शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
शम्यापातेनाभ्यतीय़ाद्वेदीभिश्चित्रय़न्नृप |
८८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
शम्वरश्च वलश्चैव तथोभौ घोरविक्रमौ ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३९
युधिष्ठिर उवाच
शम्वरस्य च या माय़ा या माय़ा नमुचेरपि |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
शम्वरस्य वधे चापि सङ्ग्रामः सुमहानभूत् |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
शम्वरस्य शिरो यद्वन्निहतस्य महारणे |
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
शम्वरे निहते पूर्वं रौक्मिणेय़ेन धीमता |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
शम्वरो नमुचिश्चैव पुलोमा चेति विश्रुतः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
शम्वरो विप्रचित्तिश्च प्रह्रादो नमुचिर्वलिः ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
शमय़न्तु शिलाधौतास्त्वय़ास्ता जीवितच्छिदः ||
८१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
शमय़न्सर्वतः पापान्स्वकर्मसु च योजय़न् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
शमय़ामास सङ्क्रुद्धं श्रूय़तां येन हेतुना ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
शमय़ित्वा पशूनन्यान्विधिवद्द्विजसत्तमाः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
भीष्म उवाच
शमय़िष्यति श्रुत्वा ते जहृषुः सुरसत्तमाः ||
१४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
शमय़ेच्चिररात्राय़ योगक्षेमवदव्ययम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
शमय़ैनं महाप्राज्ञ कामक्रोधसमेधितम् ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
शरं कालाग्निसंय़ुक्तं विष्णुसोमसमाय़ुतम् ||
५८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
शरं चैव महाघोरं कालदण्डमिवापरम् |
३० क
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्याध उवाच
शरं चोद्धृतवानस्मि तस्य वै द्विजसत्तम |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
शरं परमदुर्वारं प्रेषय़ामास संय़ुगे |
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
शरकण्टकितास्ते तु तावका भरतर्षभ |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२३६
वैशम्पाय़न उवाच
शरक्षताङ्गश्च भृशं व्यपय़ातोऽभिपीडितः |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
शरगाढे कृते व्योम्नि छाय़ाभूते समन्ततः ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
शरचापधरः पार्थः प्रज्वलन्निव भारत |
६० क
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
शरचापप्लवां घोरां मांसशोणितकर्दमाम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
शरचापेन्धनो द्रोणः क्षत्रं दहति तेजसा ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
शरजालं ततस्तत्तु शरजालेन कौरव |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
शरजालसहस्रांशुः शरदीव दिवाकरः ||
२६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
शरजालावृतं व्योम चक्रतुस्तौ महारथौ |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
शरजालावृतं व्योम चक्राते शरवृष्टिभिः ||
३२ ख
विराट पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
शरजालेन महता वर्षमाणमिवाम्वुदम् ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
शरजालेन महता विद्ध्वा केशवपाण्डवौ |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
शरजालेन स वभौ व्यभ्रः पर्वतराडिव ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
शरजालैः समाकीर्णे मेघजालैरिवाम्वरे |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
शरजालैरविच्छिन्नैस्तमः सूर्य इवांशुभिः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
शरजालैश्च विविधैश्छादय़ामासतुर्मृधे |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
शरणं च जगामाद्यं वरेण्यं वरदं हरिम् ||
६१ ग
वन पर्व
अध्याय
२३२
युधिष्ठिर उवाच
शरणं च प्रपन्नानां त्राणार्थं च कुलस्य नः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
२०९
वर्गो उवाच
शरणं च प्रपन्नानां शिष्टाः कुर्वन्ति पालनम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
२०६
उलूप्यु उवाच
शरणं च प्रपन्नास्मि त्वामद्य पुरुषोत्तम ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
शरणं चाप्यविन्दद्भिस्तत्सदः सङ्कुलं वभौ ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
शरणं त्वां प्रपन्नाः स्म गतिर्भव महेश्वर ||
६० ख
आदि पर्व
अध्याय
२०९
वर्गो उवाच
शरणं त्वां प्रपन्नाः स्म तस्मात्त्वं क्षन्तुमर्हसि ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
शरणं त्वां प्रपन्नास्मि सारथे कुरु मद्वचः |
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि न विघ्नं कर्तुमर्हसि ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
अग्निरु उवाच
शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि स्वस्ति तेऽस्तु महाद्युते ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
शरणं त्वां महाराज प्रपन्नौ स्व उभावपि |
१११ क
आदि पर्व
अध्याय
२१७
वैशम्पाय़न उवाच
शरणं देवराजानं सहस्राक्षं पुरन्दरम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३१
वैशम्पाय़न उवाच
शरणं पाण्डवाञ्जग्मुर्ह्रिय़माणे महीपतौ ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
युधिष्ठिर उवाच
शरणं पालय़ानस्य यो धर्मस्तं वदस्व मे ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
शरणं प्रति देवानां प्राप्तकालममन्यत ||
१५ ख