमभिद्रुत्य राधेय़ः प्रहसन्वै पुनः पुनः |
९१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
तमभिद्रुत्य राधेय़ः स्कन्धं संस्पृश्य पाणिना |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४२
सञ्जय़ उवाच
तमभिद्रुत्य राधेय़ो मुहूर्ताद्भरतर्षभ |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ३६
सूत उवाच
तमभिद्रुत्य वेगेन स राजा संशितव्रतम् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
तमभिद्रुत्य शैनेय़ो मुहूर्तमिव भारत |
२६ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
तमभिद्रुत्य सङ्क्रुद्धो वेगेन महता वली |
९३ क
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
तमभिप्रेक्ष्य धर्मात्मा सम्प्राप्तं धर्मचारिणम् |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
तमभ्यगच्छद्द्रोणश्च कृपो भीष्मोऽथ वाह्लिकः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
तमभ्यगच्छद्वेगेन क्षोभय़िष्यन्महावलः |
४३ क
वन पर्व
अध्याय ५०
वृहदश्व उवाच
तमभ्यगच्छद्व्रह्मर्षिर्दमनो नाम भारत ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
तमभ्यगाद्वृहत्क्षत्रः केकय़ानां महारथः |
७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
तमभ्यधावत्कौन्तेय़ः प्रगृह्य सशरं धनुः |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
तमभ्यधावत्त्राणार्थं द्रोणपुत्रो महारथः |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
तमभ्यधावत्त्वरितो वृकोदरो; महारुरुं सिंह इवाभिपेतिवान् ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
तमभ्यधावत्सहसा जवेन; भीमः शिखण्डी च शिनेश्च नप्ता ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
तमभ्यधावद्गाङ्गेय़मुद्यतास्त्रो धनञ्जय़ः ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
तमभ्यधावद्विसृजञ्शरान्कृप; स्तथैव भोजस्तव चात्मजः स्वय़म् |
५६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
तमभ्यधावद्वृषसेनमाहवे; स सूतजस्य प्रमुखे स्थितं तदा ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
तमभ्यधावद्वेगेन भीमो वृक्षाय़ुधस्तदा ||
४२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
तमभ्यधावन्क्रोशन्तः क्षत्रिय़ा जय़काङ्क्षिणः |
४२ क