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वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
अपश्यल्लोहितोदं च भगवान्वरुणालय़म् ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
अग्निरु उवाच
अपश्यस्त्वं तं तदा घोररूपं; सर्वे त्वन्ये ददृशुर्दर्शनीय़म् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
अपश्याम दिवं स्तव्ध्वा गच्छन्तं तं महाद्युतिम् ||
५७ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
अपश्याम महाराज तदद्भुतमिवाभवत् ||
७४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
अपश्याम महाराज ध्वजं गाण्डिवधन्वनः ||
३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
अपश्याम महाराज भीष्मं चन्द्रमिवोदितम् ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
अपश्याम महाराज भीष्मास्त्रेण प्रमोहितान् ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
अपश्याम महाराज मेघजालमिवोद्गतम् ||
६१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
अपश्याम महाराज रौद्रां विशसनीं गदाम् ||
५७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
अपश्याम महाराज वध्यमानान्निशाचरैः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
अपश्याम महाराज ह्रिय़माणान्रणाजिरे ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
अपश्याम यथा पूर्वं शक्रस्यासुरसङ्क्षय़े ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
अपश्याम रणे तत्र भ्राम्यमाणान्हय़ोत्तमान् ||
१०८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
अपश्याम रणे तस्मिन्गिरीन्वज्रहतानिव ||
४६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
अपश्याम रणे द्रौणिं व्यात्ताननमिवान्तकम् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
अपश्याम रणे राजन्भीमसेनं महावलम् |
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
अपश्याम रथान्राजञ्शतशोऽथ सहस्रशः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २२६
वैशम्पाय़न उवाच
अपश्याम श्रिय़ं राजन्नचिरं शोककर्शिताः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
अपश्याम हतान्नागान्निष्टनन्तस्तथापरे ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
अपश्येतां महात्मानौ विष्वक्सेनधनञ्जय़ौ ||
१५४ ग
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
अपश्येतां मुहूर्ताच्च कवन्धं घोरदर्शनम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १२९
लोमश उवाच
अपसर्पणं महीपाल रौप्याय़ाममितौजसः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
अपसव्यं कृतः सङ्ख्ये भ्रातृव्येनात्यमर्षिणा |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
अपसव्यं ग्रहाश्चक्रुरलक्ष्माणं निशाकरम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
अपसव्यं चकाराथ माद्रीपुत्रस्तवात्मजम् |
४८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
अपसव्यं ततश्चक्रे द्रौणिस्तत्र वृकोदरम् |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
अपसव्यं तदा चक्रुः सेनां ते वहुशो नृप ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
अपसव्यं तदा चक्रुर्वेदय़न्तो महद्भय़म् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
सञ्जय़ उवाच
अपसव्यं मृगाश्चैव पाण्डुपुत्रान्प्रचक्रिरे ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
अपसव्यमकुर्वन्त धृतराष्ट्रमुखा नृपाः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
अपसव्या मृगाः सर्वे धार्तराष्ट्रस्य केशव |
१६ क
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
अपसव्यां चितिं कृत्वा पुरस्कृत्य कृपीं तदा ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
अपसव्यांस्तु तांश्चक्रे रथेन मधुसूदनः |
२५ क
मौसल पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
अपसव्यानि शकुना मण्डलानि प्रचक्रिरे ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
अपसव्यानि सर्वाणि मृगपक्षिरुतानि च ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
अपसृत्य ह्रदं घोरं विवेश रिपुजाद्भय़ात् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
अपसृत्याप्रतिश्रुत्य प्रजासंहरणं तदा |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
अपस्करैरधिष्ठानैरीषादण्डकवन्धुरैः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
अपस्करैरधिष्ठानैरीषादण्डकवन्धुरैः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
अपस्करोऽथ गमनं तथोपास्या च वर्णिता ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
अपस्त्र्यहं पिवेदुष्णास्त्र्यहमुष्णं पय़ः पिवेत् |
७१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
सनत्सुजात उवाच
अपस्मारः सातिवादस्तथा सम्भावनात्मनि |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
अपस्मारिकुले जातां निहीनां चैव वर्जय़ेत् |
१२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
अपस्मारी च यश्चान्धो राजन्नार्हन्ति सत्कृतिम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
अपहत्य तमस्तीव्रं यथा भात्युदय़े रविः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
अपहन्यात्क्षुधं यस्तु न तेन पुरुषः समः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
अपहस्तेन चिच्छेद शैनेय़स्त्वरय़ान्वितः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय ७४
वृहदश्व उवाच
अपहाय़ तु को गच्छेत्पुण्यश्लोकमृते नलम् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १३
सूत उवाच
अपहृत्य गुरुं भारं पितृणां संशितव्रतः |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७३
व्रह्मो उवाच
अपहृत्य तु यो गां वै व्राह्मणाय़ प्रय़च्छति |
६ क