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आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
अन्तर्गतं तु तद्राज्ञस्तदा व्राह्मणभाषितम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
अन्तर्गतः स भगवान्सर्वसत्त्वशरीरगः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
अन्तर्गतमभिप्राय़ं न नूनं लज्जय़ेच्छसि |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तर्गिरिं च कौन्तेय़स्तथैव च वहिर्गिरिम् |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
अन्तर्जलात्समुत्तस्थौ नागेन्द्र इव निःश्वसन् ||
३५ ग
आदि पर्व
अध्याय २०६
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तर्जले महाराज उलूप्या कामय़ानय़ा ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
अन्तर्जले स सुष्वाप काष्ठभूतो महामुनिः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
अन्तर्जाताः सुक्रय़ज्ञानलव्धाः; प्राणक्रीता निर्जिताश्चौकजाश्च |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
अन्तर्जाताः सुक्रय़ज्ञानलव्धाः; प्राणक्रीता निर्जिताश्चौदकाश्च ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
अन्तर्दधुः प्रभाः सर्वा दीपैस्तैरवभासिताः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तर्दधे ततो भूय़स्तस्य देवस्य माय़या ||
१६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तर्दधे ततो राजन्नेष धर्मः प्रभोर्हरेः ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
अन्तर्दधे स विश्वेशो विवेश च रसां प्रभुः ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
अन्तर्देहेषु चोदानं यं वदन्ति महर्षय़ः ||
३८ ख
विराट पर्व
अध्याय ६४
उत्तर उवाच
अन्तर्धानं गतस्तात देवपुत्रः प्रतापवान् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तर्धानं गताः सर्वे सर्वेषामेव पश्यताम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्तर्धानं यय़ुर्देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः ||
४५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
अन्तर्धानगतिज्ञं च श्रुत्वा तत्त्वेन काश्यपः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
कुशिक उवाच
अन्तर्धानमकस्माच्च पुनरेव च दर्शनम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
अन्तर्धानमवाप्नोति तपसा दग्धकिल्विषः ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय २३४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तर्धानवधं चास्य चक्रे क्रुद्धोऽर्जुनस्तदा |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २६९
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्तर्धानवधं तज्ज्ञश्चकार स विभीषणः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तर्धानेन चास्त्रेण पुनरन्तर्हितोऽभवत् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
अन्तर्धास्यति तत्सत्यमेतद्वः कथितं मय़ा ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
अन्तर्धाय़ तदात्मानं विश्वामित्रोऽपि भारत |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तर्धाय़ विचित्रेषु चचार गिरिसानुषु ||
६२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तर्धीय़त चादित्यः सैन्येन रजसावृतः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
अन्तर्धीय़त चादित्यः सैन्येन रजसावृतः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
अन्तर्नादेन घोरेण वसुधा समकम्पत ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
भीष्म उवाच
अन्तर्भूमिं सम्प्रविश्य जगाम दितिजान्प्रति ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
अन्तर्भूमिगतश्चैव तव पुत्रे निपातिते ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
भीष्म उवाच
अन्तर्भूमिगतश्चैव सततं धर्मवत्सलः |
५६ क
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्तर्भूमिगतस्तत्र वालुकान्तर्हितस्तदा |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
भीष्म उवाच
अन्तर्भूमिगता घोरा निवसन्ति सहस्रशः |
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १७२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तर्भूमिगता ये च प्राणिनो जनमेजय़ |
१० क
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
अन्तर्भूमिगतान्नागाञ्जित्वा तौ च महासुरौ |
८ क
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
अन्तर्भूमिगताश्चान्ये हय़ानां चरणान्यथ |
८ क
वन पर्व
अध्याय १९३
उत्तङ्क उवाच
अन्तर्भूमिगतो राजन्वसत्यमितविक्रमः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
अन्तर्भूमौ तु येऽगृह्णन्दानवा रथवाजिनः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
अन्तर्भूमौ निपतितं पुनरूर्ध्वं प्रतिष्ठते |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
अन्तर्भेदे च सञ्जाते दुःखं संस्मृत्य च प्रभो |
११ क
विराट पर्व
अध्याय १३
द्रौपद्यु उवाच
अन्तर्महीं वा यदि वोर्ध्वमुत्पतेः; समुद्रपारं यदि वा प्रधावसि |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १४६
भीष्म उवाच
अन्तर्मृत्युरशुद्धात्मा पापमेवानुचिन्तय़न् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
अन्तर्वत्नी अहं भ्रात्रा ज्येष्ठेनारम्यतामिति ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तर्वहिश्च यत्किञ्चिन्मनोव्यासङ्गकारकम् |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
अन्तर्वासमुषित्वा च जाय़न्ते स्वासु योनिषु |
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तर्वेदीं प्रविविशुः सत्कारार्थं महर्षय़ः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६०
युधिष्ठिर उवाच
अन्तर्वेद्यां च यद्दत्तं श्रद्धय़ा चानृशंस्यतः |
३ क
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तर्वेद्यां तदा राजन्युधिष्ठिरनिवेशने ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
अन्तर्वेद्यां ददद्वित्तं कामाननुभवन्प्रिय़ान् |
९ क