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आदि पर्व
अध्याय १६५
गन्धर्व उवाच
अपिवच्च सुतं सोममिन्द्रेण सह कौशिकः ||
४४ ग
वन पर्व
अध्याय २९६
वैशम्पाय़न उवाच
अपिवच्छीतलं तोय़ं पीत्वा च निपपात ह ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २९६
वैशम्पाय़न उवाच
अपिवच्छीतलं तोय़ं पीत्वा च निपपात ह ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
अपिवत्तेजसा वारि विष्टभ्य सुमहातपाः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३८
वाय़ुरु उवाच
अपिवत्तेजसा ह्यापः स्वय़मेवाङ्गिराः पुरा ||
३ ख
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
अपिवद्युय़ुधानश्च गदो वभ्रुस्तथैव च ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
अपिवन्सूतपुत्रस्य शोणितं रक्तभोजनाः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११२
नारद उवाच
अपीड्य राजा पौरान्हि यो नौ कुर्यात्कृतार्थिनौ ||
५ ग
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
अपीडय़त वाहुभ्यां कण्ठं तस्य वृकोदरः ||
६४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
अपीडय़त्क्षणेनैव द्रोणः पाण्डवसृञ्जय़ान् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
अपीडय़द्रणे राजञ्शूराश्चान्ये महारथाः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
भीष्म उवाच
अपीडय़न्भृत्यवर्गमित्येवमनुशुश्रुम |
३ क
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
अपीडय़न्मां सहिताः शरशूलासिवृष्टिभिः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
युधिष्ठिर उवाच
अपीडय़ा च भृत्यानां धर्मस्याहिंसय़ा तथा |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
अपीडय़ेतां समरे त्रिगर्तानां महद्वलम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय २९
सूत उवाच
अपीत्वैवामृतं पक्षी परिगृह्याशु वीर्यवान् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
अपीदानीं भवेदस्य क्षेममस्मिन्समागमे |
३३ क
वन पर्व
अध्याय ४६
धृतराष्ट्र उवाच
अपीदानीं मम सुतास्तिष्ठेरन्मन्दचेतसः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अपीदानीं शरीरेऽस्मिन्मामके मुनिसत्तम |
११७ क
वन पर्व
अध्याय २७८
राजो उवाच
अपीदानीं स तेजस्वी वुद्धिमान्वा नृपात्मजः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
अपीदानीं स धर्मात्मा इय़ान्मे दर्शनं रहः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
वैशम्पाय़न उवाच
अपीदानीं स भगवान्परमात्मा सनातनः |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
अपीदानीं सुय़ुद्धेन गच्छेय़ं सत्सलोकताम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अपीदानीमय़ं शत्रुः सङ्गत्या पण्डितो भवेत् ||
४६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
कर्ण उवाच
अपीन्द्रो वज्रमुद्यम्य किं नु मर्त्यः करिष्यति ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
अपीह स्यादपीह स्यात्सारासारदिदृक्षय़ा ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अपीय़ं वाहिनी कृत्स्ना मुच्येत महतो भय़ात् |
४६ क
विराट पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
अपुंस्त्वमप्यस्य निशम्य च स्थिरं; ततः कुमारीपुरमुत्ससर्ज तम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
अपुण्य एष भवतु देशस्त्यक्तस्त्वय़ा शुभे ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
अपुण्यपुण्योपरमे यं पुनर्भवनिर्भय़ाः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
अपुण्यशीलाश्च भवन्ति पुण्या; नरोत्तमाः पापकृतो भवन्ति |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय २०७
वैशम्पाय़न उवाच
अपुत्रः प्रसवेनार्थी तपस्तेपे स उत्तमम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
अपुत्रः स नरव्याघ्र पुत्रार्थं यज्ञमाहरत् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
अपुत्रः स महावाहुर्वनवासमुदावसत् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
अपुत्रतां त्रय़ः पुत्रा अवृत्तिं दश धेनवः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८९
भीष्म उवाच
अपुत्रस्य ततो राज्ञो द्रुपदस्य महीपतेः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८९
भीष्म उवाच
अपुत्रस्य तु राज्ञः सा द्रुपदस्य यशस्विनी |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
देवव्रत उवाच
अपुत्रस्यापि मे लोका भविष्यन्त्यक्षय़ा दिवि ||
८८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
अपुत्रा जननी तेऽद्य कौसल्या चापतिस्त्वय़ा ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
अपुत्रा पुरुषव्याघ्र विललापेति नः श्रुतम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
अपुत्रो लभते पुत्रं कन्या चैवेप्सितं पतिम् |
१०५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
अपुत्रय़ा मय़ा राजन्सपत्नीनां भय़ादिदम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
अपुनर्दर्शनं मार्गमिषुभिः क्षेप्स्यतेऽर्जुनः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
अपुनर्भावसंय़ुक्तस्ततः कूर्मः प्रजाय़ते ||
८५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
अपुनर्मारकामानां या गतिः सोऽय़मीश्वरः ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
अपुनर्मारकामानां वैराग्ये वर्ततां परे |
६३ क
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
अपुमांसः कृताः स्त्रीभिर्जडान्धवधिरास्तथा ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
अपुमांसोऽङ्गहीनाश्च स्थूलजिह्वा विचेतसः ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
अपुष्पादफलाद्वृक्षाद्यथा तात पतत्रिणः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४६
भीष्म उवाच
अपूजिताश्च यत्रैताः सर्वास्तत्राफलाः क्रिय़ाः |
५ ख