उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
अप्यस्मिन्नाश्रय़न्ते च जुगुप्सन्ति च तादृशम् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
अप्यस्य दारानिच्छन्ति परिभूय़ क्षमावतः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
शुक्र उवाच
अप्यस्य पापस्य भवेदिहान्तः; कं व्रह्महत्या न दहेदपीन्द्रम् ||
३९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
अप्यस्य युधि विक्रम्य छिन्द्यां मूर्धानमाहवे ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
अप्यस्यां गुणवान्पुत्र राजपुत्रो भविष्यति ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
अप्यस्याः सफलो राजन्वनवासो भविष्यति ||
११ ग
वन पर्व
अध्याय
२४८
वैशम्पाय़न उवाच
अप्यहं कृतकामः स्यामिमां प्राप्य वरस्त्रिय़म् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
अप्यहं शस्त्रमादाय़ हन्यामात्मानमात्मना |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
अप्यात्मनः प्रदानेन न ते कार्या विचारणा ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
अप्यादधीत दारूणि तत्र दह्येत पापकृत् ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
अप्याहुः सर्वमेवेति भूय़ोऽर्धमिति निश्चय़ः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
अप्याहुः सर्वमेवेति भूय़ोऽर्धमिति निश्चय़ः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७२
भीमसेन उवाच
अप्युदासीनवृत्तिः स्याद्यथा नः कुरुभिः सह |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
अप्युन्मत्तात्प्रलपतो वालाच्च परिसर्पतः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
अप्येकं भोजय़ेद्विप्रं पुष्करारण्यमाश्रितः |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
अप्येकां वा साधवे व्राह्मणाय़; सास्यामुष्मिन्पुण्यतीर्था नदी वै ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
अप्येकां वाचमुत्सृज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
१७६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
श्रीरु उवाच
अप्येकाङ्गे तु वो वस्तुमिच्छामि च सुकुत्सिते |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
अप्येनं नरमांसेन भोजय़ेति पुनः पुनः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
अप्येवं नो व्राह्मणाः सन्ति वृद्धा; वहुश्रुताः शीलवन्तः कुलीनाः |
९२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
अर्जुन उवाच
अप्येवं पाण्डव प्राणानुत्सृजेय़महं युधि |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
अप्येवाहं निराहारा जीवितप्रिय़वर्जिता |
५० क
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
अप्येष शत्रोः शरणागतस्य; दद्यात्प्राणान्धर्मचारी नृवीरः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रकाशा दिशः सर्वा वातैरासन्ननार्तवैः ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रकाशान्यप्रिय़ाणि चकारास्य वृकोदरः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
अप्रकीर्णेन्द्रिय़ं दान्तं शुचिं नित्यमतन्द्रितम् |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
अप्रकीर्णेन्द्रिय़ं प्राज्ञमत्यन्तानुगतं शुचिम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
अप्रख्यमप्रकाशं च जगामाशु तमस्तथा ||
४६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
अप्रख्यातिं गतानां तु राज्ञां शतसहस्रशः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
अप्रख्यातिमिय़ां राजन्सध्वजः पर्वतैश्चितः ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रगल्भं वचस्तस्य तस्माद्वार्हद्रथे स्मृतम् ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
अप्रगल्भां प्रगल्भः स तामुवाच यशस्विनीम् ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१११
पाण्डुरु उवाच
अप्रजस्य महाभागा न द्वारं परिचक्षते |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रजा धारय़ामास ततस्तां दुःखमाविशत् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
अप्रजाय़न्नधर्मेण भवत्याधर्मिको जनः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रज्ञानं तमोभूतं प्रज्ञानं तु प्रकाशता ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रज्ञावानहं देव विधत्स्व यदनन्तरम् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
अप्रज्ञो वा पाण्डव युध्यमानो; अधर्मज्ञो वा भूतिपथाद्व्यपैति |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रणम्यैव शत्रूणां न नस्तप्स्यति माधव ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३९
व्यास उवाच
अप्रतर्क्यमविज्ञेय़ं तमस्तदुपधार्यताम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
अप्रतर्क्यमविज्ञेय़ं तमस्तदुपधारय़ेत् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
अप्रतर्क्यमविज्ञेय़ं तमस्तदुपधारय़ेत् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
अप्रतर्क्यमविज्ञेय़ं व्रह्माग्रे समवर्तत ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
युधिष्ठिर उवाच
अप्रतिग्राहके किं च फलं लोके पितामह |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
ऋषय़ ऊचुः
अप्रतिग्राह्यमेवैतत्प्रेत्य चेह सुखेप्सुना ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
अप्रतिद्वन्द्वतां युद्धे दीर्घमाय़ुश्च भारत |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वासुदेव उवाच
अप्रतिव्रुवतः कष्टो दोषो हि भवति प्रभो ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
अप्रतिष्ठं स नरकं याति नास्त्यत्र संशय़ः ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
अप्रतिष्ठाश्च ये केचिदधर्मशरणाश्च ये |
४४ क