chevron_left  अपश्यदग्निवल्लोकांस्तापय़न्तंarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय २०७
मार्कण्डेय़ उवाच
अपश्यदग्निवल्लोकांस्तापय़न्तं महामुनिम् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
अपश्यदजितः सङ्ख्ये मुनिं प्रतिमुखागतम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यदन्तरिक्षस्थानृषीन्परपुरञ्जय़ः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अपश्यदपरं घोरमात्मनः शत्रुमागतम् ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
अपश्यदव्रवीच्चैनं सत्वरं पाकशासनः |
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ५१
वृहदश्व उवाच
अपश्यदात्मनः कार्यं दमय़न्त्याः स्वय़ंवरम् ||
७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यदेताञ्शस्त्रौघैर्वहुधा परिविक्षतान् ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यद्गाण्डिवं तत्र चतुर्भिरपरैः सह ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
अपश्यद्दीव्यमानान्वै लोभहर्षान्वितांस्तथा ||
२५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यद्दुःखितां देवीं मातरं सव्यसाचिनः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ||
१३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
अपश्यद्द्रौपदीपुत्रानवशिष्टांश्च सोमकान् ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
अपश्यद्भगवान्विष्णुः क्षिप्तं सासुरराक्षसम् |
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यद्भुजगः कश्चित्ते तत्र मणिकुण्डले ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यद्वै दिवं यान्तं जैगीषव्यं स देवलः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
अपश्यन्त तपस्यन्तमत्रिं विप्रं महावने ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११९
नारद उवाच
अपश्यन्त निरालम्वं यय़ातिं तं परिच्युतम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७९
भीष्म उवाच
अपश्यन्त रणं दिव्यं देवाः सर्षिगणास्तदा ||
१९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
अपश्यन्त वनं घोरं नानाद्रुमलताकुलम् ||
१७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यन्त हतांस्तत्र पुत्रान्भ्रातॄन्पितॄन्पतीन् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १०५
लोमश उवाच
अपश्यन्त हय़ं तत्र विचरन्तं महीतले ||
२४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यन्तः स्वपितरौ कथमूषुर्महावने ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २९५
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यन्तो मृगं श्रान्ता दुःखं प्राप्ता मनस्विनः ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
अपश्यन्तो रथानीके दुर्योधनमरिन्दमम् |
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
अपश्यन्तोऽन्नविषय़ं भुञ्जते विघसाशिनः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३
युधिष्ठिर उवाच
अपश्यन्त्यः पितॄन्भ्रातॄन्पतीन्पुत्रांश्च योषितः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यन्त्याः प्रिय़ं पुत्रं यत्र दीर्यति मेऽद्य वै ||
२२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यन्त्यो परं तत्र नेदमस्येति दुःखिताः ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
अपश्यन्नस्मदीय़ाश्च ते च यौधिष्ठिराः स्थिताः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
अपश्यन्निहतं पुत्रं तेन वालेन भूतले ||
११ ख
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यन्नुद्धवं यान्तं तेजसावृत्य रोदसी ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
अपश्यन्पाण्डवास्तत्र धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यन्भ्रमरारावान्मञ्जरीभिर्विराजितान् ||
६० ख
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
अपश्यन्मज्जनगतः स्रोतसाभ्याशमागतम् ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यन्मत्स्यराजं च रथात्प्रस्कन्द्य कुण्डली ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
अपश्यन्मामुपेक्षन्तं कृष्णामेकां सभागताम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
अपश्यन्युधि भीष्मस्य कथमाशंससे जय़म् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
अपश्यन्रथिनो युद्धं विचित्रं चित्रय़ोधिनाम् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अपश्यन्सर्वभूतानि वैक्लव्यमगमं परम् ||
७९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
अपश्यन्सात्यकिं चापि वृष्णीनां प्रवरं रथम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
अपश्यमानः स तु तां वहु तत्र विलप्य च |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
भीष्म उवाच
अपश्यमानः स द्वारं सर्वतःपिहितो मुनिः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यमानस्तमृषिं तय़ा चोक्तस्तथा नृपः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
अपश्यमानस्तु किरीटमाली; युधि ज्येष्ठं भ्रातरमाजमीढम् |
५७ क
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
अपश्यमाना राजानं पर्यवर्तन्त दंशिताः ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
अपश्यमाना राजानं वर्तमाने जनक्षय़े |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
अपश्यमानाः समरे दुर्योधनमवस्थितम् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्यमानो भीमं च धर्मराजो युधिष्ठिरः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
अपश्यमुदधिं भीममपाम्पतिमथाव्ययम् ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय १८
द्रौपद्यु उवाच
अपश्यमेनं श्रीमन्तं मत्स्यं भ्राजिष्णुमुत्तमम् |
३३ क