शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
अन्योन्यं नाभिभाषन्ते तत्पराभवलक्षणम् ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं नाभिवर्तन्ते साम्यं भवति वै यदा |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं निघ्नतां राजन्यमराष्ट्रविवर्धनम् ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यं परिपप्रच्छुः पुनः स्वाध्याय़कारणात् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्योन्यं परिमुष्णन्तो हिंसय़न्तश्च मानवाः |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं परिरक्षद्भिर्योद्धव्यं सहितैश्च नः ||
९ ग
शल्य पर्व
अध्याय
१७
शकुनिरु उवाच
अन्योन्यं परिरक्षामो यत्नेन महता नृप |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं प्रजिहीर्षन्तावन्योन्यस्यान्तरैषिणौ |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
अन्योन्यं प्रति कौन्तेय़ स व्यवर्धत हृच्छय़ः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अन्योन्यं प्रति च क्रोधो युधिष्ठिरकिरीटिनोः |
१७१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं प्रतिसंरव्धाः समासाद्य परस्परम् |
६८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं प्रतिसंरव्धावन्योन्यस्य जय़ैषिणौ ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं प्रत्यभाषन्त तय़ोर्दृष्ट्वा पराक्रमम् ||
६२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं प्रीतिमन्तस्ते यथापूर्वं यथावय़ः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं प्रेक्षमाणौ च चेरतुस्तौ महारथौ ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं प्रेक्षमाणौ च हसमानौ पुनः पुनः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
अन्योन्यं भक्षय़न्तो हि प्रचरेय़ुर्वृका इव ||
२७ ख
मौसल पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यं मुसलैस्ते तु निजघ्नुः कालचोदिताः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं रथिनः पेतुर्वाजिनश्च महाहवे |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं वाग्भिरुग्राभिस्तक्षमाणौ व्यवस्थितौ ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं विशिखैस्तीक्ष्णैर्जघ्नतुः पुरुषर्षभौ ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं वै प्रार्थय़तां योधानामर्जुनस्य च ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं शरवर्षाभ्यां ववृषाते रणाजिरे ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं श्रावय़न्ति स्म नामगोत्राणि भारत |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं सन्ततक्षाते रणेऽनुपमविक्रमौ ||
५९ ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यं समनुज्ञाप्य जग्मतुः स्वगृहान्प्रति ||
५९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं समपश्यन्त निकृत्तान्मेदिनीतले |
४० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं समभाषन्त पाञ्चालाः पाण्डवैः सह ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
अन्योन्यं समभिप्रेत्य मैथुनस्य समागमे |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं समरे क्रुद्धौ कृतप्रतिकृतैषिणौ ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं समरे जघ्नुः कृतवैराः परस्परम् ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं समरे जघ्नुर्योधव्रतमनुष्ठिताः |
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं समरे जघ्नुस्तय़ोस्तत्र पराक्रमे ||
६८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं समरे प्राप्य किञ्चिच्छेषा विशां पते ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं समरे योधाः शरशक्तिपरश्वधैः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं समरे राजन्प्रत्यधावन्नमर्षिताः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं समरे राजन्प्रार्थय़ाना महद्यशः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं समलीय़न्त पलाय़नपराय़णाः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं समविध्येतां शरैस्तौ द्रोणसात्यकी ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं समुपाश्रित्य न त्यक्ष्यन्ति रणाजिरम् ||
३२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं सम्परिष्वज्य शय़ानान्द्रवतोऽपरान् |
१२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं स्पर्धमानाश्च अन्योन्यस्य हिते रताः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
अन्योन्यं स्पृहय़न्त्येते अन्योन्यस्य हिते रताः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं हि रणे शूराः केशेष्वाक्षिप्य मारिष |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
अन्योन्यं हृष्टमनसः परिषस्वजिरे तदा ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
विश्वामित्र उवाच
अन्योन्यकर्माणि तथा तथैव; न लेशमात्रेण कृत्यं हिनस्ति ||
८६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
अन्योन्यकृतवैराणां न सन्धिरुपपद्यते |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
व्रह्मदत्त उवाच
अन्योन्यकृतवैराणां संवासान्मृदुतां गतम् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अन्योन्यकृतवैरौ तु चक्रतुः प्रीतिमुत्तमाम् |
१९५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
अन्योन्यगुणय़ुक्तस्य कः केन गुणतोऽधिकः ||
१५५ ख