आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
अन्योन्याश्चैव तनवो यथेष्टं प्रतिपद्यते |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
भीष्म उवाच
अन्योन्येन निवेद्याथ प्रातिष्ठन्त सहैव ते ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्येन महाराज कृतो घोरो जनक्षय़ः ||
१०९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
अन्योन्येन हि सैन्यानि भिन्नान्येतानि सारथे |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्योन्येनाभिसंरव्धौ परस्परजय़ैषिणौ ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
२०७
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्योऽग्निरिह लोकानां व्रह्मणा सम्प्रवर्तितः |
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
अन्योऽन्याज्जाय़ते देहस्तमाहुः सत्त्वसङ्क्षय़म् ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४५
भीष्म उवाच
अन्योऽप्यथ न विक्रेय़ो मनुष्यः किं पुनः प्रजाः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
अन्योऽहमन्येय़मिति यदा वुध्यति वुद्धिमान् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यौ तु खलु देवानां सूर्याचन्द्रमसौ स्मृतौ ||
२६ ग
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
अन्वंशाभ्यागतान्सर्वानृतून्संवत्सरो यथा ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वगच्छंस्तथैवान्यान्क्षत्रिय़ान्क्षत्रिय़र्षभाः |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
२५२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वगच्छत्तदा धौम्यः पदातिगणमध्यगः ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वगच्छत्तदा यान्तौ भार्गवस्य निवेशनम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
अन्वगच्छद्धनुष्पाणिः पर्यन्वेषंस्ततस्ततः ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वगच्छद्विशालाक्षी शिशुर्गजवधूरिव ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
अन्वगच्छन्त तमृषिं राजामात्याश्च सर्वशः |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
अन्वगच्छन्महाराज मत्स्याश्च सह सात्वतैः ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३६
सञ्जय़ उवाच
अन्वगच्छन्महाराज मत्स्याश्च सह सोमकैः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्वगच्छन्महाराज श्रिय़ा परमय़ा युतः ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
व्यास उवाच
अन्वगादेव तमृषिं प्राञ्जलिः सम्प्रसादय़न् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वगृह्णात्प्रजाः सर्वा यय़ातिरपराजितः ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वगेव च पर्जन्यः प्रावर्षद्विघने भृशम् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
अन्वगेव ततः पार्थस्तमनुद्रुत्य केशवम् |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
ऐल उवाच
अन्वग्वलं कतमेऽस्मिन्भजन्ते; तथावल्यं कतमेऽस्मिन्विय़न्ति ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
कश्यप उवाच
अन्वग्वलं दस्यवस्तद्भजन्ते; ऽवल्यं तथा तत्र विय़न्ति सन्तः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्वजानाच्च स्वाहाय़ा रूपान्यत्वं महामुनिः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
अन्वजानात्ततो द्यूतं धृतराष्ट्रः सुतप्रिय़ः |
९२ क
वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वजानात्स धर्मज्ञो मुनिर्दिव्येन चक्षुषा |
४ क
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वजानात्स संय़ोगं समय़े मत्स्यपार्थय़ोः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वजाय़न्त राजेन्द्र परस्परहिते रताः ||
७९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वतप्यच्च संस्मृत्य पुत्रं मन्दमचेतसम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
अन्वत्रस्तो वाहुवीर्यं विदान; उपह्वरे वासुदेवस्य धीरः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
अन्वद्रवन्त तं पश्चाद्राजानस्त्यक्तजीविताः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अन्वधावत सङ्क्रुद्धो भारद्वाजं गुरोः सुतम् ||
१८४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
अन्वधावत्किरन्वाणैः कङ्कपत्रैरजिह्मगैः ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
अन्वधावदनिर्विण्णो येन येन स्म गच्छतः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
अन्वधावद्रणे यत्तो युय़ुधानं युय़ुत्सय़ा ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्वधावन्मृगं रामो रुद्रस्तारामृगं यथा ||
१९ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वपद्यत तद्वाक्यं भ्रातुर्ज्येष्ठस्य वीर्यवान् ||
४ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वपद्यन्त तद्वाक्यं यदुक्तं सव्यसाचिना ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वपद्यन्त ते सर्वे भोजवृष्ण्यन्धकास्तदा ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
अन्वपद्यन्त विधिवद्यथा पाण्डुं नराधिपम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१०९
लोमश उवाच
अन्वपद्यन्त सहसा पुरुषा देवदर्शिनः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
अन्वपश्यत्स देवेन्द्रं विसमध्यगतं स्थितम् ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
अन्वमोदत तत्सर्वं यद्भीमेन कृतं युधि ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
अन्वर्थं तं पितुर्मध्ये महर्षीणां न्यवेदय़त् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
अन्वर्थनामा भव मे पुत्र मा व्यर्थनामकः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
अन्वर्थाः सम्प्रवर्तन्ते रथनेमिमरा इव ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५२
व्राह्मण उवाच
अन्वर्थोपगतैर्वाक्यैः पन्थानं चास्मि दर्शितः ||
१ ख