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वन पर्व
अध्याय ११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
अन्यच्च तस्याद्भुतदर्शनीय़ं; विकूजितं पादय़ोः सम्प्रभाति |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
गौतम उवाच
अन्यच्च वित्तं विविधं नरेन्द्र; किं व्राह्मणस्येह धनेन कृत्यम् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
धृतराष्ट्र उवाच
अन्यच्च वित्तं विविधं महर्षे; किं व्राह्मणस्येह गजेन कृत्यम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
अन्यत्कार्मुकमादत्त वेगघ्नं भारसाधनम् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
अन्यत्कार्मुकमादत्त सत्वरं वेगवत्तरम् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
अन्यत्कार्मुकमादाय़ धर्मपुत्रश्चमूमुखे ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
अन्यत्कार्मुकमादाय़ भास्वरं वेगवत्तरम् ||
६० ख
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
अन्यत्कार्मुकमादाय़ रथमारुह्य वीर्यवान् |
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
अन्यत्कार्मुकमादाय़ वेगवद्वलवत्तरम् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८५
विदुर उवाच
अन्यत्कुम्भादपां पूर्णादन्यत्पादावसेचनात् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८५
विदुर उवाच
अन्यत्कुशलसम्प्रश्नान्नैषिष्यति जनार्दनः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यत्तु व्राह्मणा राजन्भुञ्जतेऽन्नं सुसंस्कृतम् ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यत्र कामाद्द्वेषाद्वा रोषाद्वास्मासु केवलात् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यत्र कालोपहताननेका; न्समीक्षमाणस्तु कुरून्मुमूर्षून् ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
अन्यत्र कुन्त्या भद्रं ते साद्य पिंषामि चन्दनम् |
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
अन्यत्र कौरवेय़ेभ्यो ये वा तेषां पदानुगाः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४९
भीष्म उवाच
अन्यत्र क्षेत्रजः पुत्रो लक्ष्यते भरतर्षभ |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४५
भीष्म उवाच
अन्यत्र जातय़ा सा हि प्रजय़ा पुत्र ईहते |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
अन्यत्र तर्कशास्त्रेभ्य आगमाच्च यथागमम् ||
३९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
अन्यत्र तापसस्वाच्च व्राह्मणस्वाच्च भारत ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
अन्यत्र तु गुरुं वृद्धं धार्मिकं वा विचक्षणम् ||
७० ग
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
अन्यत्र दक्षिणा या तु देय़ा भरतसत्तम |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
अन्यत्र पाण्डवान्युद्धे त्वय़ा गुप्तान्महारथान् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
अन्यत्र पापाद्विषमान्मन्दवुद्धे; र्दुर्योधनात्क्षुद्रतराच्च कर्णात् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
अन्यत्र पुत्राच्छिष्याद्वा शिक्षार्थं ताडनं स्मृतम् ||
६१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
अन्यत्र भवतो वीर्यं तस्मात्त्राय़स्व नस्ततः ||
५१ ख
विराट पर्व
अध्याय ४६
भीष्म उवाच
अन्यत्र भारताचार्यात्सपुत्रादिति मे मतिः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
अन्यत्र मरणात्स्तेय़ादन्यत्र परसंश्रय़ात् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
अन्यत्र यस्मात्तव मृत्युकाला; दव्राह्मणे व्रह्म न हि ध्रुवं स्यात् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
नरनाराय़णावू ऊचतुः
अन्यत्र युद्धमाकाङ्क्ष्व वहवः क्षत्रिय़ाः क्षितौ ||
२१ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
अन्यत्र युद्धात्कुरवः परीप्स; न्न युध्यतां शेष इहास्ति कश्चित् ||
९० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
अन्यत्र रथिनां श्रेष्ठाद्भीमसेनान्महावलात् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
अन्यत्र राजन्हिंसाय़ा वृत्तिर्नेहास्ति कस्यचित् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यत्र रामाद्द्रोणाद्वा कृपाद्वापि शरद्वतः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३
नारद उवाच
अन्यत्र वधकालात्ते सदृशेन समेय़ुषः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
अन्यत्र वस्तुं गच्छेद्वा वसेद्वा नित्यमानितः ||
८७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३०
अलर्क उवाच
अन्यत्र वाणानस्यामि शत्रुभिः परिवारितः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
व्रह्मो उवाच
अन्यत्र वासाय़ विभुर्न च देवानदर्शय़त् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
अन्यत्र वासुदेवाद्वा ज्येष्टाद्वा पाण्डुनन्दनात् ||
८१ ख
आदि पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यत्र विदुरामात्यात्तस्मात्खनकसत्तमात् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय १०७
लोमश उवाच
अन्यत्र विवुधश्रेष्ठान्नीलकण्ठान्महेश्वरात् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
अन्यत्र व्राह्मणस्वेभ्य आददानो न दुष्यति |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यत्र व्राह्मणात्तात सर्वपापेष्ववस्थितात् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
अन्यत्र श्रोत्रिय़स्वाच्च तापसस्वाच्च भारत ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यत्र सङ्ग्रामगतान्न स जीवेदसंशय़म् ||
५३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ९८
कण्व उवाच
अन्यत्र साधु गच्छावो द्रष्टुं नार्हामि दानवान् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
अन्यत्र सैन्धवाद्राजन्न स्म कश्चिदतिष्ठत ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
अन्यत्र हि वधादेषां नास्ति राजन्पराजय़ः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
अन्यत्रान्यत्र युक्तेषु किं स शोचेत्ततः परम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
अन्यत्रापि सतीं लक्ष्मीं कुशला भुञ्जते जनाः |
३३ ख