शान्ति पर्व
अध्याय
१२९
भीष्म उवाच
विश्वासाद्विनय़ं कुर्याद्व्यवस्येद्वाप्युपानहौ ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
विश्वासेन तु निक्षिप्तं यो निह्नवति मानवः |
१०४ क
आदि पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वास्य चैनां स प्राय़ादव्रवीच्च पुनः पुनः |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
विश्वास्यः सर्वभूतानामग्र्यो मोक्षविदुच्यते ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
विश्वास्यैवोपसंन्यास्यो वशे कृत्वा रिपुः प्रभो ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
विश्वासय़ित्वा तु परं तत्त्वभूतेन हेतुना |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
विश्वासय़ित्वा द्वेष्टारमवलुम्पेद्यथा वृकः ||
४६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
विश्वासय़ित्वा पूर्वं मां यदिदं दुःखमश्नुथाः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
विश्वासय़ेत्परांश्चैव विश्वसेन्न तु कस्यचित् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
विश्वे चाग्निमुखा देवाः सङ्ख्याताः पूर्वमेव ते |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वे देवाः सपितरो गन्धर्वाप्सरसां गणाः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
विश्वे देवाश्च यत्तस्मिन्विश्वरूपस्ततः स्मृतः ||
८८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
विश्वे देवाश्च यत्तस्मिन्विश्वरूपस्ततः स्मृतः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वेदेवगणान्राजंस्तान्विद्धि भरतर्षभ ||
८८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
विश्वेदेवा नभश्चैव नक्षत्राणि ग्रहास्तथा |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
विश्वेदेवाः शिवाच्चापि विश्वेभ्यश्च तथर्षय़ः |
४८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वेदेवाः समरुतो गन्धर्वाप्सरसश्च ह ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
विश्वेदेवान्मुखेनाथ दिशः श्रोत्रेण चाप्नुय़ात् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
विश्वामित्र उवाच
विश्वेदेवाश्च मे मित्रं मित्रमस्मि गवां तथा |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
विश्वेदेवाश्च ये नित्यं पितृभिः सह गोचराः |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
विश्वेदेवाश्च साध्याश्च पितरश्च मनोजवाः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
विश्वेदेवाश्च साध्याश्च मरुत्वन्तश्च भारत ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वेदेवास्तथा साध्या दीप्यमानाः स्वतेजसा ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
विश्वेदेवास्तथा साध्याः पितरोऽथ मरुद्गणाः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वेदेवास्तथा साध्यास्तत्रासन्परिसंस्थिताः ||
५९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
विश्वेदेवास्तथादित्या वसवोऽथाश्विनावपि ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वेदेवैर्मरुद्भिश्च साध्यैश्च पितृभिः सह ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
विश्वेश्वर महावाहो जय़ लोकार्थतत्पर ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभवाप्ययम् |
१४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
विश्वेश्वरो वासुदेवोऽसि तस्मा; द्योगात्मानं दैवतं त्वामुपैमि ||
४२ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
विश्वेषां देवतानां ते विविशुर्नरसत्तमाः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
विश्वैस्तु देवैः साध्यैश्च व्राह्मणैश्च महर्षिभिः |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
वासुदेव उवाच
विषं ते भीमसेनाय़ दत्तं सर्वे च पाण्डवाः |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
विषं हालाहलं भुङ्क्ते योऽप्रदाय़ सुहृज्जने ||
९० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
विषक्तं त्वय़ि कौन्तेय़ं वासुदेवस्य पश्यतः ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
विषक्तं दृश्य कौन्तेय़ं कृतवर्मरथं प्रति |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
विषक्तं मय़ि दुर्धर्षमश्मकूटमिवाश्मनि ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
विषक्ते त्वय़ि दुर्धर्ष हतः शूरसुतो वलात् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
विषक्तैः स शरैश्चापि तपनीय़परिच्छदैः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
विषण्णं त्रस्तमुद्विग्नं भय़ार्तं व्याधिपीडितम् |
४० क
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
विषण्णः सन्नकण्ठो वै तन्निवोध युधिष्ठिर ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
विषण्णचेताः पप्रच्छ पुनरस्मानरिन्दम ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
विषण्णभूय़िष्ठनरा कृपणा द्रष्टुमावभौ ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
विषण्णभूय़िष्ठरथा धार्तराष्ट्री महाचमूः ||
६६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
विषण्णमनसं ज्येष्ठमिदं भ्रातरमीश्वरम् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
विषण्णमभिसम्प्रेक्ष्य तव राजन्ननीकिनीम् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
विषण्णमभिसम्प्रेक्ष्य पुत्रं ते द्रौणिरव्रवीत् ||
७८ ख
मौसल पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
विषण्णरूपस्तद्राजा सूक्ष्मं चूर्णमकारय़त् ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
विषण्णरूपो वित्रस्तः पुरुषः प्राकृतो यथा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
विषण्णवदनं दृष्ट्वा विप्रो वचनमव्रवीत् ||
९ ख