आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
अन्नस्य वहवो राजन्नुत्सर्गाः पर्वतोपमाः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
अन्नस्य हि प्रदानेन नरो दुर्गं न सेवते |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
अन्नस्य हि प्रदानेन रन्तिदेवो दिवं गतः ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
अन्नस्य हि प्रदानेन स्वर्गमाप्नोति कौशिकः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
अन्नात्प्रभवति प्राणः प्रत्यक्षं नात्र संशय़ः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्नात्प्राणः प्रभवति अन्नदः प्राणदो भवेत् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
अन्नात्प्राणः प्रभवति तेजो वीर्यं वलं तथा ||
५७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
अन्नात्प्राणभृतस्तात प्रवर्तन्ते हि सर्वशः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२८९
वैशम्पाय़न उवाच
अन्नादिसमुदाचारः शय़्यासनकृतस्तथा |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
अन्नाद्गृहस्था लोकेऽस्मिन्भिक्षवस्तत एव च |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्नाद्गृहस्था लोकेऽस्मिन्भिक्षवस्तत एव च |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
अन्नाद्धि प्रसवं विद्धि रतिमन्नाद्धि भारत |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्नाद्यभूता लोकस्य इत्यपि श्रूय़ते श्रुतिः ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
अन्नाद्याहरणे युक्ताः सन्तु मत्प्रिय़काम्यया ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
अन्नाद्वलं च तेजश्च प्राणिनां वर्धते सदा |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
युधिष्ठिर उवाच
अन्नानां वाससां चैव भूय़ एव व्रवीहि मे ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
दुर्योधन उवाच
अन्नानामपि पर्याय़ं कर्तुमिच्छन्ति मानवाः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
अन्नानि प्रातःसवने निय़ता व्रह्मचारिणः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
अन्नार्थिनमनुप्राप्तं विद्धि मां मुनिसत्तम ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
अन्नार्थिनी समभ्यागात्सपुत्रा कालचोदिता ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
अन्नार्थी त्वं तमन्नेन समांसेनोपपादय़ ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
अन्ने दत्ते नरेणेह प्राणा दत्ता भवन्त्युत |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
अन्ने प्रतिष्ठिता लोकास्तस्मादन्नं प्रकाशते ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
अन्नेन धार्यते सर्वं विश्वं जगदिदं प्रभो ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
अन्नेन सदृशं दानं न भूतं न भविष्यति |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
अन्नेनान्नं च यो लिप्सेत्कर्मार्थं चैव भारत |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
अन्नौषध्यो महाराज वीरुधश्च जलोद्भवाः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
अन्य एव तथा मत्स्यस्तथान्यदुदकं स्मृतम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
अन्यं च मशकं विद्यादन्यच्चोदुम्वरं तथा |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
अन्यं च रथमास्थाय़ द्रोणः प्रहरतां वरः ||
८९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
अन्यं जानीहि यः शक्यस्त्वय़ा भीषय़ितुं रणे ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
अन्यं तस्मै पुनर्दद्यां सौवर्णं हस्तिषड्गवम् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
अन्यं तस्मै वरं दद्यां कुञ्जराणां शतानि षट् |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
अन्यं तस्मै वरं दद्यां यमसौ कामय़ेत्स्वय़म् ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
अन्यं तस्मै वरं दद्यां श्वेतान्पञ्चशतान्हय़ान् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यं देहं समास्थाय़ पुनस्तेनैव योत्स्यसे ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
अन्यं प्रव्रूहि वापि त्वं कश्यपात्क्षत्रिय़ं वरम् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
अन्यं राजानमाधाय़ पाञ्चालेषु नरेश्वरम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२९८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यं वरय़ भद्रं ते वरं त्वममरोपम ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
५१
सूत उवाच
अन्यं वरय़ भद्रं ते वरं द्विजवरोत्तम |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय
६३
कर्ण उवाच
अन्यं वृणीष्व पतिमाशु भामिनि; यस्माद्दास्यं न लभसे देवनेन |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
अन्यः कार्यः स्वराष्ट्रेषु परराष्ट्रेषु चापरः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१४८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यः कृतय़ुगे कालस्त्रेताय़ां द्वापरेऽपरः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
अन्यः प्राप्तस्य चान्यस्य शिरः काय़ादपाहरत् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
सर्प उवाच
अन्यः प्रय़ोगे स्यादत्र किल्विषी जन्तुनाशने ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
अन्यः स पुरुषोऽव्यक्तस्त्वध्रुवो ध्रुवसञ्ज्ञकः |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
अन्यकामा हि धर्मज्ञ कन्यका प्राज्ञमानिना |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
अन्यगोत्रं प्रशस्तं वा क्षत्रिय़ं क्षत्रिय़र्षभ ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
७३
केशिन्यु उवाच
अन्यच्च तस्मिन्सुमहदाश्चर्यं लक्षितं मय़ा |
१४ क