आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
अपहृत्यात्मनो भारं विशश्रामेव सात्वतः ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
अपां कुञ्जे सरस्वत्यास्तं प्रसादय़ पार्थिव ||
१९ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
अपां कुम्भैः सुपूर्णैश्च विन्यस्तैः सर्वतोदिशम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
अपां गर्भो महाभागः सहपुत्रो महाद्भुतः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
अपां गुणांस्तथा पार्थ पार्थिवांश्च गुणानपि |
८९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
अपां च पतय़े नित्यं यज्ञानां पतय़े नमः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
अपां चैव गुणो राजन्रसो नाराय़णात्मकः |
७८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
अपां तु नीलिकां विद्यान्निर्मोकं भुजगेषु च ||
५० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
अपां धातुरसो नित्यं जिह्वय़ा स तु गृह्यते |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अपां निधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ||
४८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
अपां पतिं प्रचक्रुर्हि विधिदृष्टेन कर्मणा ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४६
जनमेजय़ उवाच
अपां पतिः कथं ह्यस्मिन्नभिषिक्तः सुरासुरैः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
अपां पतिर्वेगवानप्रमेय़ो; निमज्जय़िष्यन्निवहान्प्रजानाम् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
अपां फेनं समासाद्य विष्णुतेजोपवृंहितम् |
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
अपां फेनसवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
अपां फेनोपमं लोकं विष्णोर्माय़ाशतैर्वृतम् |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
अपां राज्ये सुराणां च विदधे वरुणं प्रभुम् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
अर्जुन उवाच
अपां वै सदृशं व्रूहि सूर्यस्य नभसोऽपि वा ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
अपां व्यतिक्रमे चापि वह्निरूपं प्रकाशते |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४७
भीष्म उवाच
अपां शैत्यं रसः क्लेदो द्रवत्वं स्नेहसौम्यता |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
अपां ह्रद उपस्पृश्य वाजपेय़फलं लभेत् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
अपां ह्रदं च पुण्याख्यं भृगुतुङ्गं च पर्वतम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१३२
लोमश उवाच
अपाकर्षद्गृह्य पाणौ रुदन्तं; नाय़ं तवाङ्कः पितुरित्युक्तवांश्च ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
श्रीरु उवाच
अपाकृता ततः शक्र त्वय़ि वत्स्यामि वासव |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैशम्पाय़न उवाच
अपाकृष्यन्त शैलाग्राद्धनाधिपतिशासनात् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
अपाक्रमेः सम्प्रदाय़ स्वमेभ्यो; मा गास्त्वं वै देवय़ानात्पथोऽद्य ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
अपाक्रमेतां युद्धार्तौ प्रेक्षमाणौ परस्परम् ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
अपाक्रामद्गदापाणिर्हतभूय़िष्ठसैनिकः ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
अपाक्रामद्धतरथो नातिदूरमरिन्दमः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
अपाक्रामद्रथोपस्थाद्विक्रमांस्त्रीन्नरर्षभः ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
अपाक्षिपद्वासुदेवं चेदिराजो महावलः ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
अपाङ्क्तेय़मिव त्यक्त्वा दाता पाङ्क्तेय़मर्थिनम् ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
अपाङ्क्तेय़ास्तु ये राजन्कीर्तय़िष्यामि ताञ्शृणु ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
अपाचकः सदा योगी स त्यागी पार्थ भिक्षुकः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
अपाचय़न्नात्मनोऽर्थे वृथामांसान्यभक्षय़न् ||
६२ ख
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
अपाजह्रुर्महावेगाः कुन्तीपुत्राद्धनञ्जय़ात् ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
अपाञ्चाल्यं क्रिय़ते याहि पार्थ; कर्णं जहीत्यव्रवीद्राजसिंह ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
अपाणित्वाद्वय़ं व्रह्मन्कण्टकान्नोद्धरामहे ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
अपाणिपादपृष्ठं तमशिरस्कमनूदरम् |
४५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
अपाण्डवाय़ेति मुने वह्नितेजोऽनुमन्त्र्य वै ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अपाण्डवाय़ेति रुषा द्रौणिरस्त्रमवासृजत् ||
१८५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
अपाण्डवाय़ेति रुषा व्यसृजद्दारुणं वचः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१००
भीष्म उवाच
अपाणय़ः पाणिमतामन्नं शूरस्य कातराः ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
अपात्रदाने ये दोषास्तान्मोहान्नाववुध्यसे ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
ईश्वर उवाच
अपात्रमसमर्थं च दहन्त्यस्त्राणि भार्गव ||
१३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
अपात्रे प्रतिपत्तिश्च पात्रे चाप्रतिपादनम् ||
५४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
अपातय़ं शरैर्दीप्तैः प्रहसन्पुरुषर्षभ ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
अपातय़च्च तद्भूतं निश्चेष्टो ह्यगमं महीम् ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
अपातय़त्कुण्डलिनं सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ||
२३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
अपातय़द्द्रोणसुतः संरव्धस्तिलकाण्डवत् ||
१०६ ख