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भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
अपरावर्तिनः सर्वे सुवर्णविकृतध्वजाः ||
१७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
अपरास्तु यवीय़स्यस्ताभ्योऽन्याः सप्तविंशतिः |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय २०
धृतराष्ट्र उवाच
अपराह्णे कथं युद्धमभवल्लोमहर्षणम् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
अपराह्णे ततो राजन्प्रावर्तत महान्रणः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९८
जमदग्निरु उवाच
अपराह्णे निमेषार्धं तिष्ठसि त्वं दिवाकर |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
अपराह्णे पराह्णस्य सूतपुत्रस्य मारिष |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
अपराह्णे महाराज काङ्क्षन्त्योर्विपुलं जय़म् ||
७५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
अपराह्णे महाराज सङ्ग्रामः समपद्यत |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
अपराह्णे महाराज सङ्ग्रामः समपद्यत |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
अपराह्णे महाराज सङ्ग्रामस्तुमुलोऽभवत् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
अपराह्णे महाराज सङ्ग्रामे लोमहर्षणे |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अपराह्णे महाराज सूतपुत्रः प्रतापवान् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
अपरिग्रहवन्तश्च सततं चात्मचारिणः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
अपरिज्ञातपूर्वाश्च गणपूर्वाश्च भारत |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
अपरिज्ञातशौचाय़ां भूमौ निपतितं फलम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
युधिष्ठिर उवाच
अपरित्यज्य गार्हस्थ्यं कुरुराजर्षिसत्तम |
१ क
सभा पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
अपरिहार्या मेघानां मागधेय़ं मणेः कृते |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
अपरे ऋषय़ः सन्तो दीक्षादमसमन्विताः |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
अपरे कृष्यमाणाश्च विवेष्टन्तो महीतले |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
अपरे क्लिश्यमानास्तु व्रणार्ताः शरपीडिताः |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
अपरे क्षत्रिय़ाः शूराः कृतवैराः परस्परम् |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
अपरे क्षत्रिय़ाश्चापि नानाजनपदेश्वराः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
अपरे क्षीरिणो नाम वृक्षास्तत्र नराधिप ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
अपरे गरुडीमाहुस्त्वय़ानर्थोऽय़माहृतः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
उमो उवाच
अपरे च महाभोगा मन्दभोगास्तथापरे |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
अपरे चैनमालोक्य भय़ात्पञ्चत्वमागताः ||
५९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
अपरे जगृहुश्चैव केशवस्य महाभुजौ |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
अपरे जग्मुराकाशमपरेऽम्भः समाविशन् ||
५८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
अपरे तत्र तत्रैव परिधावन्ति मानिनः |
५३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
अपरे तुद्यमानास्तु वाजिनागरथा रणात् |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
अपरे त्रासिता नागा नाराचशततोमरैः |
१०४ क
आदि पर्व
अध्याय ३३
सूत उवाच
अपरे त्वव्रुवंस्तत्र ऋत्विजोऽस्य भवामहे |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
अपरे त्वव्रुवंस्तत्र क्षत्रिय़ा भृशविक्षताः ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय ३३
सूत उवाच
अपरे त्वव्रुवंस्तत्र जले प्रक्रीडितं नृपम् |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय ३३
सूत उवाच
अपरे त्वव्रुवंस्तत्र नागाः सुकृतकारिणः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय २४३
वैशम्पाय़न उवाच
अपरे त्वव्रुवंस्तत्र वातिकास्तं महीपतिम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ३३
सूत उवाच
अपरे त्वव्रुवन्नागाः समिद्धं जातवेदसम् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ३३
सूत उवाच
अपरे त्वव्रुवन्नागास्तत्र पण्डितमानिनः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
अपरे दन्तवेष्टेषु कुम्भेषु च कटेषु च |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
अपरे दशनैरोष्ठानदशन्क्रोधमूर्छिताः ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
अपरे दशनैरोष्ठानदशन्क्रोधमूर्छिताः ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय ९
सहदेव उवाच
अपरे दशसाहस्रा द्विस्तावन्तस्तथापरे |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
अपरे दानवा भग्ना रुद्रघातावपीडिताः |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
अपरे धनधान्यानि भोगांश्च पितृसञ्चितान् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
अपरे धनधान्यैश्च भोगैश्च पितृसञ्चितैः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
अपरे निष्टनन्तः स्म व्यदृश्यन्त महाद्विपाः |
१०५ क
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
अपरे निय़ताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १३०
भीष्म उवाच
अपरे नैवमिच्छन्ति ये शङ्खलिखितप्रिय़ाः |
१५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
अपरे पुनरालिङ्ग्य गदाः परिघवाहवः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
अपरे पुरुषव्याघ्राः सहस्राक्षौहिणीसमाः |
१७ क