वन पर्व
अध्याय
२८०
द्युमत्सेन उवाच
अप्रमादश्च कर्तव्यः पुत्रि सत्यवतः पथि ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
अप्रमादश्च वः कार्यो व्रह्म हि प्रचुरच्छलम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
अप्रमादश्च शौचं च तात भूतिकरं महत् |
५० क
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्राह्मण उवाच
अप्रमादस्तु कर्तव्यो धर्मे धर्मभृतां वर ||
२८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रमादस्त्वय़ा कार्यः सर्वथा कुरुनन्दन |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
अप्रमादाद्भय़ं जह्याल्लोभं प्राज्ञोपसेवनात् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६६
भीष्म उवाच
अप्रमादाद्भय़ं रक्षेच्छ्वासं क्षेत्रज्ञशीलनात् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
अप्रमादेन शिक्षेथाः क्षमां वुद्धिं धृतिं मतिम् |
४२ क
सभा पर्व
अध्याय
४४
दुर्योधन उवाच
अप्रमादेन सुहृदामन्येषां च महात्मनाम् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
अप्रमादोऽविहिंसा च ज्ञानय़ोनिरसंशय़म् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
अप्रमादोऽष्टदोषः स्यात्तान्दोषान्परिवर्जय़ेत् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
अप्रमेय़ं प्रणमन्तौ गत्वा सर्वात्मना भवम् ||
७१ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रमेय़ं महावाहुं कामाज्जातमजं नृषु |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
अप्रमेय़प्रभां दिव्यां मानसीं भरतर्षभ |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
अप्रमेय़प्रभावं तं देवदेवमुमापतिम् |
७१ क
आदि पर्व
अध्याय
१९
सूत उवाच
अप्रमेय़मचिन्त्यं च सुपुण्यजलमद्भुतम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रमेय़मनाधृष्यं मैनाकमिव पर्वतम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
अप्रमेय़मनाधृष्यं सर्वलोकेषु भारत ||
५ ग
आदि पर्व
अध्याय
१५
सूत उवाच
अप्रमेय़मनाधृष्यमधर्मवहुलैर्जनैः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
अप्रमेय़मवाप्नोति दानं जप्यं च भारत ||
६५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
कृप उवाच
अप्रमेय़वलः शौरिर्येषामर्थे च दंशितः |
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
नीलकण्ठ उवाच
अप्रमेय़वलात्मा त्वं नाराय़ण भविष्यसि ||
७४ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रमेय़वलोत्साहो वीर्यवानमितद्युतिः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रमेय़शरीराय़ सर्वतोऽनन्तचक्षुषे |
५० क
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
अप्रमेय़ा यथोत्पन्नाः श्रीमन्तस्तिमिरापहाः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
अप्रमेय़ाणि दुर्धर्षे कथं स निहतो युधि ||
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
अप्रमेय़े हृषीकेशे युद्धकाले व्यमुह्यत ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अप्रमेय़ो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
अप्रमेय़ोऽप्रधृष्यश्च युद्धेष्वप्रतिमस्तथा ||
२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
अप्रवक्तारमाचार्यमनधीय़ानमृत्विजम् ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
अप्रवक्तारमाचार्यमनधीय़ानमृत्विजम् ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
अप्रवुद्धमथाव्यक्तं सगुणं प्राहुरीश्वरम् |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
अप्रवुद्धमथाव्यक्तमिमं गुणविधिं शृणु |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
अप्रवृत्तं सुदुर्वुद्धे यस्मादेतत्कृतं त्वय़ा |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
अप्रवृत्तास्तु ये लुव्धा नास्तिका दानवर्जिताः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
अप्रवृत्तिः प्रवृत्तिश्च द्वैविध्यं लोकवेदय़ोः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
अप्रवृत्तेरमर्त्यत्वं मर्त्यत्वं कर्मणः फलम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
अप्रव्रज्ये योजय़ित्वा पुरस्ता; दात्माधीनं यद्वलं ते तदासीत् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
अप्रशस्तानि कर्माणि यो मोहादनुतिष्ठति |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
अप्रशस्यस्तदूर्ध्वं स्यादनादेय़श्च संसदि ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
अप्रशान्त प्रशाम्य त्वमप्राज्ञ प्राज्ञवच्चर ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रशान्तमना भीम सधूम इव पावकः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रसन्ना दिशः सर्वाः पवनश्चाशिवो ववौ |
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
अप्रसादः प्रसादश्च हर्षः क्रोधः शमो दमः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
अप्रसाद्य विरूपाक्षं वरदं स्थाणुमव्ययम् |
८३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
अप्रसूते च दुष्प्रेक्ष्ये न युद्धं रोचते मम ||
७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
अप्रहर्षमनानन्दमशोकं विगतक्लमम् ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रहृष्टेन मनसा राजसूय़े महाक्रतौ |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
अप्राज्ञमधिकं पापं श्लिष्यते जतु काष्ठवत् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
अप्राज्ञो न तरत्येव यो ह्यास्ते न स गच्छति ||
१९ ख