वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
अप्रतिष्ठे तमस्येतज्जगन्मज्जेदनिन्दिते ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
अर्जुन उवाच
अप्रतिष्ठो महावाहो विमूढो व्रह्मणः पथि ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४७
भीष्म उवाच
अप्रतीघातता चैव भूतत्वं विकृतानि च |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
अप्रत्यक्षं वहुद्वारं धर्ममाश्रमवासिनाम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
अप्रत्ययं कुतो ह्यस्य पुनरद्येह जीवितम् ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
अप्रत्ययकृतां गर्ह्यामर्थापनय़दूषिताम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२७७
राजो उवाच
अप्रदाता पिता वाच्यो वाच्यश्चानुपय़न्पतिः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१३१
राजो उवाच
अप्रदाने परोऽधर्मः किं त्वं श्येन प्रपश्यसि ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रदानेन राज्यस्य यदि कृष्ण सुय़ोधनः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
अप्रदानेन राज्यस्य शान्तिमस्मासु मार्गति |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रदाय़ द्विजातिभ्यो मात्सर्याविष्टचेतसः |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
अप्रधृष्यं महाय़ुद्धे देवैरपि सवासवैः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रधृष्यतमं घोरं गुप्तं वीरैर्महारथैः ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
अप्रधृष्यतरं चैव महोरगसमाकुलम् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
अप्रधृष्यमजेय़ं च देवदानवराक्षसैः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
अप्रधृष्यमनावार्यं सर्वशस्त्रभृतां वरम् |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९४
सञ्जय़ उवाच
अप्रधृष्यमनावार्यमुद्वृत्तमिव सागरम् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
अप्रधृष्यश्च शत्रूणां भृत्यानां स्वजनस्य च |
१३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८२
पराशर उवाच
अप्रनष्टे ततो धर्मे भवन्ति सुखिताः प्रजाः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
अप्रभुत्वे स्थितौ वृद्धावन्नं प्रार्थय़तः सुतान् ||
७२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
अप्रभूतश्रुतो मूढो धर्माणामविभागवित् ||
४६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
अप्रमत्तः प्रमत्तेषु कालो जागर्ति देहिषु |
९५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
अप्रमत्तः प्रमत्तो वा किं विशेषं करिष्यति ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
अप्रमत्तः सदा दक्षः सत्यवादी जितेन्द्रिय़ः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
अप्रमत्तः स्थितो धर्मे गुरुशुश्रूषणे रतः ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रमत्तः स्थितो नित्यं प्रजाः पाहि विशां पते |
५८ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
अप्रमत्तश्च यत्तश्च हितं कुर्यात्प्रिय़ं च यत् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
अप्रमत्तस्य देवस्य न चापश्यदनिन्दिता ||
५० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
अप्रमत्ता च भर्तारं कदाचिन्नाहमव्रुवम् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रमत्ता प्रतीक्षैनं निशीथे आगमिष्यति ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
अप्रमत्ता महाराज मामेव प्रत्युपस्थिताः |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
अप्रमत्ता सदाय़ुक्ता श्वश्रूश्वशुरवर्तिनी ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
अप्रमत्ताः क्रिय़ावन्तः सुव्रताः सत्यवादिनः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
अप्रमत्ताः शठाः क्रूरा विक्रान्ताः पर्युपासते ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
अप्रमत्तास्ततः स्वर्गं प्राप्ताः पुण्यैः स्वकर्मभिः ||
१९ ग
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
अप्रमत्तेन तत्कार्यमुपदेष्टा पराक्रमः |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
अप्रमत्तेन ते भाव्यं सदा प्रति पुरन्दरम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
श्रीरु उवाच
अप्रमत्तेन धार्यास्मि तपसा विक्रमेण च ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
अप्रमत्तेषु जाग्रत्सु नित्ययुक्तेषु शत्रुषु |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
अप्रमत्तो नेतुमर्हसीति ||
११९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
अप्रमत्तो भवेद्राजा छिद्रदर्शी परात्मनोः |
५१ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
अप्रमत्तो भवेद्राज्ञः प्रिय़ेषु च हितेषु च ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
अप्रमत्तो यथा धन्वी लक्ष्यं हन्ति समाहितः |
३१ क
सभा पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
अप्रमत्तो विनीतात्मा नित्यं भद्राणि पश्यति ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
७२
कच उवाच
अप्रमत्तोत्थिता नित्यमाराधय़ गुरुं मम ||
१५ ग
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रमत्तोत्थिताः क्षान्ताः प्रतपन्तोऽहितांस्तदा ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
अप्रमत्तोत्थितो नित्यं चातुर्वर्ण्यस्य रक्षणे |
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
अप्रमाणं प्रसूतिर्मे शीलतः क्रिय़ते कुलम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
अप्रमादः सदा कार्यो नगरे यादवर्षभाः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२५
शल्य उवाच
अप्रमादप्रय़ोगाच्च ज्ञानविद्याचिकित्सितैः ||
१० ख