chevron_left  तामुवाचarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
तामुवाच महादेवः कन्यां किल वृषध्वजः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
तामुवाच महावाहुः केशवः परिसान्त्वय़न् |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
तामुवाच महावाहो व्रह्महत्यां पितामहः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
तामुवाच मुनिः क्रुद्धो वसिष्ठं शीघ्रमानय़ |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
भीष्म उवाच
तामुवाच स देवर्षिः सत्यं वद सुमध्यमे |
९ क
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
तामुवाच स धर्मात्मा नृशंसं वत ते कृतम् |
३२ क
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
तामुवाचाथ गान्धारी सह वध्वा यशस्विनीम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
तामुवाचानवद्याङ्गीं सार्थस्य महतः प्रभुः |
१२१ क
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
तामुवाचेश्वरः प्रीतो वृणु काममिति स्वय़म् ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
तामूचुर्वसवो देवाः शप्ताः स्मो वै महानदि |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
तामृचीकस्तदा दृष्ट्वा ध्यानय़ोगेन वै ततः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
तामृतां कुरु कल्याण पुरोक्तां भारतीं नृप ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
तामृषिर्वरदो व्यासो दूरश्रवणदर्शनः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय १२०
वैशम्पाय़न उवाच
तामेकवसनां दृष्ट्वा गौतमोऽप्सरसं वने |
८ क
स्त्री पर्व
अध्याय २४
गान्धार्यु उवाच
तामेतामनुशोचन्ति सपत्न्यः स्वामिव स्नुषाम् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय २२४
वैशम्पाय़न उवाच
तामेव तु ममामित्रीं चिन्तय़न्परितप्यसे |
११ क
वन पर्व
अध्याय १२२
लोमश उवाच
तामेव प्रतिगृह्याहं राजन्दुहितरं तव |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १११
लोमश उवाच
तामेव भावेन गतेन शून्यो; विनिःश्वसन्नार्तरूपो वभूव ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ८६
यय़ातिरु उवाच
तामेव रात्रिं प्रय़तेत विद्वा; नरण्यसंस्थो भवितुं यतात्मा ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १२६
लोमश उवाच
तामेव रात्रिं राजेन्द्र महात्मा भृगुनन्दनः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय २२४
जरितो उवाच
तामेव लपितां गच्छ तरुणीं चारुहासिनीम् ||
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय ८
द्रौपद्यु उवाच
तामेव स ततो रात्रिं प्रविशेदपरां तनुम् ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
तामेवं भाषमाणां तु शाल्वः काशिपतेः सुताम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
व्रह्मो उवाच
तामेवं व्रुवतीं देवीं सुरभीं त्रिदशेश्वर |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
तामेवमुक्त्वा राजर्षिर्दुःषन्तो महिषीं प्रिय़ाम् |
४३ क
स्त्री पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
तामेवाद्य महावाहो पश्याम्यन्यानुशासनात् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
तामेष निखिलां वेत्ति ध्रुवं परपुरञ्जय़ः ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
तामोघवान्ददौ तस्मै स्वय़मोघवतीं सुताम् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
ताम्रपर्णीं तु कौन्तेय़ कीर्तय़िष्यामि तां शृणु ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
ताम्रराजतलोहानां प्रादुरासीन्महास्वनः ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
ताम्रलिप्तं च राजानं काचं वङ्गाधिपं तथा ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय ५४
युधिष्ठिर उवाच
ताम्रलोहैः परिवृता निधय़ो मे चतुःशताः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
ताम्रवर्णः शिरो राजञ्श्रीमान्मलय़पर्वतः |
५३ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
ताम्रा तु सुषुवे देवी पञ्चैता लोकविश्रुताः ||
५४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
ताम्राक्ष्यस्ताम्रवर्णाश्च हर्यक्ष्यश्च तथापराः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
ताम्रारुणं समासाद्य व्रह्मचारी समाहितः |
१३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
ताम्रारुणा वेत्रवती पर्णाशा गौतमी तथा ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
ताम्रावती वेत्रवती नद्यस्तिस्रोऽथ कौशिकी ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
उत्तङ्क उवाच
ताम्रास्यनेत्रः कौरव्य प्रज्वलन्निव तेजसा ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
ताम्राय़सानि भाण्डानि वस्त्राणि विविधानि च ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
ताम्रेक्षणस्तीक्ष्णदंष्ट्रो भृकुटीकृतलोचनः |
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
श्रीवासुदेव उवाच
तारकश्च महादैत्यो विप्रचित्तिश्च वीर्यवान् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
व्रह्मो उवाच
तारकस्य वधोपाय़ः कथितो वै मय़ानघाः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
तारकाक्षसुतश्चासीद्धरिर्नाम महावलः |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
तारकामय़सङ्काशः परमर्षिकपार्थय़ोः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
तारकाशतचित्रौ च निस्त्रिंशौ सुमहाप्रभौ ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २८८
कुन्त्यु उवाच
तारणाय़ समर्थाः स्युर्विपरीते वधाय़ च ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय ४
युधिष्ठिर उवाच
तारणाय़ास्य दुःखस्य प्रस्थानाय़ जय़ाय़ च ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
तारणे युक्तरूपौ तौ व्राह्मणावृषिसत्तमौ |
८ क
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
तारा ददर्श तं भूमौ तारापतिमिव च्युतम् ||
३८ ख