आदि पर्व
अध्याय
८५
अष्टक उवाच
अन्यद्वपुर्विदधातीह गर्भ; उताहो स्वित्स्वेन कामेन याति |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
२०१
पितामह उवाच
अन्यद्वृणीतां मृत्योश्च विधानममरैः समम् ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यपूर्वां स्त्रिय़ं जातु त्वदन्यो मधुसूदन ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यमस्मै वरं देहीत्यसकृद्भृगुनन्दन ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यमुत्पादय़ामास पुत्रं भृगुरनिन्दितम् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
कुण्डधार उवाच
अन्यमेवाहमिच्छामि भक्ताय़ानुग्रहं कृतम् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यमौशीनराच्छैव्याद्धुरो वोढारमित्युत |
६५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
अन्यया यौवने मर्त्यो वुद्ध्या भवति मोहितः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
अन्यश्च राजन्नवरस्तथान्यः पञ्चविंशकः |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
अन्यश्च शश्वदव्यक्तस्तथान्यः पञ्चविंशकः |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
चण्डाल उवाच
अन्यस्मिञ्जन्मनि विभो ज्ञानविज्ञानपारगः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
अन्यस्मिन्करणीय़े त्वं कार्ये पार्थिवसत्तम |
१८१ क
आदि पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यस्मिन्नृप कर्तव्ये त्वमन्यत्कुरुषेऽनघ |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
अन्यस्मिन्प्रेष्यमाणे तु पुरस्ताद्यः समुत्पतेत् |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
अर्जुन उवाच
अन्यस्मै त्वं गाण्डिवं देहि पार्थ; यस्त्वत्तोऽस्त्रैर्भविता वा विशिष्टः ||
६१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
अन्यस्य चाप्युपस्थानं दूरतः परिवर्जय़ेत् ||
२६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
भीमसेन उवाच
अन्यस्यापि न पातव्यं रुधिरं किं पुनः स्वकम् |
१४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
अन्या चापहृतं काय़ाच्चारुकुण्डलमुन्नसम् |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
१५
कीचक उवाच
अन्या भद्रे नय़िष्यन्ति राजपुत्र्याः परिस्रुतम् |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
१४
द्रौपद्यु उवाच
अन्यां प्रेषय़ भद्रं ते स हि मामवमंस्यते ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
८५
यय़ातिरु उवाच
अन्यां योनिं पवनाग्रानुसारी; हित्वा देहं भजते राजसिंह ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९
भीष्म उवाच
अन्यां योनिं समापन्नौ सार्गालीं वानरीं तथा ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
स्कन्द उवाच
अन्यां वः कां प्रय़च्छामि प्रजां यां मनसेच्छथ ||
१८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यांश्च पार्थिवान्राजञ्शतशोऽथ सहस्रशः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
अन्यांश्च विविधान्वन्यांश्चचार पृथिवीपतिः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
अन्यांश्च वीरान्समरे प्रमृद्ना; द्द्रोणः सुतानां तव भूतिकामः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यांश्च वृष्णीनुपगम्य पूजां; चक्रे यथाधर्ममदीनसत्त्वः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
अन्यांश्च शतशो वाणान्प्रेषय़ामास पार्षते |
६३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यांश्च शिष्यान्भीमादीन्राज्ञश्चैवान्यदेशजान् |
५७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
अन्यांश्च सुवहूञ्शूरान्युद्धाय़ समुपागतान् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
अन्यांश्चरेथास्तावतोऽव्दांस्ततस्त्वं; निश्चित्य तत्प्रतिजानीहि पार्थ ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
अन्यांश्चास्मै रथोदारानुपस्थापय़दच्युतः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
२५
सूत उवाच
अन्यानतुलरूपाङ्गानुपचक्राम खेचरः ||
२९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
अन्यानन्यांश्च पुरुषानभिसृत्याभिसृत्य च |
६३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
अन्यानपि महाराज पातय़ामास पार्थिवान् ||
१२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
अन्यानपि महेष्वासांस्तूर्णमेवाभिदुद्रुवे ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
अन्यानपि सृजेय़ुश्च लोकाँल्लोकेश्वरांस्तथा |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यानि चैव भूतानि पीडय़ामासुरोजसा ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
अन्यान्परिवदन्साधुर्यथा हि परितप्यते |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
अन्यान्यपि सुरम्याणि ददर्श सुवहून्यथ |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
अन्यान्वहूंश्च सुहृदो जीवितार्थोऽद्य को मम ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
मन उवाच
अन्यान्वाणान्समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदय़िष्यसि |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
घ्राण उवाच
अन्यान्वाणान्समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदय़िष्यसि |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
जिह्वो उवाच
अन्यान्वाणान्समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदय़िष्यसि |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
त्वगु उवाच
अन्यान्वाणान्समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदय़िष्यसि |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
श्रोत्र उवाच
अन्यान्वाणान्समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदय़िष्यसि |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
चक्षुरु उवाच
अन्यान्वाणान्समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदय़िष्यसि |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यान्विजेष्यसे शत्रूनेष स्वार्थस्तवाखिलः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
अन्यामन्यां धनावस्थां प्राप्य वैशेषिकीं नराः |
१९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२
विदुर उवाच
अन्यामन्यां धनावस्थां प्राप्य वैशेषिकीं नराः |
२० क