अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
अग्निः खं पृथिवी मित्र ओषध्यो वसवस्तथा ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७६
भृगुरु उवाच
अग्निः पवनसंय़ुक्तः खात्समुत्पतते जलम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निः पुष्टिमतिर्नाम तुष्टः पुष्टिं प्रय़च्छति |
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निः प्रनष्टो भगवान्कारणं च न विद्महे |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
अग्निः श्येनचितो नाम तस्य यज्ञे विधीय़ते ||
२३ ग
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निः स कपिलो नाम साङ्ख्ययोगप्रवर्तकः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निः स निष्कृतिर्नाम शोभय़त्यभिसेवितः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निः स मन्युमान्नाम द्वितीय़ो भानुतः सुतः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निः साचिव्यकर्ता स्यात्खाण्डवे तत्कृतं स्मरन् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
अग्निः सोमेन संय़ुक्त एकय़ोनि मुखं कृतम् |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
अग्निकल्पैर्दुराधर्षैः प्रदीप्तैरिव पावकैः ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निका लक्षणा क्षेमा देवी रम्भा मनोरमा ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०६
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निकार्यं स कृत्वा तु नागराजसुतां तदा |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
अग्निकार्यपरा नित्यं सदा पुष्पवलिप्रदा |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
अग्निकार्याणि समिधः कुशाः सुमनसस्तथा |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अग्निकुण्डानि शुभ्राणि तोत्त्रांश्चैवाङ्कुशैः सह |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अग्निचक्रमिवाविद्धं सर्वतः प्रत्यदृश्यत ||
३९ ख
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निचक्रमिवाविद्धं सव्यदक्षिणमस्यतः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
अग्निचक्रोपमं घोरं मण्डलीकृतमाय़ुधम् |
२३ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निचक्रोपमं घोरं विकर्षन्परमाय़ुधम् |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
अग्निजिह्वाश्च भुजगा विहगाश्चाप्ययोमुखाः ||
१०० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
अग्निज्वालासमाभासं हंसवर्हिणसेवितम् |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
अग्निज्वालैरिवाविद्धा पट्टैः शल्यस्य सा गदा ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
अग्निज्वालो महाज्वालो अतिधूम्रो हुतो हविः ||
७९ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
अग्नितीर्थं ततो गच्छेत्तत्र स्नात्वा नरर्षभ |
११९ क
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
अग्नितीर्थं महाप्राज्ञः स जगाम प्रलम्वहा |
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२०७
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्नित्वं विप्रनष्टं हि तप्यमानस्य मे तपः ||
१० ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
अग्निदत्तश्च वै दिव्यो रथः काञ्चनभूषणः |
४८ क
सभा पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निदत्तेन दिव्येन रथेनाद्भुतकर्मणा ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
४४
शकुनिरु उवाच
अग्निदाहान्मय़ं चापि मोक्षय़ित्वा स दानवम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
अग्निदाहेन चोरैर्वा राजभिर्वा हृतं धनम् |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
अग्निदैर्गरदैश्चैव प्रतिरूपकचारकैः |
४९ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
अग्निधारां समासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुताम् |
१२७ क
आदि पर्व
अध्याय
२२५
मन्दपाल उवाच
अग्निना च तथेत्येवं पूर्वमेव प्रतिश्रुतम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७९
भरद्वाज उवाच
अग्निना चोपय़ुक्तस्य कुतः सञ्जीवनं पुनः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४१
युधिष्ठिर उवाच
अग्निना तपसा चैव शक्यं गन्तुं वृकोदर ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
अग्निना तामसं दुर्गं नौभिराप्यं च गम्यते |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
६
पुलोमो उवाच
अग्निना भगवंस्तस्मै रक्षसेऽहं निवेदिता |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
अग्निनाशात्क्रिय़ाभ्रंशाद्भ्रान्ता लोकास्त्रय़ोऽनघाः |
१४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१९
गान्धार्यु उवाच
अग्निनेव गिरिः श्वेतो गतासुरपि दुःसहः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
अग्निनेव प्रदग्धानि वनानि शिशिरात्यये |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
अग्निप्रत्यागतप्राणस्ततः प्राह विहङ्गमम् ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निप्रवेशे निय़तं व्रह्मलोको विधीय़ते ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
७९
यय़ातिरु उवाच
अग्निप्रस्कन्दनपरस्त्वं चाप्येवं भविष्यसि ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
अग्निमध्यं प्रविष्टं तं लुव्धो दृष्ट्वाथ पक्षिणम् |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
कुशिक उवाच
अग्निमध्यगतेनेदं भगवन्संनिधौ मय़ा |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
अग्निमध्ये गवां मध्ये व्राह्मणानां च संसदि |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भृगुरु उवाच
अग्निमारुततोय़ानां वर्णाः क्षितितलस्य च |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भृगुरु उवाच
अग्निमारुततोय़ेभ्यो दुर्ज्ञेय़ं दैवतैरपि ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
अग्निमारुतवद्राजन्नाह्वय़न्तः परस्परम् ||
७ ख