chevron_left  कुशलाarrow_drop_down
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
कुशला देशभाषासु जल्पन्तोऽन्योन्यमीश्वराः |
९८ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
कुशलाः प्रतिजानन्ति ये तत्त्वविदुषो जनाः ||
३२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
कुशलाकुशलान्येके कृत्वा कर्माणि मानवाः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
कुशलाकुशलो नॄणां व्याख्यातो धर्मसागरः ||
६३ ख
सभा पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
कुशलानामय़ं पृष्ट्वा निषण्णौ रामकेशवौ ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ६५
वृहदश्व उवाच
कुशली ते पिता राज्ञि जनित्री भ्रातरश्च ते |
२८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
कुशली विदुरः पुत्र तपो घोरं समास्थितः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
कुशलेन कृतं कर्म कर्त्रा साधु विनिश्चितम् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
कुशलैरिव विन्यस्तं पटे चित्रमिवाद्भुतम् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
वासुदेव उवाच
कुशलो राजधर्माणां पूर्वेषामपराश्च ये ||
३४ ख
विराट पर्व
अध्याय ३
नकुल उवाच
कुशलोऽस्म्यश्वशिक्षाय़ां तथैवाश्वचिकित्सिते |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
कुशल्यहं कुशलिनं समासाद्य धनञ्जय़म् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
कुशवल्मीकभूय़िष्ठं वभूव च यथा पुरा ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
कुशस्तम्वे जुहोत्यग्निं सुवर्णं तत्र संस्थितम् |
५६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
कुशस्थलं वृकस्थलमासन्दी वारणावतम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
कुशस्थलं वृकस्थलमासन्दी वारणावतम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
कुशस्थलं वृकस्थलमासन्दी वारणावतम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
कुशस्थलीं करिष्यामि निवासं द्वारकां पुरीम् ||
८३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
कुशस्थलीं नय़िष्यामि हत्वा वै दानवोत्तमान् ||
८५ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
कुशस्थलीं पुरीं रम्यां रैवतेनोपशोभिताम् ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय १०९
लोमश उवाच
कुशाकारेव दूर्वेय़ं संस्तीर्णेव च भूरिय़म् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
कुशिकं प्रत्युवाचेदं मुदा परमय़ा युतः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
कुशिकस्तस्य तनय़ः सहस्राक्षसमद्युतिः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
कुशिकस्तु मुनेर्वाक्यं च्यवनस्य महात्मनः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
कुशिकस्यात्मजः श्रीमान्गाधिर्नाम जनेश्वरः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
कुशिको नाम धर्मज्ञस्तस्य पुत्रो महीपतिः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
कुशिको भार्यया सार्धमाजगाम यतो मुनिः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
कुशीलवाः सकितवा ये चान्ये केचिदीदृशाः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
कुशीलवो देवलको नक्षत्रैर्यश्च जीवति ||
१० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
कुशेशय़ं च देवत्वं पूय़ते तस्य किल्विषम् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
कुशेशय़ापीडनिभे दिवाकरे; विलम्वमानेऽस्तमुपेत्य पर्वतम् ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय १८४
वैशम्पाय़न उवाच
कुशैस्तु भूमौ शय़नं चकार; माद्रीसुतः सहदेवस्तरस्वी |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८९
भीष्म उवाच
कुशोच्चय़निषण्णः सन्कुशहस्तः कुशैः शिखी |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
कुसम्वन्धं कुदेशं च दूरतः परिवर्जय़ेत् ||
८९ ख
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
कुसुमानतशाखैश्च ताम्प्रपल्लवकोमलैः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
कुसूलधान्यः प्रथमः कुम्भीधान्यस्त्वनन्तरम् ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय १०
नारद उवाच
कुस्तुम्वुरुः पिशाचश्च गजकर्णो विशालकः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
कुस्त्री खादति मांसानि माघमा सेगवामिव ||
८५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
कूजंश्चपलनेत्रोऽय़ं कौशिको मां निरीक्षते |
५३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
कूजतां क्रन्दतां चैव स्तनतां चैव संय़ुगे |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
कूजतां स्तनतां चैव पदातीनां महाहवे |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
कूजद्भिरतुलान्नादान्रोषितैरुरगैरिव ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
कूटमुद्गरहस्तस्तु मृत्युस्तं वै समन्वय़ात् |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
कूटविद्यादय़श्चैव रूपैश्वर्यमदस्तथा ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
कूटशः स्म प्रदृश्यन्ते गात्राणि कवचानि च ||
५ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
कूटशाल्मलिकं चापि दुस्पर्शं तीक्ष्णकण्टकम् |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
कश्यप उवाच
कूटसाक्षित्वमभ्येतु यस्ते हरति पुष्करम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
कश्यप उवाच
कूटसाक्षित्वमभ्येतु विसस्तैन्यं करोति यः ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
कूटस्थं कर्तृनिर्द्वन्द्वमकर्तेति च यं विदुः ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
कूटस्थं चैव नित्यं च यद्वदन्ति शमात्मकाः ||
९७ ख