अनुशासन पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
अपत्यकामो रोहिण्यामोजस्कामो मृगोत्तमे |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
अपत्यजन्म शूद्राय़ां न प्रशंसन्ति साधवः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
अपत्यभागुत्तरासु हस्तेन फलभाग्भवेत् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१११
तापसा ऊचुः
अपत्यमनघं राजन्वय़ं दिव्येन चक्षुषा ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पुत्र उवाच
अपत्यमस्मि ते पुत्रस्त्राणात्पुत्रो हि विश्रुतः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
२५०
वैशम्पाय़न उवाच
अपत्यमस्मि द्रुपदस्य राज्ञः; कृष्णेति मां शैव्य विदुर्मनुष्याः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
अपत्यमीप्षितं त्वत्तस्तच्च तावन्न दृश्यते ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
अपत्यमुत्पाद्य ततः प्रतिष्ठाप्य कुलं तथा |
११७ क
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
अपत्यलाभं लभते स पुष्कलं; श्रिय़ं यशः प्रेत्य च शोभनां गतिम् ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
अपत्यसंविभागेन परां कीर्तिमवाप्नुहि ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
अपत्यस्नेहसंविग्ना जरिता वह्वचिन्तय़त् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
अपत्यस्य प्रदानेन समर्थः स महातपाः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
अपत्यस्यैव चापत्यं वनमेव तदाश्रय़ेत् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२४
मन्दपाल उवाच
अपत्यहेतोः सम्प्राप्तं तथा त्वमपि मामिह |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
९४
देवव्रत उवाच
अपत्यहेतोरपि च करोम्येष विनिश्चय़म् ||
८७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२४
मन्दपाल उवाच
अपत्यहेतोर्विचरे तच्च कृच्छ्रगतं मम ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
अपत्यानां च वैगुण्यं जनं विगुणमेव च |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
प्रतीप उवाच
अपत्यानां स्नुषाणां च भीरु विद्ध्येतदासनम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
अपत्यानामिव स्वेषां प्रजानां रक्षणे रतः |
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
अपत्यानीति सम्प्रेक्ष्य क्षमय़ाम पितामह ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
अपत्यार्थं निगृह्णीष्व तेजो ज्वलितमुत्तमम् ||
४५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
अपत्यार्थं महाराज तोषय़ामास शङ्करम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
अपत्यार्थं समारम्भो भवतश्चाय़मीप्सितः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
अपत्यार्थं समुत्क्रम्य प्रमादादिव भाषसे ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
अश्वपतिरु उवाच
अपत्यार्थः समारम्भः कृतो धर्मेप्सय़ा मय़ा |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
अपत्यार्थमय़ाचं वै प्रसादं कृतवांश्च सः |
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२९३
वैशम्पाय़न उवाच
अपत्यार्थे परं यत्नमकरोच्च विशेषतः ||
२ ग
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
अपत्याय़ च मां गच्छ त्वमेव कुरुनन्दन ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६८
राजो उवाच
अपत्याय़ेप्सितां मह्यं महिषीं गन्तुमर्हसि |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
अपत्येषु तथा वृत्ते समस्तेनैव धीमता |
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
अपत्योत्पादनार्थं स तीव्रं निय़ममास्थितः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
अपत्योत्पादने योगमापदि प्रसमर्थय़न् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
अपत्रपन्ति तादृग्भ्यस्तथावृत्ता भवन्ति च ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
अपत्रपानपत्रपे ह्रीश्च सम्पद्विपच्च ह ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
अपत्रपेत वा येन न तत्कुर्यात्कथञ्चन ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
अपथा गच्छतां तेषामनुय़ातापि पीड्यते ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
अपथा गच्छतां तेषामनुय़ातापि पीड्यते ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अपथ्यमिव तद्भुक्तं तस्यानर्थाय़ कल्पते ||
१०३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३४
युधिष्ठिर उवाच
अपदस्थान्पदे तिष्ठन्नपक्षान्पक्षसंस्थितः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
अपध्याता च विप्रेण न्यपतद्वसुधातले |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
अपध्यातो भगवता व्रह्मणा स महाभिषः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
अपध्यानमलो धर्मो मलोऽर्थस्य निगूहनम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
२२४
मन्दपाल उवाच
अपध्यानेन सा तेन धूमारुणसमप्रभा |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
अपध्यास्यन्ति यद्देव मृतांस्तेषां विभेम्यहम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
कामन्द उवाच
अपध्वस्तस्त्ववमतो दुःखं जीवति जीवितम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
कश्यप उवाच
अपध्वस्ता दस्युभूता भवन्ति; ये व्राह्मणाः क्षत्रिय़ान्सन्त्यजन्ति ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
अपध्वस्ता दस्युभूता भवन्ति; येषां राष्ट्रे व्राह्मणा वृत्तिहीनाः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३२
भीष्म उवाच
अपध्वस्तो ह्यवमतो दुःखं जीवति जीवितम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
अपनीतं त्वय़ा दुःखमिदं सत्यपराक्रम ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
धृतराष्ट्र उवाच
अपनीतं महत्तात तव चैव विशेषतः ||
१ ख