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शल्य पर्व
अध्याय ३०
श्रीवासुदेव उवाच
जहि त्वं भरतश्रेष्ठ पापात्मानं सुय़ोधनम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
महेश्वर उवाच
जहि त्वं योगमास्थाय़ मावमंस्थाः सुरेश्वर ||
३५ ख
सभा पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
जहि त्वं सदृशेष्वेव मानं दर्पं च मागध |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
जहि दैत्यान्सह पुरैर्लोकांस्त्राय़स्व मानद ||
२६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
जहि पाण्डुसुतान्वीरान्महेन्द्र इव दानवान् ||
३६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
जहि पाण्डुसुतावेतौ धनञ्जय़वृकोदरौ ||
४६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
जहि पार्थान्सपाञ्चालान्राधेय़ विजय़ाय़ नः |
४० क
वन पर्व
अध्याय २७३
मार्कण्डेय़ उवाच
जहि भर्तारमेवास्या हते तस्मिन्हता भवेत् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
जहि भीमं यमौ चोभौ धर्मराजं च मातुल |
८७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
अम्वो उवाच
जहि भीष्मं महावाहो यथा वृत्रं पुरन्दरः ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
श्रीकृष्ण उवाच
जहि भीष्मं महावाहो शृणु चेदं वचो मम |
९४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७७
भीष्म उवाच
जहि भीष्मं रणे राम गर्जन्तमसुरं यथा ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७७
अम्वो उवाच
जहि भीष्मं रणे राम मम चेदिच्छसि प्रिय़म् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
जहि मातुल कौन्तेय़ानसुरानिव पावकिः ||
८८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
जहि मातुल कौन्तेय़ानसुरानिव पावकिः ||
६३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
जहि राजन्रथानीकमश्वाः सर्वे जिता मय़ा |
९ क
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
जहि रामममित्रघ्न सुग्रीवं च सलक्ष्मणम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४
शल्य उवाच
जहि रौद्रं महावाहो नहुषं पापनिश्चय़म् ||
१४ ग
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
जहि वृष्णिकुलश्रेष्ठ मा त्वां कालोऽत्यगात्पुनः ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
जहि शत्रुं महावाहो कामरूपं दुरासदम् ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
जहि शत्रुगणान्सर्वान्महेन्द्र इव दानवान् ||
२९ ग
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
जहि शत्रूनमित्रघ्न मम शस्त्रभृतां वर ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
जहि शत्रून्महावाहो परां निकृतिमास्थितः ||
५९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
जहि शत्रून्रणे राजन्स्वधर्ममनुपालय़ |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय ५
दुर्योधन उवाच
जहि शत्रून्रणे वीर महेन्द्रो दानवानिव ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
जहि शाल्वं महावाहो मैनं जीवय़ केशव |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
जहि शोकं महाप्राज्ञ शृणु चेदं वचो मम ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
जहि सौभं स्ववीर्येण ये चात्र रिपवो मम |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय २०
द्रौपद्यु उवाच
जहीममपि पापं त्वं योऽय़ं मामवमन्यते |
३१ क
वन पर्व
अध्याय ११६
अकृतव्रण उवाच
जहीमां मातरं पापां मा च पुत्र व्यथां कृथाः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २७४
मार्कण्डेय़ उवाच
जहीमान्राक्षसान्पापानात्मनः प्रतिरूपकान् |
११ क
स्त्री पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
जहीहि मन्युं वुद्ध्या वै धारय़ात्मानमात्मना ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
जहृषाते महावाहू सिंहौ केसरिणाविव ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय २७४
मातलिरु उवाच
जहृषुर्देवगन्धर्वा दृष्ट्वा शक्रपुरोगमाः ||
२५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
जहृषुर्मुदिताश्चासन्नन्यदेहगता अपि ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
जहृषुश्च सुराः सर्वे दृष्ट्वा शक्रं विनिःसृतम् |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
जहौ निद्रामथ तदा वेदकार्यार्थमुद्यतः |
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
जह्नोरजह्नुस्तनय़ो वल्लवस्तस्य चात्मजः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
जह्यर्जुनं कर्ण ततः सचीराः; पुनर्वनं यान्तु चिराय़ पार्थाः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
जह्यात्तं सत्त्ववान्वासं संमानितविमानितः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
जह्यात्स्वधर्मं न च मे गुरुर्यथा; द्वितीय़मेतं वरय़ामि ते वरम् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
जह्याद्रवस्व तिष्ठेति पश्य पश्येति वादिनः ||
१९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
जह्येनं त्वममित्रघ्न मा राजन्विचिकित्सिथाः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
वासुदेव उवाच
जह्येनं वै महावाहो यथा वृत्रं पुरन्दरः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
जागर्तव्ये स्वपन्तीमे हन्त जागर्म्यहं स्वय़म् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
जागर्ति कालः पूर्वं च मध्ये चान्ते च भारत |
५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
जागर्ति चेदभिवदेस्त्वं हि क्षत्तः; प्रविशेय़ं विदितो भूमिपस्य ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
जागर्ति निरृतिर्देवी ज्योतींषि निरृतेरपि |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
युधिष्ठिर उवाच
जागर्ति स कथं दण्डः प्रजास्ववहितात्मकः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
जागर्त्येव च दुष्टात्मा सङ्करेऽग्निरिवोत्थितः ||
११ ख