भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
अपनीतं सुनीतं वा तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
७३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
अपनीतं सुनीतेन योऽर्थं प्रत्यानिनीषते |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
अम्वो उवाच
अपनीतास्मि भीष्मेण भगवन्नविजानता |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११
द्रोण उवाच
अपनीते ततः पार्थे धर्मराजो जितस्त्वय़ा ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
अपनीते तु योगेन केनचिच्छ्वेतवाहने |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११
द्रोण उवाच
अपनीते नरव्याघ्रे कुन्तीपुत्रे धनञ्जय़े ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
अपनीय़ च शल्यांस्ते स्नात्वा च विविधैर्जलैः ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
अपनीय़ स्वय़ं तद्धि तैर्न्यस्तं तस्य वेश्मनि ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
अपनीय़त्सु शल्येषु धिष्ठितं पुरुषर्षभम् |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
१४२
हिडिम्वो उवाच
अपनेतुं च यतितो न चैव शकितो मय़ा ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
अपनेष्यामि गान्धारं पातय़ित्वा शितैः शरैः ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
अपरं दिवसं सर्वे राजन्सम्भूय़ कौरवाः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
अर्जुन उवाच
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
अपरः सर्वभूतानि दय़ावाननुपश्यति |
३७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
अपरज्ञः परां वुद्धिं स्पृष्ट्वा मोहाद्विमुच्यते ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
अपरन्ध्राश्च शूद्राश्च पह्लवाश्चर्मखण्डिकाः |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
अपरश्चापि दुर्धर्षः शिष्यस्ते सव्यसाचिना |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
अपरस्मिन्कथाय़ोगे भूय़ः श्रोष्यसि भारत ||
१११ ग
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
अपरस्मिन्नथोद्देशे कर्णं शस्त्रभृतां वरम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
अपरा कुरुते कर्म मानुषं लोकमाश्रिता |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
अपरा पश्यति जगत्कुर्वाणं साध्वसाधुनी ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
अपरां दिशमास्थाय़ द्योतमाने दिवाकरे ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
अपरां दिशमास्थाय़ स्थिते सवितरि प्रभो ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
अपरांश्चिक्षिपुर्वेगात्प्रगृह्यातिवलास्तथा ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
अपराजित इत्येव स वभूव नराधिपः ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
अपराजितः पण्डितको विशालाक्षः सुदुर्जय़ः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०८
वैशम्पाय़न उवाच
अपराजितः पण्डितको विशालाक्षो दुरावरः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अपराजितः सर्वसहो निय़न्ता निय़मो यमः ||
१०५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
अपराजितस्य सुनसं तव पुत्रस्य संय़ुगे |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
३१
सूत उवाच
अपराजितो ज्योतिकश्च पन्नगः श्रीवहस्तथा |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
अपराजितो निषादश्च श्रेणिमान्वसुमानपि ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
अपराजितो महाराज पराजिष्णुर्महारथः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११७
नारद उवाच
अपराण्यपि चत्वारि शतानि द्विजसत्तम |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
अपराद्धमिवात्मानं मन्यमाना महारथाः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
अपराद्धेषु सस्नेहा मृदवो मित्रवत्सलाः |
९३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
अपराधं समाचक्ष्व पुरुषस्य स्वभावतः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
अपराधमिमं विप्र क्षन्तुमर्हसि मेऽनघ ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय
४०
कृष्ण उवाच
अपराधशतं क्षाम्यं मय़ा ह्यस्य पितृष्वसः |
२२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
अपराधश्च ते नास्ति कन्याभावं गता ह्यसि |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
अपराधानुरूपं च दण्डं पापेषु पातय़ेत् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२८८
कुन्त्यु उवाच
अपराधे हि राजेन्द्र राज्ञामश्रेय़से द्विजाः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
अपराधैर्न तावन्तो भृत्याः शिष्टा नराधिपैः |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
अपराधो न चास्माकं यत्ते ह्यक्षपराजिताः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
अपराध्यति धर्मस्य प्रमादस्त्वपराध्यति ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
अपराध्यन्ति सततं ये युष्मान्पीडय़न्त्युत ||
३३ ग
वन पर्व
अध्याय
२८८
वैशम्पाय़न उवाच
अपराध्येत यत्किञ्चिन्न तत्कार्यं हृदि त्वय़ा ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
अपरान्तगिरिद्वारे कस्तं द्रोणादवारय़त् ||
४० ख
सभा पर्व
अध्याय
४७
दुर्योधन उवाच
अपरान्तसमुद्भूतांस्तथैव परशूञ्शितान् ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
अपरावर्तिनः शूराः सुवर्णविकृतध्वजाः |
७४ क