वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
अपक्रान्तेषु चैतेषु जमदग्नौ तथागते |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
अपक्रान्तो यतो देव तेन मे विस्मितं मनः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
अपक्रामेत्ततः क्षिप्रं कृतकार्यो विचक्षणः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
अपक्व एव यावके पुरा प्रणीय़से त्वर ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
अपक्वमतय़ो मन्दा न जानन्ति यथातथम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
ऋषय़ ऊचुः
अपक्वमेव तन्मांसमभूत्तेषां च धीमताम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
अपक्वस्य च कालेन वधस्तव न विद्यते |
३४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
अपक्वानागते काले स्वय़ं दोषान्प्रकोपय़न् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
अपक्षैः पक्षसङ्काशै रथैर्नागैश्च संवृतम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
अपक्षैः पक्षिसङ्काशै रथैरश्वैश्च संवृतम् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
अपगच्छ पथोऽस्माकमित्येवं पार्थिवोऽव्रवीत् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
अपगतफलसञ्चय़ः प्रहृष्टो; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
अपगतभय़मन्युलोभमोहः; स खलु सुखी विहरेदिमं विहारम् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
अपगतभय़रागमोहदर्पो; धृतिमतिवुद्धिसमन्वितः प्रशान्तः |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
अपचद्राजशार्दूल वदराणि महाव्रता ||
१९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
भीष्म उवाच
अपचन्त तदा स्थाल्यां क्षुधार्ताः किल भारत ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
अपचारं गवां तस्माद्वर्जय़ेत युधिष्ठिर ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
अपचारिणां च ये लोका ये च व्रह्मद्विषामपि ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
अपज्यमकरोत्पार्थो गाण्डीवमभय़ङ्करम् ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
अपज्यमकरोद्वीरः सहदेवस्तदाय़ुधम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
वासुदेव उवाच
अपण्डितो वापि सुहृत्पण्डितो वापि नात्मवान् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
अपण्डितो वापि सुहृत्पण्डितो वाप्यनात्मवान् |
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
अपतत्कुञ्जरादन्यो हय़ादन्यस्त्ववाक्षिराः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
अपतत्रसिरे सर्वे स्वधर्मे च दधुर्मनः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
अपतत्स तदा भूमौ विसञ्ज्ञोऽथ क्षुधान्वितः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
अपतत्सहसा तत्र यत्र भीमो व्यवस्थितः ||
३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
अपतत्सुमहद्वर्षं पुष्पाणां पुण्यगन्धिनाम् ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
अपतद्दग्धभूय़िष्ठं महाद्रुमवनं यथा ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
अपतद्दीप्यमाना च सनिर्घाता सकम्पना |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
अपतद्भुवि निस्त्रिंशश्च्युतः सर्प इवाम्वरात् ||
५२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
अपतन्त निकृत्ताङ्गा गता भूमिं गतासवः ||
४२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
अपतन्त रणे वाणाः पतङ्गा इव घोषिणः ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
अपतन्त रथौघाश्च तत्र तत्र सहस्रशः ||
२६ ग
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
अपतन्भूतले राजंश्छिन्नाभ्राणीव सर्वशः ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
अपतन्रुधिरार्द्राङ्गा निकृत्ता इव किंशुकाः ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
अपतिर्ह्यसि कृष्णेति व्रुवन्पार्थानवैक्षत ||
८० ख
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
अपत्यं कपिलाय़ास्तु पुराणे परिकीर्तितम् ||
५० ख
सभा पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
अपत्यं कर्म विद्या च यतः सृष्टाः प्रजास्ततः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१११
तापसा ऊचुः
अपत्यं गुणसम्पन्नं लव्ध्वा प्रीतिमवाप्स्यसि ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
अपत्यं च तपोमूलं तपोय़ोगाच्च लभ्यते ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
अपत्यं चैतदार्यस्य यो युष्माकं समो गुणैः |
७१ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
अपत्यं तु मृगाः सर्वे मृग्या नरवरात्मज |
६० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
अपत्यं तेजसा युक्तं प्रवीरं जनय़ प्रभो |
५० क
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
अपत्यं धर्मफलदं श्रेष्ठं विन्दन्ति साधवः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
अपत्यं नस्त्वमेवैकः कुले महति भारत |
५७ क
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
अपत्यं नाम लोकेषु प्रतिष्ठा धर्मसंहिता |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
७८
देवय़ान्यु उवाच
अपत्यं यदि ते लव्धं ज्येष्ठाच्छ्रेष्ठाच्च वै द्विजात् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
अपत्यं युवय़ोर्देव वलवद्भविता प्रभो |
४४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
अपत्यं वहुलं तात तेऽस्पर्धन्त परस्परम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
३४
व्रह्मो उवाच
अपत्यं वीर्यवान्देवा वीर्यवज्जनय़िष्यति ||
१५ ख