chevron_left  अन्योन्यनिय़तान्वैद्यान्धर्मसेतुप्रवर्तकान्arrow_drop_down
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
व्रह्मो उवाच
अन्योन्यनिय़तान्वैद्यान्धर्मसेतुप्रवर्तकान् |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यपरिपिष्टाश्च समासाद्य परस्परम् |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय १०२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यप्रीतिसंय़ुक्ता व्यवर्धन्त प्रजास्तदा ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यप्रेक्षय़ा पश्य द्रवतीय़ं वरूथिनी ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
अन्योन्यभक्षणं दृष्ट्वा भूतानामपि चाशुभम् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
अन्योन्यभक्षणे सक्ता लोभमोहसमन्विताः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यभेदात्ते सर्वे विनेशुरिति नः श्रुतम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यमनुनीय़ैवं भ्रातरौ तौ महाद्युती |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३९
व्रह्मो उवाच
अन्योन्यमनुषज्जन्ते अन्योन्यं चानुजीविनः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
अन्योन्यमन्यौ च यथा सम्प्रय़ोगस्तथा तय़ोः ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमपसव्यं च कर्तुं वीरौ तदैषतुः |
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमपि चाजघ्नुरात्मानमपि चापरे |
४३ क
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमभिगर्जन्तः प्रहरन्तः परस्परम् ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
अन्योन्यमभिगर्जन्तः शस्त्रैर्देहानपातय़न् ||
९९ ख
विराट पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यमभिगर्जन्तो गोषु गृद्धा महावलाः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमभिगर्जन्तो गोष्ठेष्विव महर्षभाः ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यमभिगर्जन्तौ गोष्ठे गोवृषभाविव ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमभितो राजन्क्रूरमाय़ोधनं वभौ ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमभिधावन्त परस्परवधैषिणः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमभिधावन्तः सम्प्रहारं प्रचक्रिरे |
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमभिधावन्तः सम्प्रहारं प्रचक्रिरे ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
अन्योन्यमभिधावन्ति शिशवो दण्डपाणय़ः |
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमभिधावन्तौ मत्ताविव महाद्विपौ |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमभिनर्दन्तः सम्प्रहारं प्रचक्रिरे ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यमभिनर्दन्तो दिशः सम्प्रतिपेदिरे ||
५७ ख
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यमभिनिघ्नन्तः पुनर्लोकानवाप्स्यथ ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यमभिनिघ्नन्ति शस्त्रैरुच्चावचैरपि ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९९
याज्ञवल्क्य उवाच
अन्योन्यमभिमन्यन्ते अन्योन्यस्पर्धिनस्तथा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०४
गुरुरु उवाच
अन्योन्यमभिवर्तन्ते पुरुषाधिष्ठिताः सदा ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यमभिवर्तेतां वलविक्रमशालिनौ ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमभिविध्येतां जीवितान्तकरैः शरैः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमभिवीक्षन्तौ कोपाद्विवृतलोचनौ ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमभिवीक्षन्तौ गोष्ठेष्विव महर्षभौ ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमभिसंरव्धौ प्रेक्षमाणावरिन्दमौ |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमभिसंश्लिष्य योधास्ते भरतर्षभ ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अन्योन्यमभिसन्धातुमभूच्चैव तय़ोर्मतिः ||
१९५ ख
आदि पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यमभिसम्पूज्य जग्मतुस्तौ यथागतम् ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमभ्यधावेतां शस्त्रप्रवरधारिणौ ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १०२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यमभ्यवर्धन्त धर्मोत्तरमवर्तत ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमर्जुनं मत्वा स्वमात्मानं च जघ्निरे ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
शल्य उवाच
अन्योन्यमवतक्षन्तो देशे देशे समैथुनाः ||
८६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमवमृद्नन्तः शक्तितोमरपट्टिशैः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यमव्रुवन्देवाः कमय़ं धास्यतीति वै ||
७६ ख
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमव्रुवन्राजन्मृगव्याधाः शनैरिदम् ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमश्वपृष्ठेभ्यो विकर्षन्तो महावलाः |
५० क
कर्ण पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमसिभिस्तूर्णं समाजघ्नतुराहवे ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमाच्छादय़तां महारथौ; मद्राधिपश्चापि युधिष्ठिरश्च ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमाच्छादय़तामथाभज्यत वाहिनी ||
३७ ख
विराट पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्यमाजौ पुरुषप्रवीरौ; समं समाजघ्नतुराजमीढौ ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२८
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमार्दय़न्राजन्नित्ययत्ताः पराक्रमे ||
७ ख