chevron_left  अप्राप्तकालंarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
अप्राप्तकालं वचनं वृहस्पतिरपि व्रुवन् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
अप्राप्तदमकाश्चैव नासानां वेधकास्तथा |
७७ क
द्रोण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
अप्राप्तमेव चिच्छेद भगदत्तस्य वीर्यवान् ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
अप्राप्तलक्षणं कृष्णमर्घ्येणार्चितवानसि ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
अप्राप्तवति तस्मिंश्च यौवनं भरतर्षभ |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
अप्राप्तव्यवहारा वा तव कर्मस्वनुष्ठिताः ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
अप्राप्तस्याभिमर्शं तु कुर्वन्तो मनुजास्ततः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
अप्राप्तांश्चैव तानाशु भीष्मः सर्वांस्तदाच्छिनत् ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
अप्राप्तांश्चैव तान्पार्थश्चिच्छेद कृतहस्तवत् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
अप्राप्तानस्त्रमाय़ाभिरग्रसत्सात्यकिः प्रभो ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
अप्राप्तानेव तान्वाणांश्चिच्छेद तनय़स्तव |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
अप्राप्तामेव तां शक्तिं त्रिधा चिच्छेद कौरवः |
५२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
अप्राप्तामेव तां शक्तिं पिता देवव्रतस्तव |
१०३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अप्राप्तेऽस्तं दिनकरे हनिष्यति जय़द्रथम् ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
अप्राप्तौ तस्य वा प्राप्तौ न कश्चिद्व्यथते वुधः ||
४८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
अप्राप्नुवन्क्वचित्काञ्चित्संविदं जातु केनचित् ||
१० ग
आदि पर्व
अध्याय ८७
यय़ातिरु उवाच
अप्राप्य दीर्घमाय़ुस्तु यः प्राप्तो विकृतिं चरेत् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २८
अर्जुन उवाच
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
युधिष्ठिर उवाच
अप्राप्यं च भवेत्सान्त्वं भेदो वाप्यतिपीडनात् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २९
भीष्म उवाच
अप्राप्यं प्रार्थय़ानो हि नचिराद्विनशिष्यसि ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
अप्राप्यं मनसापीह प्राप्तमस्माभिरच्युत ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
अप्राप्यः केशवो राजन्निन्द्रिय़ैरजितैर्नृभिः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १८५
वैशम्पाय़न उवाच
अप्राप्यरूपां हि नरेन्द्रकन्या; मिमामहं व्राह्मण साधु मन्ये |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
अप्राप्येह ततोऽनुज्ञां न शक्यः स्तोतुमीश्वरः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
भीष्म उवाच
अप्रामाण्यं च वेदानां शास्त्राणां चातिलङ्घनम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
अप्रामाण्यं च वेदानां शास्त्राणां चातिलङ्घनम् |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय १३
द्रौपद्यु उवाच
अप्रार्थनीय़ामिह मां सूतपुत्राभिमन्यसे |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
अप्रार्थितं प्रार्थय़से सुहृदो न हि सन्ति ते |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
अप्राशनमसंस्पर्शमसन्दर्शनमेव च |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
अप्राश्य निधनं गच्छेत्कर्मेदं नस्तथोपमम् ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
अप्रिय़ं चाहितं यत्स्यात्तदस्मै नानुवर्णय़ेत् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
अप्रिय़ं परुषं चापि परद्रोहं परस्त्रिय़म् |
७५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३९
युधिष्ठिर उवाच
अप्रिय़ं प्रिय़वाक्यैश्च गृह्णते कालय़ोगतः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
अप्रिय़ं यस्य कुर्वीत भूय़स्तस्य प्रिय़ं चरेत् |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रिय़ं वसुदेवस्य मा भूदिति महामनाः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६८
सञ्जय़ उवाच
अप्रिय़ं वा प्रिय़ं वापि महाराज धनञ्जय़म् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११५
धृतराष्ट्र उवाच
अप्रिय़ं सुमहत्कृत्वा सिन्धुराजः किरीटिनः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
युधिष्ठिर उवाच
अप्रिय़ं हृदय़े मह्यं तन्न तिष्ठति केशव |
११ क
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
अप्रिय़ः सर्वभूतानां सोऽमुत्रेह च नश्यति ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
अप्रिय़ः सर्वभूतानां हीनाय़ुरुपजाय़ते ||
५३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
अप्रिय़स्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय ५७
विदुर उवाच
अप्रिय़स्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
अप्रिय़ाणां च वचनं पाण्डवेषु विशेषतः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
अप्रिय़ाणां च वचने प्रव्रजत्सु पुनः पुनः |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
अप्रिय़ाणि ततोऽन्योन्यमुक्त्वा तौ कुरुपुङ्गवौ |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
अप्रिय़ाण्यवमानांश्च दुःखं वहुविधात्मकम् |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय ५७
विदुर उवाच
अप्रिय़ाण्याह पथ्यानि तेन राजा सहाय़वान् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
अप्रिय़ाण्याह पथ्यानि तेन राजा सहाय़वान् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
अप्रिय़े चैव कर्तव्ये चिरकारी प्रशस्यते ||
६७ ख