वन पर्व
अध्याय
२५६
भीमसेन उवाच
तत एनं विचेष्टन्तं वद्ध्वा पार्थो वृकोदरः |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तत एनं विचेष्टन्तमकामं भय़पीडितम् |
४७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
तत एनं विमनसं क्षत्रधर्मे समास्थितम् |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
तत एनं वेपमाना विवर्णा प्राञ्जलिस्तदा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
तत एनं समुत्क्षिप्य सहसा विनतासुतः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
तत एनं समुद्धूतं कण्ठे जग्राह पाणिना |
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भृगुरु उवाच
तत एनं सुदुर्वुद्धिं धिक्षव्दाभिहतत्विषम् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
तत एनं सुसंविग्नाः सर्व एवाभिदुद्रुवुः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
तत एनं हनिष्यन्ति पाञ्चाला हतरक्षिणम् ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
तत एनमिदं वाक्यं स्मय़मान इवाव्रवीत् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
तत एनमुपाजग्मुरमात्याः सपुरोहिताः |
६५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
तत एनमुपातिष्ठञ्शौचार्थं परिचारकाः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
तत एनमुवाचार्तः क्रोधपर्याकुलेक्षणम् |
६५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
तत एनमुवाचेदं पाण्डवार्थे गदाग्रजः ||
८४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
तत एनां महावाहुः केशवः शोककर्शिताम् |
६५ क
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
तत एनां वलाद्राजा निजग्राह रहोगताम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
तत एव च विस्तारं व्रह्म सम्पद्यते तदा ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
तत एव च विस्तारं व्रह्म सम्पद्यते तदा ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
तत एव तु गाय़त्र्याः स्थानं त्रैलोक्यविश्रुतम् |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
तत एव पुनश्चापि गतः स्वर्गमिति श्रुतिः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
तत एव प्रवर्तन्ते तमेव प्रविशन्ति च |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
भीष्म उवाच
तत एव समुत्थेन तमसा रुध्यतेऽपि च ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
तत एव हि कौरव्य दृश्यन्ते लुव्धवुद्धिषु |
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६९
मातलिरु उवाच
तत एषां वधार्थाय़ शक्रोऽस्त्राणि ददौ तव |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
तत एषां समाचारः संवासाद्विदितो मम ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
तत एष्यति ते राजन्वशमद्य युधिष्ठिरः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२१
जरितो उवाच
तत एष्याम्यतीतेऽग्नौ विहर्तुं पांसुसञ्चय़म् |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
तत औशनसं तीर्थमाजगाम हलाय़ुधः |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
तत औशनसे तीर्थे तस्योपस्पृशतस्तदा |
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
७२
देवय़ान्यु उवाच
ततः कच न ते विद्या सिद्धिमेषा गमिष्यति ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कञ्चित्सभोद्देशं स्वर्गोद्देशसमं नृप |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
ततः कतिपय़ाहस्य जरत्कारुर्महातपाः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
ततः कतिपय़ाहस्य तच्छ्रुत्वा भरतर्षभ |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
२११
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कतिपय़ाहस्य तस्मिन्रैवतके गिरौ |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कतिपय़ाहस्य महाह्रदनिवासिनम् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
८
सूत उवाच
ततः कतिपय़ाहस्य विवाहे समुपस्थिते |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कतिपय़ाहस्य वीभत्सुः कृष्णमव्रवीत् |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कतिपय़ाहस्य व्यासः सत्यवतीसुतः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कतिपय़ाहस्य व्राह्मणः संशितव्रतः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कथां तस्य निशम्य राजा; वैचित्रवीर्यः कृपय़ाभितप्तः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः कथान्ते गृध्रस्य जटाय़ोरभवत्कथा ||
४५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कथान्ते गोविन्दो गुडाकेशमुवाच ह |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
भीष्म उवाच
ततः कथान्ते राजर्षिर्भृगुश्रेष्ठं महावलम् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
ततः कथान्ते राजर्षिर्महात्मा होत्रवाहनः |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कथान्ते व्यासस्तं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कथास्ते समवाय़युक्ताः; कृत्वा विचित्राः पुरुषप्रवीराः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
ततः कदाचिच्छिष्यास्तं परिवार्यावतस्थिरे |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कदाचिच्छोचन्तं शन्तनुं ध्यानमास्थितम् |
५४ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कदाचित्कुशलः कथासु; विप्रोऽभ्यगच्छद्भुवि कौरवेय़ान् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
ततः कदाचित्तस्याथ वनस्थस्य समुद्गतः |
१६ क