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वन पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
निर्विवादा भविष्यन्ति धार्तराष्ट्रास्तथा वय़म् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
निर्विशङ्कं पुनर्दावं दाहय़ामासतुस्तदा ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
निर्विशेषं महाराज यथा हि विजय़स्तथा ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३६
व्रह्मो उवाच
निर्विशेषत्वमन्धत्वं जघन्यगुणवृत्तिता ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
निर्विशेषमभूद्युद्धं तय़ोः पुरुषसिंहय़ोः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
निर्विशेषमभूद्युद्धं तय़ोः पुरुषसिंहय़ोः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
निर्विशेषमय़ुध्येतां कृतप्रतिकृतैषिणौ ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
निर्विशेषमय़ुध्येतां माय़ाभिरितरेतरम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
निर्विशेषा जनपदा नरावृष्टिभिरर्दिताः |
७१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२१
नारद उवाच
निर्वृतं शान्तमनसं वचोभिस्तर्पय़न्निव ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
निर्वृतिं परमां प्राप्य नाद्य कामान्विचिन्तय़े ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
निर्वृतिं लभसे कस्मादकस्मान्मृत्युनाशितः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
निर्वेदं निर्वृतिं तृप्तिं शान्तिं सत्यं दमं क्षमाम् |
४५ क
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
निर्वेदं परमं गत्वा राजा दुर्योधनस्तदा |
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
निर्वेदं परमं गत्वा विनिन्द्य परवाच्यताम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
निर्वेदं प्रति विन्यस्तं प्रतिवोध युधिष्ठिर ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
निर्वेदमकरोद्धीमान्राजा सन्तापपीडितः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
निर्वेदमहमासाद्य द्रव्यनाशाद्यदृच्छय़ा |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
निर्वेदश्चाविवित्सा च यस्य स्यात्स सुखी नरः ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
निर्वेदस्तु न गन्तव्यो युञ्जानेन कथञ्चन |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
निर्वेदाच्छान्तिमापन्नं शान्तं प्रज्ञानतर्पितम् ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
निर्वेदादात्मसम्वोधः सम्वोधाच्छास्त्रदर्शनम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
निर्वेदाद्देवतानां च प्रसादात्स द्विजोत्तमः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
निर्वेदान्मङ्किना गीतं तन्निवोध युधिष्ठिर ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
निर्वेदो जीविते कृष्ण सर्वतश्चोपजाय़ते ||
५५ ग
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
निर्वेदो जीविते दीर्घे मनुष्यत्वे च भारत ||
९० ख
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
निर्वेदो नात्र गन्तव्यो द्वावेतौ ह्यस्य कर्मणः |
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
निर्वेदय़ित्वा तु परं हत्वा वा कुरुनन्दन |
६१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४४
कर्ण उवाच
निर्वेष्टव्यं मय़ा तत्र प्राणानपरिरक्षता ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
निर्वेष्टुं भर्तृपिण्डं हि कालोऽय़मुपजीविनाम् |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
श्रीभगवानु उवाच
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ||
५५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
निर्वैरता महाराज सत्यमद्रोह एव च ||
९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
निर्वैरा निरहङ्कारा विगतक्रोधमन्यवः ||
१५ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
निर्वैरो गतसन्तापो जले तस्मिन्समाप्लुतः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
निर्व्रणोऽपि च मोक्तव्य एष धर्मः सनातनः ||
१३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
निर्हरेच्च तृणं मासे चैत्रे वह्निभय़ात्पुरः ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
निर्हारी संहतः स्निग्धो रूक्षो विशद एव च |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
निर्हारी संहतः स्निग्धो रूक्षो विशद एव च |
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
निर्हृताः पावका दीप्ताः पाण्डो राजपुरोहितैः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
व्यास उवाच
निर्हृतैश्च यवैर्गोभिर्मासं प्रसृतय़ावकः |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
भीष्म उवाच
निर्होमं निर्वषट्कारं तत्सदः सहसाभवत् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
निर्होमा निर्वषट्कारास्ते भवन्ति नराधमाः ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
धृतराष्ट्र उवाच
निर्ह्रीका मम ते पुत्राः किमकुर्वत सञ्जय़ ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
निर्ह्रीकाः संस्थितिं सर्वे स्थापितां समलूलुपन् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
निरय़ं नैव यातासि यत्र याता द्विजर्षभाः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
निरय़ं प्राप्स्यति महत्कृतघ्नोऽय़मिति प्रभो ||
१७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
निरय़ं याति हिंसात्मा याति स्वर्गमहिंसकः |
५१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
निरय़ं येन गच्छन्ति स्वर्गं चैव हि तच्छृणु ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
निरय़ाच्चापि मानुष्यं कालेनैष्याम्यहं पुनः |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
निलीय़न्ते ध्वजाग्रेषु क्षय़ाय़ पृथिवीक्षिताम् ||
४१ ख