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वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
न म्रिय़ेय़ुर्न जीर्येय़ुः सर्वे स्युः सार्वकामिकाः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
न म्लाय़न्ति स्रजस्तेषां दिव्यगन्धा मनोरमाः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
न म्लाय़न्ते स्रजश्चैव ते तरन्ति रणे रिपून् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७७
भगवानु उवाच
न मय़ा तद्गृहीतं च पापं तस्य चिकीर्षितम् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
न मय़ा तादृशो राजन्दृष्टपूर्वः पराक्रमः |
११६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
न मय़ा त्वं न पित्रासि जातः क्वाभ्यागतो ह्यसि |
५ क
विराट पर्व
अध्याय ६४
उत्तर उवाच
न मय़ा निर्जिता गावो न मय़ा निर्जिताः परे |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २९६
भीम उवाच
न मय़ा निहतस्तत्र तेन प्राप्ताः स्म संशय़म् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
इन्द्र उवाच
न मय़ा भगवँल्लोभाद्धृतं पुष्करमद्य वै |
४७ क
वन पर्व
अध्याय १३९
लोमश उवाच
न मय़ा व्रह्महत्येय़ं कृतेत्याह पुनः पुनः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
भीष्म उवाच
न मय़ा सदृशोऽस्तीह लोके स्थावरजङ्गमे |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
न मय़ा स्त्रीणां वचनादिदमकार्यं कार्यम् |
९० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
न मय़्येवाभिसन्धिस्ते जय़ैषिण्या जय़े कृतः |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
न यः परित्यज्य गृहान्वनमेति विमूढवत् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
न यः शल्यं घट्टय़ति नवं च कुरुते व्रणम् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
न यक्ष्यन्ति न होष्यन्ति हेतुवादविलोभिताः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
न यजन्ते महाराज शाश्वतं तेषु किल्विषम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
न यज्ञसेनस्य न मातुलानां; गृहेषु वाला रतिमाप्नुवन्ति ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
न यज्ञांस्तन्वते विप्रा यदा पापो न वार्यते ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
न यज्ञाः सम्प्रवर्तेरन्विधिवत्स्वाप्तदक्षिणाः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
न यज्ञाध्ययने दानं निय़मास्तारय़न्ति हि |
६१ क
स्त्री पर्व
अध्याय २
विदुर उवाच
न यज्ञैर्दक्षिणावद्भिर्न तपोभिर्न विद्यया |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
न यज्ञैर्विविधैर्विप्र यथान्याय़ेन सञ्चितैः ||
७६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
न यत्नसाध्यं तद्व्रह्म नादिमध्यं न चान्तवत् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
न यमो नान्तकः क्रुद्धो न मृत्युर्भीमविक्रमः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
न यस्य कूटकपटं न माय़ा न च मत्सरः |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
न यस्य जीविताकाङ्क्षी विषय़ं प्राप्य जीवति ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
न यस्य मातापितरौ नानुग्राह्योऽस्ति कश्चन |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७८
राजो उवाच
न याचन्ते प्रय़च्छन्ति सत्यधर्मविशारदाः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
युधिष्ठिर उवाच
न याति च स तेजस्वी मध्येन नभसः कथम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११६
नारद उवाच
न याति नरकं घोरं यत्र गच्छन्त्यनात्मजाः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
वृहस्पतिरु उवाच
न याति नरकं घोरं संसारांश्च न सेवते |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४८
नागभार्यो उवाच
न याति निरय़ं कश्चिदिति धर्मविदो विदुः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
न यावदेव पच्यते महाजनस्य यावकम् |
४८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
न युक्तं तादृशं दातुं त्वय़ा पुरुषसत्तम |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
न युक्तं तु मृषा वाणी त्वय़ा वक्तुमरिन्दम |
५७ क
वन पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
न युक्तं भवता त्यक्तुं सङ्ग्रामं दारुकात्मज |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
न युक्तं भवता वय़मनृतेनोपचरितुम् |
१११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
न युक्तं भवतास्मासु प्रतिपत्तुमसाम्प्रतम् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय २०३
नारद उवाच
न युक्तं यत्र वा दृष्टिर्न सज्जति निरीक्षताम् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
न युक्तमवमानोऽय़ं कर्तुं राज्ञा त्वय़ानघ ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १२६
लोमश उवाच
न युक्तमिति तं प्राह भगवान्भार्गवस्तदा |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
न युक्तमेतत्समरे त्वय़ि तिष्ठति भारत ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
न युक्तानि मय़ा वाय़ो तानि वक्तुं त्वय़ि प्रभो ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
न युज्यते कर्म युष्मासु हीनं; सत्त्वं हि वस्तादृशं भीमसेनाः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
न युद्धं रोचय़े कृष्ण हन्ति भीष्मो हि नः सदा ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
न युद्धधर्माच्छ्रेय़ान्वै पन्था राजेन्द्र विद्यते |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
न युद्धधर्माच्छ्रेय़ान्वै पन्थाः स्वर्गस्य कौरवाः |
६१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
न युद्धे तात कल्याणं न धर्मार्थौ कुतः सुखम् |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
न युध्यति रणे पार्थं हितकामः सदा मम ||
३६ ख